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ओपिनियन

सबके हाथ में है संविधान

Thursday, January 30, 2020 10:35 AM
फाइल फोटो

एक समय था जब हम इंकलाब के नारे लगाकर कहते थे कि स्वाधीनता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे। कभी हमने ये नारे भी लगाए थे कि तुम मुझे खून दो, तुम्हें आजादी दूंगा तो कभी हमने-उठो, जागो और लक्ष्य की ओर बढ़ना भी सीखा था, तो कभी हमने गुलामी की नींद में हजारों साल से सोकर जागते हुए आजादी की अलख भी जगाई थी। इस बार 26 जनवरी को 71वां गणतंत्र दिवस देखने, सुनने और मनाने का अवसर मिला। राजपथ और जनपथ का अंतर और दूरिया एक बार फिर समझ में आई, जहां एक तरफ भारत की सैन्य शक्ति, संस्कृति और हजारों साल के विकास और परिवर्तन की प्रकृति से सामना हुआ, वहां हम भारत के लोगों के हाथों में संविधान की प्रस्तावना लेकर चलती, चारों तरफ तख्तियों/ बैनरों के बीच, लोकतंत्र को बचाने की हलचल भी देखी। आश्चर्य ये हुआ कि भारत में गणतंत्र की स्थापना के बाद पहली बार गांधी के बाद आम्बेडकर को हम भारत के लोगों ने याद किया और पहली बार युवाओं तथा महिलाओं ने शाहीन बाग के धरने-प्रदर्शन और सत्याग्रह देशभर में लगाकर संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया और बच्चे-बूढ़े सभी ने तिरंगा उठाया। 1950 के बाद पहली बार गणतंत्र दिवस पर ऐसा अनुभव किया कि लोकतंत्र और आजादी को बचाने के लिए, हम भारत के लोगों के पास अब केवल एक संविधान ही बचा है, क्योंकि राजपथ से पहली बार लोगों से तारीख और जगह पूछी जा रही है। एक समय था जब हम इंकलाब के नारे लगाकर कहते थे कि स्वाधीनता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे। कभी हमने ये नारे भी लगाए थे कि तुम मुझे खून दो, तुम्हें आजादी दूंगा तो कभी हमने-उठो, जागो और लक्ष्य की ओर बढ़ना भी सीखा था तो कभी हमने गुलामी की नींद में हजारों साल से सोकर जागते हुए आजादी की अलख भी जगाई थी। बचपन में प्रभातफेरी निकालने और देशभक्ति के तराने गाने के बाद हम भारत के लोगों ने धर्म के नाम पर देश का विभाजन भी देखा तो भाषा के नाम पर राज्यों का निर्माण भी देखा। हम भारत के लोगों ने अपने समय के इतिहास को हर बार लहुलुहान और शरणार्थी होते भी पाया है, लेकिन हमें फिर ऐसा लग रहा है शायद हम अब विभाजन और विस्थापना का तीसरा बंटवारा होते देख रहे हैं।

स्वतंत्र भारत के जीवन में एक ऐसा बदलाव का बिन्दु बनकर आया है कि तथाकथित नया भारत भगवा और हरे रंग में बंट रहा है तो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक हो रहा है, तो भारतीयकरण के नगाड़े बजा रहा है, तो लोकतंत्र से राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहा है। बहरहाल! इस बार संविधान के सपनों ने पूरे देश में लोकतंत्र और आजादी को बचाने का एक ऐसा सविनय अवज्ञा आंदोलन खड़ा कर दिया है कि स्वतंत्रता संग्र्राम के सभी सेनानी और मार्गदर्शक विस्मृतियों से बाहर आ गए हैं। महात्मा गांधी और आम्बेडकर से लेकर भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस तक सभी राष्ट्रवाद की विश्व व्याख्या समझा रहे हैं। अब तक जिसने कभी संविधान को नहीं पढ़ा, संविधान की भूमिका और भारत के नागरिक होने का मतलब समझ रहा है। गणतंत्र दिवस पर पहली बार ऐसा लगा कि जनता अपने लोकतंत्र, आजादी और संविधान पर मालिकाना अधिकार का दावा कर रही है और पांच साला किराएदार (सरकार) का ये चुनौती दे रही है कि हिन्दू-मुस्लिम राजी, तो क्या करेगा नाजी (तानाशाही)। असल बात ये है कि लोकतंत्र और आजादी का नया संविधान लिखने की राजनीति करते हुए बहुमत का जनादेश एक बार फिर सत्ता-व्यवस्था के सैन्य बल पर हम भारत के लोगों पर धर्म और जाति के वर्चस्व और प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। गणतंत्र दिवस की परेड और झांकी से जो शौर्य, संस्कृति और विकास की प्रेरणा हमें मिलती है उसी का दूसरा नाम तो विविधता में एकता ओर राज्यों का गणराज्य है।

राजपथ पर खड़े होकर सरकारी वैभव का राष्ट्रवाद असल में केवल और केवल हिन्दू राष्ट्रवाद के वर्चस्व का चेहरा है, जिसे लगातार शाम, दाम, दण्ड, भेद से भारत के संविधान पर थोपा जा रहा है और यही कारण है कि भारत का जनमानस-संविधान की प्रस्तावना को अपने संघर्ष का घोषणा पत्र बनाकर सड़कों पर आ रहा है और पहली बार शांति और अहिंसा के साथ युवाओं, महिलाओं तथा समाज के वंचित वर्ग को एकजुट कर रहा है। ये स्व र्स्फूत जनता का प्रतिरोध है तथा कोई राजनैतिक दल इसके भीतर नहीं है। 71वें गणतंत्र दिवस पर शाहीन बाग, जामिया मिलिया, जेएनयू, हैदराबाद, अलीगढ़ जाधवपुर जैसे प्रतिरोध-विद्यार्थियों की पहल है और भारत में पहली बार विश्वविद्यालयों के भीतर से सैन्य राष्ट्रवाद को चुनौती मिल रही है। इससे संविधान, आजादी और लोकतंत्र को बचाने की पहल-विद्यार्थियों और महिलाओं ने जगाई है जो पिछले 71 साल की दलीय राजनीति को बेनकाब भी करती है। इस बार के गणतंत्र दिवस पर जनपथ से संविधान की उद्देशिका (प्रस्तावना) का सामूहिक पाठ, आने वाले समय की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक संघर्ष का नया घोषणा पत्र है, जो न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना, प्रतिष्ठा और अवसर की सभ्यता, व्यक्ति की गरिमा और देश की एकता और अखण्डता को मजबूत बनाता है। इसीलिए हमें लगता है कि हम भारत के लोग अपने लोकतंत्र, आजादी और संविधान की रक्षा को लेकर सजग हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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