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ओपिनियन

यह विदा नहीं है मन्नू जी!

Tuesday, November 16, 2021 15:10 PM
फाइल फोटो

मन्नू जी से मेरा परिचय अस्सी के दशक में एक किशोर पाठक के स्तर पर हुआ था और नए मिलेनियम में आकर एक लेखक के तौर पर परिपाक तक पहुंचा। मुझे याद है एक युवा कथाकार की तरह जब मैं मन्नू जी से पहली बार ‘हंस’ के वार्षिक समारोह में मिली तो...मुझसे वह उत्साह छिपाए न छिपा। मैंने एक छोटी भीड़ में उनके पल्ले को हाथ से छूकर महसूस किया, हां! मैं मन्नू जी से मिल रही हूं। एक सघन पाठक-प्रशंसक के तौर पर उनकी सादा सी साड़ी के पल्ले को छूकर ही मैं घनीभूत भाव से सिहर गई थी।
किशोरावस्था से वे मेरी प्रिय लेखिका थीं जब अपनी नवीं कक्षा में कोर्स की किताब में उनकी लिखी कहानी ‘त्रिशंकु’ पढ़ी थी उसे पढ़ कर लगा था यह मेरी ही कहानी है, मिनी जिसके प्रोग्रेसिव माता-पिता तमाम आधुनिकता की, वैश्विक साहित्य की चर्चा करते हुए भी बेटी को लेकर संकीर्ण और ओवरप्रोटेक्टिव होते हैं। उसके बाद ‘आपका बंटी’ फिर कॉलेज में आते-आते तो मन्नू जी का लिखा गया हर शब्द पढ़ा। यहां तक राजेंद्र जी-मन्नू जी का साझा उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ , महाभोज भी तभी पढ़ डाला था।
मन्नू जी की विशेषता रही कि उन्होंने लेखनी को फॉरसेप बना कर मध्यमवर्गीय पढ़े लिखे परिवारों के ढांचे की, उनके दोहरे मापदंडों और विवशताओं की नब्ज अच्छी तरह से पकड़ी थी। उनकी कहानियों को घर-घर में खूब पढ़ा और सराहा गया, उन पर फिल्में बनीं। मन्नू जी को न केवल मेरी मां ने पढ़ा, मैंने पढ़ा और मुझे तब बहुत हैरानी हुई थी जब मेरी बेटी कनुप्रिया ने ‘आपका बंटी’ पढ़ कर अपने निफ्ट कॉलेज हौजखास  के पड़ोस में रहने वाली मन्नू जी से मिलने की इच्छा जाहिर की। ऐसा होना मन्नू जी को नि:संदेह कालजयी बनाता है... उनकी लेखनी पीढ़ियों के अंतस को छूकर गुजरती थी। उनकी मोहक भाषा, छोटे-छोटे और चुस्त वाक्य, जीवंत  संवाद .... सीधे अंतस में उतरते थे। उनकी कहानियों पर फिल्में बनना लाजमी था क्योंकि वे बहुत दृश्यात्मक लिखा करती थीं। बिलाशक मन्नू भंडारी हिंदी की  सिद्धहस्त कथाकार रही हैं। उनकी कहानियों को शामिल किए बिना नई कहानी आंदोलन पूरा नहीं हो सकता। वे समय से आगे की सोच तो रखती ही थीं, उन्होंने अपनी कृतियों में स्त्री-पुरुष संबंध के बीच की मनोवैज्ञानिक बारीकियों को अपनी सहज भाषा में मारक ढंग से खोल कर रखा है। भारतीय मध्यवर्ग के सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रित करने में उनका कोई सानी नहीं। जीवन की विसंगतियों पर उनकी कलम विशेष बारीकी से चलती थी और इन विडंबनाओं को गहन अभिव्यक्ति प्रदान करती थी। मुझे याद है, हमने कॉलेज में अपनी ‘हिंदी नाटक’ पढ़ाने वाली टीचर मंजू चतुर्वेदी मैम के निर्देशन में मन्नू जी का लिखा संपूर्ण नाटक ‘बिना दीवारों के घर’ किया था, वह नाटक खूब