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हस्तक्षेप : दिल्ली डॉयलाग: भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत

Saturday, November 13, 2021 15:45 PM
फाइल फोटो

अफगानिस्तान के ताजा हालात पर चर्चा करने के लिए विभिन्न देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच नई दिल्ली में आयोजित बैठक भारत के दृष्टिकोण से काफी अहम रही। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल के आमंत्रण पर आयोजित बैठक में रूस, ईरान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान व कजाखस्तान के एनएसए ने भाग लिया। बैठक में अफगानिस्तान के मानवीय संकट व अफगान भूमि से आतंकियों के दूसरे देशों में जाने की आशंका व इसे रोकने के उपायों पर चर्चा की गई। बैठक के बाद सामुहिक घोषणा में कहा गया कि अफगान क्षेत्र का उपयोग किसी भी आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए। इस वार्ता में चीन और पाकिस्तान को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन दोनों ही देशों ने विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए इसमें भाग लेने से इंकार कर दिया।दिल्ली डॉयलाग के नाम से आयोजित क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता में भारत, रूस, ईरान व अन्य मध्य एशियाई देशों के सुरक्षा सलाहाकारों ने आतंकवाद, कट्टरता, सीमा पार के खतरे और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दों पर चर्चा की।  बैठक में अफगानिस्तान को शांतिपूर्ण, सुरक्षित और स्थिर राष्ट्र रूप में पुन: स्थापित किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। दिल्ली वार्ता के दौरान भारत की पहल पर अफगानिस्तान को निर्बाध, प्रत्यक्ष और सुनिश्चित तरीके से मानवीय सहायता प्रदान करने व ड्रग्स की तस्करी के खिलाफ सामूहिक सहयोग का भी आह्वान किया गया।


काबुल पर तालिबान के कब्जे के तीन माह बाद नई दिल्ली में हुई अफगान पड़ोसियों की इस बैठक को भारत के नजरिए से काफी अहम माना जा रहा था। इसके कई कारण थे। प्रथम, अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद यह पहला अवसर था, जब भारत के नेतृत्व में रूस, ईरान और अन्य मध्य एशियाई देश अफगानिस्स्तान के हालात पर चर्चा करने के लिए एक मंच पर आए हैं। द्वितीय, अफगान पड़ोसी देशों ने जिस तरह से भारत का निमंत्रण स्वीकार कर बैठक में हिस्सा लेने पर सहमति जताई है, उससे साफ  है कि वे अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए भारत की भूमिका को अहम मानते हैं। तृतीय, भारत की अध्यक्षता में हुई  इस बैठक  के बाद अफगानिस्तान में भारत को अलग-थलग करने की चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक कोशिशों को झटका लगा है।


काबुल पर तालिबान के कब्जे के तीन माह बाद नई दिल्ली हुई अफगान पड़ोसियों की इस बैठक को भारत के नजरिए से काफी अहम माना जा रहा था। इसके कई कारण थे। प्रथम, अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद यह पहला अवसर है, जब भारत, रूस, ईरान और अन्य मध्य एशियाई देश अफगानिस्स्तान के हालात पर चर्चा करने के लिए एक मंच पर आए हैैं। द्वितीय, अफगान पड़ोसी देशों ने जिस तरह से भारत का निमंत्रण स्वीकार कर बैठक में हिस्सा लेने पर सहमति जताई है, उससे साफ  है कि वे अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए भारत की भूमिका को अहम मानते हैं। तृतीय, भारत की अध्यक्षता में हुई  इस बैठक में रूस, ईरान और अन्य मध्य एशियाई देशों के एनएसए की उपस्थित से अफगानिस्तान में भारत को अलग-थलग करने की चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक कोशिशों को झटका लगा है।


