Dainik Navajyoti Logo
Friday 28th of January 2022
 
ओपिनियन

जयन्ती विशेष : धर्म और संस्कृति के महान उन्नायक-स्वामी विवेकानंद

Wednesday, January 12, 2022 16:35 PM
फाइल फोटो

विवेकानंद वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने अमेरिका के शिकागो में  सन 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की और से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। उनके उस संबोधन के उपरान्त सारा अमेरिका उनके पीछे हो लिया था। उन्हें युवाओं का ‘रोल मॉडल’ माना जाता है। इसलिए हर साल उनके जन्म दिन को युवा-दिवस के रूप में मनाया जाता है। कुछ मुख्य निम्न बिन्दुओं के माध्यम से उनको समझने का प्रयत्न करते हैं- सेवा व्रत- कोलकाता नगर मे महामारी (प्लेग) का प्रकोप था। प्रतिदिन सैंकड़ों व्यक्तियों पर उसका आक्रमण होता था। हालत बिगड़ती देखकर सरकार ने स्थिति का नियंत्रण करने के लिए कड़े नियम बनाए। पर जब नगर निवासी अनुशासन की कमी से उनका पालन करने में ढीलढाल करने लगे तो शहर के भीतर और चारों तरफ  फौज तैनात कर दी गई। इससे नगरवासियों मे बड़ा आतंक फैल गया और उपद्रव हो जाने की आशंका होने लगी।


स्वामी विवेकानंद उस समय विदेशों में हिन्दू धर्म की ध्वजा फहराकर और भारत वर्ष का दौरा करके कोलकाता आए ही थे। वे अपने देशी-विदेशी सहकारियों के साथ बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की योजना में संलग्न थे। लोगों पर इस घोर विपत्ति को आया देखकर वे सब काम छोड़कर कर्म क्षेत्र में कूद पड़े और बीमारों की चिकित्सा तथा सफाई की एक बड़ी योजना बना डाली।


गुरुभाई ने पूछा-स्वामीजी! इतनी बड़ी योजना के लिए धन कहां से आएगा?स्वामीजी ने तुरन्त उत्तर दिया-आवश्यकता पड़ेगी तो इस मठ के लिए जो जÞमीन ख़रीदी है उसे बेच डालेंगे। सच्चा मठ तो सेवा कार्य ही है। हमें तो सदैव संन्यासियों के नियमानुसार भिक्षा मांगकर खाने तथा पेड़  के नीचे निवास करने को तैयार रहना चाहिए। सेवा व्रत को इतना उच्च स्थान देने वाले स्वामी विवेकानंद (जन्म 12 जनवरी 1863) कोलकाता के एक मध्यम श्रेणी के बंगाली परिवार में पैदा हुए थे। उस समय भारत में तीव्र वेग से अंग्रेजी राज्य और ईसाई संस्कृति का प्रसार हो रहा था। इसके परिणामस्वरूप देश में उच्च वर्ग का विश्वास अपने धर्म और सभ्यता पर से हिल गया था और ऐसा प्रतीत होने लगा था कि कुछ ही समय मे देश में ईसाइयत की पताका उड़ने लगेगी। पर उस समय देश में ऐसे कितने ही महामानवों का अभिर्भाव हुआ ,जिन्होंने इस प्रबल धारा को अपने प्रभावों से दूसरी तरफ  मोड़ दिया। उन्होंने हिन्दू धर्म के सच्चे स्वरूप को संसार के सामने रखा और लोगों को विश्वास दिला दिया कि आत्मोन्नति और कल्याण की दृष्टि से हिन्दू धर्म से बढ़कर धार्मिक सिद्धांत संसार में और कहीं नहीं है। इन महामानवों में स्वामी विवेकानंद का स्थान बहुत ऊंचा है।


