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ओपिनियन

हिंसा की गंदी राजनीति का खेल

Thursday, March 05, 2020 10:05 AM
फाइल फोटो

नफरत और हिंसा की ये राजनीति जहां अनेक रूपों में हमारे लोकतंत्र को समाप्त कर रही है। वहां संविधान में स्थापित हमारी समाजवादी और पंथ निरपेक्ष संस्कृति तथा सभ्यता को भी नष्ट कर रही है। विज्ञान, टेक्नोलॉजी, शिक्षा और संचार की 21वीं शताब्दी की ये महाभारत अब केवल एक कुरुक्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। अपितु भारत माता की जय और वंदे मातरम् के जय घोष में भी समा गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के साबरमती में महात्मा गांधी की आश्रम यात्रा और दिल्ली में उनकी समाधि पर फूल चढ़ाने से हमारे महान भारत की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है, क्योंकि हम तो 1947 की आजादी के बाद से ही धर्म और जाति की सियासत के नशे में डूबे हैं। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीयता की आस्थाओं को लेकर जो सियासत की राजनीति हम कर रहे हैं, उसी का वे परिणाम है कि विकास और सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक न्याय के सभी अच्छे दिन हमारे जीवन से विदा हो गए हैं। नफरत और हिंसा की ये राजनीति जहां अनेक रूपों में हमारे लोकतंत्र को समाप्त कर रही है। वहां संविधान में स्थापित हमारी समाजवादी और पंथ निरपेक्ष संस्कृति तथा सभ्यता को भी नष्ट कर रही है। विज्ञान, टेक्नोलॉजी, शिक्षा और संचार की 21वीं शताब्दी की ये महाभारत अब केवल एक कुरुक्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। अपितु भारत माता की जय और वंदे मातरम् के जय घोष में भी समा गई है। देश में पहली बार नफरत की राजनीति का ये हौसला हो गया है कि सरकार के मंत्री, सांसद, विधायक और पार्षद भी चुनावी मंचों से नफरत और हिंसा के सियासी नारे जनता से लगवा रहे हैं।

हमारा इतिहास, भूगोल और सद्भाव की हजारों साल पुरानी संस्कृति इतनी लहुलुहान हो चुकी है कि वेद, पुराण और हमारे 135 करोड़ देवी-देवता और महापुरुष-संत-महात्मा भी हतप्रभ और शर्मिन्दा हैं। विनम्रता से कहूं तो सच ये है कि हम कितने हिन्दुस्तान और कितने पाकिस्तान में विभाजित हो गए हैं कि इस उन्माद का कोई ओर-छोर ही दिखाई नहीं पड़ता। आपकी संक्षिप्त जानकारी के लिए बताना चाहूंगा कि केवल देश में हिंसा की 7484 सांप्रदायिक घटनाएं हो गई हैं, जिसमें कोई 1115 लोगों की जान जा चुकी है और इसमें भी सबसे अधिक 321 मौतें अकेले हमारी गंगा जमना घाटी संस्कृति की पवित्र भूमि उत्तर प्रदेश में हुई है। अकेले उत्तर प्रदेश की ये मौतें ही देश में हुई कुल मौतों का 28 प्रतिशत हैं। फिर जानमाल का नुकसान और पीड़ित परिवार के आंसुओं का हिसाब-किताब तो किसी के पास भी नहीं है, क्योंकि पीड़ित मानवता की संवेदना सियासत की राजनीति करने वालों की चिंता का विषय नहीं है। नफरत की हम हिंसा के आगे सरकार, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तथा चुनाव आयोग तक सभी मौन और लाचार हैं।

आशचर्य तो ये है कि नफरत की राजनीति और हिंसा को प्रायोजित करने वाली पार्टियों को सबसे अधिक अज्ञात चुनावी चंदा 5520 करोड़ रुपये देश के सभी 7 राष्ट्रीय दलों को दे चुकी है। इसमें भी सबसे अधिक 78 प्रतिशत, 952 करोड़ रुपये का चंदा बहुमतवादी भाजपा को मिला है जबकि कांग्र्रेस को मात्र 149 करोड़ का चंदा हाथ लगा है। आप सोचिए कि हमारे लोकतंत्र को गुप्तदान से कौन चला रहा है और इस सियासत के बहुमत का क्या रहस्य है। अभी हाल दिल्ली में हुए दंगों में हुई कोई 50 मौतों और सुख शांति के विनाश पर कौन खुश और कौन चुप क्यों है। 1984 में दिल्ली के सिक्ख विरोधी दंगों में 3325 लोग मारे गए, तो 2013 के मुज्जफरनगर दंगों में 48 मौतें हुई, तो 2012 के आसाम के दंगों में 80 लोग मारे गए, तो फिर 2002 के गुजरात दंगों में 400 लोग मरे, तो 1989 के भागलपुर दंगों में कोई 1000 से अधिक लोग मरे। भारत में इस तरह पिछले 10 साल में 7 हजार से ज्यादा साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं, जबकि हमारी महान न्यायपालिका केवल 18 प्रतिशत आरोपियों को दोषी और 82 प्रतिशत आरोपियों को निर्दोष बता सकी है। हमारी पुलिस और सियासत की शतरंज के खिलाड़ी देख रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अचानक सड़कों पर आकर पीड़ितों को ये भरोसा दिला रहे हैं कि आप डरो मत, अब शांति लौट आएगी। फिर भी नफरत और हिंसा की सियासत, दिल्ली के बाद कोलकाता में आगामी चुनावों को लेकर पहले भारत माता की जय और आम जनता से भड़काऊ नारे लगवा रही है। हम यदि नहीं समझे तो फिर आगे समझ जाएंगे कि सियासत के इरादे क्या हैं और राजनीति के इस गंदे खेल की कीमत कौन अपने घर, परिवार और सम्पत्ति को खोकर चुका रहा है। भारत माता के दामन में सांप्रदायिक हिंसा और नफरत का ये नशा आगे हम भारत के लोगों को जाने कैसे दिन दिखाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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