दरअसल, काबुल की सत्ता पर तालिबानी कब्जे के बाद अफगानिस्तान में खाने-पीने व दूसरी तमाम तरह की चीजों की भारी किल्लत है। बड़ी संख्या में लोग दूसरे देशों की ओर पलायन कर रहे हैं। भारत समेत तमाम देशों की ओर से चलाई जा रही विकास परियोजनाओं का काम ठप्प हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां मानवीय मदद पहुंचाने की अपील कर चुके हैं। अगले कुछ दिनों बाद अफगानिस्तान में सर्द दिनों की शुरूआत हो जाएगी। ऐसे में संकट के और अधिक बढ़ने की आशंका है। यूएन शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) ने अफगानिस्तान में जारी मानवीय संकट पर चिंता जताई है। एजेंसी का कहना है कि देश में मानवीय संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में उन लोगों के लिए अधिक तेजी से काम करने की जरूरत है, जो अपनों से बिछड़ गए है। संयुक्त राष्ट्र के ताजा अनुमान के अनुसार अफगानिस्तान में दो करोड़ 30 लाख लोग यानि अफगान आबादी का करीब 55 फीसदी हिस्सा अगले वर्ष मार्च तक संकटपूर्ण या फिर आपात्तकालीन स्तर की खाद्य असुरक्षा का सामना करने के लिए मजबूर हो जाएगा। ऐसे में भारत की अगुआई में होने वाली यह बैठक इसलिए भी जरूरी हो जाती है कि इसमें हिस्सा लेने वाले अधिकांश देश अफगानिस्तान की जमीन से आतंकियों के दूसरे देशों में जाने की आशंका व इसे रोकने की रणनीति पर बात करेंगे। बैठक में भाग ले रहे कई देश तालिबान के आने से अफगानिस्तान के आतंक का पनाहगाह बनने की आशंका जता चुके हैं। हालांकि तालिबान बार-बार कह रहा है कि वो अफगानिस्तान की धरती का दूसरे देशों के खिलाफ  इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगा। इस तरह की बैठकों की शुरूआत साल 2018 में हुई थी। पहली दोनों बैठकें ईरान में हुई थी। तीसरी बैठक पिछले वर्ष नई दिल्ली में होने थी, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इसे स्थगित कर दिया गया था। चीन, पाकिस्तान और तालिबान की अनुपस्थिति में हुई इस बैठक की सार्थकता को लेकर शुरू से ही प्रश्न उठ रहे थे। सच तो यह है कि तालिबान को लेकर भारत पशोपेश की स्थिति में है। वो अभी भी वेट एंड वाच की नीति पर चल रहा है।
     -डॉ. एन.के. सोमानी
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


दुनिया के कई देशों के साथ भारत पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि बलपूर्वक सत्ता पर काबिज होने वालों का मान्यता नहीं दी जाएगी। भारत, अमेरिका और चीन समेत 12 देश संयुक्त राष्टÑ और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों के साथ पहले से ही यह फैसला कर चुके हैं कि वे अफगानिस्तान में किसी भी ऐसी सरकार को मान्यता नहीं देंगे, जो बलपूर्वक नियंत्रण हासिल करना चाहती हो। भारत का तालिबान को मान्यता देना लोकतांत्रिक देशों की प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करता है। चूंकि अभी लोकतांत्रिक देशों ने तालिबान को मान्यता नहीं दी है । संभवत: इस वजह से भारत ने ताबिलान को वार्ता के लिए आमंत्रित नहीं किया।

दरअसल, तालिबान की अफगान सश्रा में वापसी के बाद वहां चीन और पाकिस्तान का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा हैं। तालिबान के उभार के पीछे भी पाकिस्तान का बड़ा हाथ रहा है। साल 1996 में अफगानिस्तान पर नियंत्रण के दौरान भी पाकिस्तान ने तालिबान को हथियारों के अलावा अन्य जरूरी मदद उपलब्ध करवाई थी। 2001 में अमेरिका के अफगानिस्तान में आने और तालिबान के सश्रा से बेदखल होने के बाद भी पाकिस्तान  तालिबान के बड़े नेताओं को समर्थन देता रहा। अब तालिबान सरकार के गठन में जिस तरह से पाकिस्तान और चीन की भूमिका रही है, उससे भारत कंही न कंही हाशिए पर आ गया था। दूसरी ओर अफगानिस्तान में भारत के अपने हित है। भारत ने पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान में ढांचागत सुविधाओं व जन उपयोगी परियोजनाओं पर  तीन बिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक खर्च किए है।  अफगान नागरिकों के साथ-साथ तालिबान भी भारत के इस योगदान को स्वीकार करता है।  यही वजह है कि भारत पिछले कुछ दिनों से द्विपक्षीय वार्ताओं और बहुपक्षीय मंचों पर अफगानिस्तान का मुद्दा लगातार उठाता रहा है। भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बने। ऐसे में भारत द्वारा आयोजित दिल्ली डॉयलाग को अफगानिस्तान में अपनी भूमिका और खोये हुए प्रभाव को पुन: स्थापित करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। रूस और ईरान सहित अफगानिस्तान के सभी प्रमुख पड़ोसी देशों ने दिल्ली डॉयलाग जरिए जिस तरह से भारतीय नेतृत्व को स्वीकार किया है, उसे भारत की कूटनीतिक जीत ही कहा जाना चाहिए।

काबुल की सत्ता पर तालिबानी कब्जे के बाद अफगानिस्तान में खाने-पीने व दूसरी तमाम तरह की चीजों की भारी किल्लत है। बड़ी संख्या में लोग दूसरे देशों की ओर पलायन कर रहे हैं। भारत समेत तमाम देशों की ओर से चलाई जा रही विकास परियोजनाओं का काम ठप्प हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां मानवीय मदद पहुंचाने की अपील कर चुके हैं।

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