सराहा गया। उस कम उम्र में भी मैं इस नाटक में परिलक्षित ‘द्वंद्व’ तथा ‘संक्रमण’ को समझ रही थी कि कैसे अब स्त्री स्वतंत्र होने की राह पर चल पड़ी है, पुरुष इस आंच में खुद के वजूद को झुलसता पा रहा है, घर नाम की संस्था को अब अपना नया ढांचा बनाना ही होगा, जिसकी दीवारें पक्षपाती न हों। एक बार उनके गांव भानपुरा भी जाना हुआ था मेरा, उनके भतीजे वहां अपने स्कूल में ‘‘चैती महोत्सव’’ किया करते थे जहां साहित्य, चित्रकला, संगीत-नृत्य पर बच्चों के लिए वर्कशॉप होती थी। लेखिका लता जी भी वहां प्रिंसीपल थीं। रचना यादव के नृत्य की बारीकियों को वहां देखा। तब महसूस हुआ मन्नू जी जिस मिट्टी-पानी से उपजी हैं उसमें जीवन के प्रति प्रेम, संवेदना और बौद्धिकता का सम्मिश्रण है। उस राजस्थान-मध्यप्रदेश के सीमांत पर बसे उस कस्बे  की आबो-हवा में सांस लेना अपने आप में प्रेरणादायक था। आज मन्नू जी की हर बात याद आ रही है, उनका मेरे प्रति मूक स्नेह, साहित्य सभाओं में उनकी सतत लौ जैसी गरिमामय उपस्थिति, साहित्याकाश पर छाया उनका और राजेंद्र यादव जी का दांपत्य, उनकी साड़ियां, उनके शॉल, उनकी सफेद-काली चोटी, उनके गुंथे जूडे....उनका चश्मा और उसके पीछे से झांकती बड़ी और बौद्धिक आंखें। उनकी वह निश्छल मुस्कान जो हर क्षुद्र वार को निष्फल करती प्रतीत होती थी।  प्रेम पर तो मन्नू जी ने अपनी रचनाओं, आत्मकथ्यों में कोटेबल कोट्स दिए हैं। भले हम कह लें वे नब्बे वर्ष की थीं। लेकिन मन्नू जी के निधन ने एक निर्वात सा उत्पन्न कर दिया है। वे लंबे समय से लेखन में सक्रिय नहीं थीं लेकिन उनका होना एक वटवृक्ष जैसा था जिसकी छाया हिंदी कथाजगत को घेरे थी। आज लग रहा है वह वट गिर गया है। हिंदी कहानी का एक महत्वपूर्ण स्त्री स्वर शांत जरूर हो गया है मगर यह तय है कि उसकी शाखाएं - प्रशाखाएं हम सब में से फूटेंगी और पल्लवित होंगी। हम सब में मन्नू जी की बौद्धिक लेखनी के बीज रह रह कर फूटेंगे, वह लेखनी जो मध्यमवर्गीय स्त्री को घर की दीवारों से आर-पार गुजर जाने का गुर सिखा गई है। मन्नू जी के निधन से सारा हिंदी जगत गहरे सदमे में है, कहानी के स्वर्णिम युग का मानो कोई अंतिम स्तंभ ढह गया हो....लेकिन इस प्राचीर के रेत-गारे को हम एकत्र कर इसमें छिपे जीवन मूल्यों, कलात्मक कंगूरों, संघर्ष के बीजों को अपना पाथेय बना कर चलेंगे। यही हमारी मन्नू भंडारी जी को आत्मीय श्रद्धांजलि होगी। अलविदा मन्नू जी। आप अपनी कहानियों में जीवित रहेंगी और हम पाठक - लेखकों के हृदय में भी।

स्मृति शेष

बिलाशक मन्नू भंडारी हिंदी की  सिद्धहस्त कथाकार रही हैं। उनकी कहानियों को शामिल किए बिना नई कहानी आंदोलन पूरा नहीं हो सकता। वे समय से आगे की सोच तो रखती ही थीं, उन्होंने अपनी कृतियों में स्त्री-पुरुष संबंध के बीच की मनोवैज्ञानिक बारीकियों को अपनी सहज भाषा में मारक ढंग से खोल कर रखा है।

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