त्याग भाव-रामकृष्ण परमहंस का संसर्ग क्रमश: बढ़ने से आध्यात्मिक क्षेत्र में उनकी प्रगति होती गई। एक बार परमहंस देव ने नरेन्द्र को एकांत में बुलाकर कहा-देखो अति कठोर तपस्या के प्रभाव से मुझे कितने ही समय से अणिमा आदि सिद्धियां प्राप्त हो चुकी है। पर मेरे जैसे मनुष्य के लिए, जिसे पहने हुए वस्त्र का भी ध्यान नहीं रहता, उन सबका उपयोग करने का अवसर ही कहां मिल सकता है? इसलिए मैं चाहता हूँ कि (माँ-काली देवी) से पूछकर उन सबको तुझे सौंप दूँ, क्योंकि मुझे दिखाई पड़ रहा है कि आगे चलकर तुझे माँ का बहुत काम करना है। इन सब शक्तियों का तेरे भीतर संचार हो जाए तो समय पड़ने पर उनका उपयोग हो सकता है, कहो, तुम्हारा क्या विचार है? नरेन्द्र को यद्दपि अब तक के अनुभवों से परमहंस देव की दिव्य शक्तियों पर बहुत कुछ विश्वास हो चुका था, तो भी उन्होंने कुछ देर विचार करके कहा-महाराज, इन सब सिद्धियों से मुझे ईश्वर प्राप्ति में सहायता मिल सकेगी? श्री रामकृष्ण इस संबंध में तो सम्भवत: उनसे कोई सहायता प्राप्त नहीं हो सकेगी। तो भी ईश्वर प्राप्ति के पश्चात जब उनका कार्य करने में अग्रसर होगा तो ये सब बहुत उपयोगी होगी।


नरेन्द्र तो महाराज! इन सब सिद्धियों की मुझे क्या आवश्यकता है? पहले ईश्वर दर्शन हो जाए, फिर देखा जाएगा कि मुझे इन सिद्धियों को ग्रहण किया जाए या नहीं? अत्यंत चमत्कारिक विभूतियों और सिद्धियों को अगर अभी से लेकर ईश्वर-प्राप्ति के ध्येय को भुला दिया जाए तो यह बड़ी हानिकारक बात होगी। इस उत्तर को सुनकर परमहंस देव बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने समझ लिया कि नरेन्द्र वास्तव में त्याग भावना वाला है और वह सेवा मार्ग में बहुत अधिक प्रगति कर सकेगा।
जन सेवा के लिए संन्यास- जब परमहंस देव का स्वास्थ्य अधिक बिगड़ गया और उनकी सेवा का भार नरेन्द्र ने अपने ऊपर ही ले लिया। इसके लिए उन्होंने अपने घर बार को एक प्रकार से त्याग ही दिया और पूरा समय अपने गुरु की परिचर्या और उनके अन्य शिष्यों की देखभाल में ही लगाने लगे। अंत में जब 16 अगस्त 1886 को परमहंस देव का देहान्त हो गया, तब उनके समस्त शिष्यों और आश्रम की व्यवस्था का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। उन्होंने कुछ गृहस्थ भक्तों की सहायता से एक पुराना खंडहर जैसा मकान किराए पर ले लिया और पांच-सात नवयुवक वहीं रहकर आत्म साधना में संलग्न रहने लगे। नरेन्द्र ने अपना उदाहरण उपस्थित करके सबको यही प्रेरणा दी कि जब हम संन्यासी हो चुके हैं तो हमको भोजन- वस्त्र की सुविधा-असुविधा का का ध्यान छोड़ देना चाहिए। उस समय वास्तव में स्थिति भी ऐसी आ गई थी  कि आश्रम में खाने को कुछ भी सामग्री नहीं रहती और भिक्षा के द्वारा जो थोड़ा बहुत चावल मिल जाता उसी को उबालकर सब काम चला लेते। साथ में साग-भाजी की तो क्या बात कभी-कभी नमक भी नहीं मिलता था।      

पर इससे किसी के मुख पर असंतोष का कोई चिन्ह न दिखाई देता। सूखे भात, नमक और बेलपत्र पर इन लोगों ने महीनों तक निर्वाह किया। नरेन्द्र बराबर सबका उत्साह कायम रखते थे और समझाते रहते थे कि यदि  हमको संन्यासी रहकर संसार की कुछ सेवा करनी है तो इस प्रकार के अभावों और कठिनाइयों को खुशी से सहने को  तैयार राहना चाहिए।

 

उन सबका उपयोग करने का अवसर ही कहां मिल सकता है? इसलिए मैं चाहता हूँ कि (माँ-काली देवी) से पूछकर उन सबको तुझे सौंप दूँ, क्योंकि मुझे दिखाई पड़ रहा है कि आगे चलकर तुझे माँ का बहुत काम करना है। इन सब शक्तियों का तेरे भीतर संचार हो जाए तो समय पड़ने पर उनका उपयोग हो सकता है, कहो, तुम्हारा क्या विचार है? नरेन्द्र को यद्दपि अब तक के अनुभवों से परमहंस देव की दिव्य शक्तियों पर बहुत कुछ विश्वास हो चुका था, तो भी उन्होंने कुछ देर विचार करके कहा-महाराज, इन सब सिद्धियों से मुझे ईश्वर प्राप्ति में सहायता मिल सकेगी? श्री रामकृष्ण इस संबंध में तो सम्भवत: उनसे कोई सहायता प्राप्त नहीं हो सकेगी।

रामकृष्ण परमहंस का संसर्ग क्रमश: बढ़ने से आध्यात्मिक क्षेत्र में उनकी प्रगति होती गई। एक बार परमहंस देव ने नरेन्द्र को एकांत में बुलाकर कहा-देखो अति कठोर तपस्या के प्रभाव से मुझे कितने ही समय से अणिमा आदि सिद्धियां प्राप्त हो चुकी है। पर मेरे जैसे मनुष्य के लिए, जिसे पहने हुए वस्त्र का भी ध्यान नहीं रहता।  

          -ललित शर्मा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

परफेक्ट जीवनसंगी की तलाश? राजस्थानी मैट्रिमोनी पर निःशुल्क  रजिस्ट्रेशन करे!

यह भी पढ़ें:

कृषि जगत : प्राकृतिक खेती बनाम रासायनिक खेती

केंद्र सरकार ने नीम कोटिक यूरिया को बढ़ावा देने के लिए तमाम कवायदें पिछले कुछ सालों से शुरू की हैं।

29/10/2021

ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा:भविष्य, चुनौतियां एवं समाधान

हाईड्रोजन-एक रंगहीन, गंधहीन गैस है, जो पर्यावरणीय प्रदूषण से मुक्त भविष्य की ऊर्जा के रूप में देखी जा रही है।

24/12/2021

क्या ग्राहक के अधिकार सुरक्षित हैं?

अब जरा इस बात को परखिए कि ज्यादातर जो जिला अदालतें हैं उनकी क्या हालत है। फर्नीचर के नाम पर न्यायाधीशों के बैठने तक के लिए ठीकठाक कुर्सी मेज नहीं हैं तो फिर जो शिकायत लेकर आया है तो उसके लिए टूटी फूटी बेंच और कई जगह तो वो भी नहीं, खड़े रहकर अपना मुकदमा लड़िए, जैसी हालत के लिए क्या प्रशासन जिम्मेदार नहीं है।

12/08/2019

राजस्थान में बिजली महंगी

विकास के नाम पर प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के आकड़े दर्शाए जाते हैं, लेकिन इसकी तुलना इस बात से भी की जानी चाहिए कि पूर्व जीवन स्तर को ही अर्जित करने में लागत में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है।

04/03/2020

रेत के नाविक कप्तान साहब

कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी के जीवन पर जब एक दृष्टि डाली जाती है, तब वहां ऐसी ही ऊर्जा उद्भागित होती हुई मिलती है। एक जीवट भरा जुझारू व्यक्तित्व, कुछ करने की मन में अंतहीन लगन।

29/06/2019

गांवों का भी हो समुचित विकास

भारत में गांवों के विकास के बिना समग्र भारत का विकास संभव ही नहीं है।

04/01/2022

राजनीति में अपराधीकरण

देश की राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के लिए अपराधी राजनेताओं का राजनीति में भाग लेने पर संपूर्ण प्रतिबंध लगाना बहुत जरूरी है।

04/02/2020