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हिन्दी दिवस पर विशेष : हिन्दी के प्रति समर्पित शासक कृष्ण सिंह

Tuesday, September 14, 2021 14:20 PM
कॉन्सेप्ट फोटो

तत्कालीन राजपूताना में पहली बार भरतपुर रियासत में मार्च 1927 में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के सत्रहवें अधिवेशन में विजय वैजयन्ती के रूप में महाराज श्रीकृष्ण सिंह ने मातृभाषा की ध्वजा फहराते हुए यह विश्वास व्यक्त किया था कि यह सर्वमान्य है कि हिन्दी ही राष्ट्रभाषा होने की क्षमता रखती है। उसके प्रचार में उसकी सरलता एवं श्रेष्ठता को निष्पक्ष लोग स्वीकार करते जाते हैं। धीरे-धीरे परन्तु दृढ़तापूर्वक हिन्दी का प्रचार अवश्य ही एक दिन देशभर में पूर्ण रूप से होगा। इस अधिवेशन में गुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर महामना मदन मोहन मालवीय राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन आदि हस्तियां शामिल हुई थीं।


जयपुर-भरतपुर आगरा राजमार्ग पर स्थित सेवर महल के बड़े परकोटे के बीच बनाए गए गोल चबूतरे पर 35 फुट ऊंचे ध्वज दण्ड पर 23 मार्च 1927 को महाराज श्रीकृष्ण सिंह ने यह झण्डा फहराया, जिस पर विशाल अक्षरों में हिन्दी शब्द अंकित था। उन्होंने कहा कि मातृभाषा का झण्डा सबके लिए एक सम्मान की वस्तु है। मातृभाषा का संबंध जातीय जीवन के सभी अंगों से है। इसी की उन्नति सब प्रकार की उन्नति का मूल है। इस झण्डे के नीचे हमारा समस्त देश है। हमारे मत मतान्तर इस साहित्यिक छत्र छाया में आने के लिए बाधक नहीं हो सकते।


भरतपुर रियासत में हिन्दी को राजभाषा बनाने की दिशा में 1895 में ‘गबन’ की रोकथाम के उद्देश्य से सरकारी कागजातों में उर्दू भाषा के अंकों के स्थान पर देवनागरी अंकों का प्रयोग आरम्भ किया गया था। इसके लिए ‘हिन्दी दफ्तर’ की पृथक व्यवस्था की गई। राजकाज में शनै-शनै: हिन्दी भाषा का प्रयोग होने लगा। महाराजा श्रीकृष्ण सिंह की नाबालगी (1900-1918) शासन में राज्य संरक्षिका राजमाता गिरिराज कौर ने देवनागरी के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देते हुए विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित किया। इसी क्रम में 13 अगस्त, 1912 को श्री हिन्दी साहित्य समिति की स्थापना हुई जिसके तत्वावधान में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया।


शासनाधिकार प्राप्त करते ही महाराज कृष्ण सिंह ने गर्वनर जनरल तथा वायसराय लार्ड चैम्स फोर्ड की उपस्थिति में 28 नवम्बर 1918 को अपने प्रथम उद्बोधन में राज्य की प्रगति एवं जनहित की कल्याणकारी योजनाएं लागू करने की भावना व्यक्त करते हुए देशभक्ति, स्वदेशानुराग तथा राजभक्ति आदि शब्दों का प्रयोग किया। दो दिन बाद एक अक्टूबर 1919 को देवनागरी हिन्दी को राजभाषा घोषित कर सभी राज्य कर्मचारियों को तीन माह की अवधि में हिन्दी भाषा नहीं सीखने पर राजसेवा से पृथक करने के आदेश जारी किए। फलस्वरूप भरतपुर राजपत्र का प्रकाशन हिन्दी में होने लगा। राजस्व विभाग सहित न्यायालयो में भी हिन्दी का प्रयोग आरम्भ हो गया। राज्य सरकार की ओर से दी गई उपाधियो में पहली बार कुलभूषण, चन्द्र वंश रत्न, महामान्य, देशभूषण, वीर शिरोमणि,समरवीर, राजपंडित आदि हिन्दी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया। बसंत दरबार में 27 जनवरी 1928 को महाराज ने यह घोषणा की थी-वर्ष 1919 में हमारे राज्य में नागरी लिपि राज लिपि बनाई गई थी। अब सभी अफसर व अहलकारों ने इस लिपि में योग्यता प्राप्त कर ली है। अस्तु आज से राष्ट्रभाषा हिन्दी नियत की जाती है।


तत्कालीन भारत सरकार के आदेशानुसार महाराजा कृष्ण सिंह ने वायसराय द्वारा नामजद अंग्रेज दीवान डी.जी. मेकेंजी को 10 फरवरी 1928 को रियासत कर दीवान नियुक्त किया था और 31 मार्च 1940 को भारतीय प्रशासक के.पी.एस. मेनन के दीवान नियुक्त किए जाने की अवधि में डॉ.जी.मेकेंजी, मेजर एच.डब्ल्यू.सी. रोबसन, कप्तान सी.पी. हैनकाक एवं सर रिचर्ड टोटनहम नामक कांग्रेस दीवान पद पर रहे, लेकिन जनसाधारण के लिए रियासत की भाषानीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।


हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार सहित समाज सुधार से जुड़े विभिन्न कार्यों तथा राष्टÑीय चेतना के प्रति मुखर महाराजा कृष्ण सिंह अंग्रेज शासकों की आंखों में खटकने लगे थे। भारत सरकार ने उन्हें 4 सितम्बर, 1928 को राजगद्दी से उतारकर रियासत से निकाल दिया। अपनी माटी से दूर महाराजा कृष्ण सिंह का विषम परिस्थितियो में 27 मार्च 1929 को दिल्ली में देहावसान हो गया। संयोगवश दो साल पहले इसी तिथि पर उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भरतपुर अधिवेशन में हिन्दी की ध्वजा फहराई थी। अपनी मृत्यु से सप्ताह भर पहले उन्होंने दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानी सांवल प्रसाद चतुर्वेदी से हुई भेंट में ब्रजभाषा में कहा था कि मुझे मरने का कोई गम नहीं। मेरे देश हित के काम अधूरे रह गए और मैं खासतौर से हिन्दी का राष्ट्रभाषा के रूप मे पूर्णरूपेण प्रचार नहीं कर सका। हिन्दी को राष्टÑभाषा का दर्जा मिलने का सपना संजोने वाले महाराज कृष्ण सिंह की आत्मा स्वतंत्र भारत में हिन्दी दिवस मनाने की रस्म अदायगी से कितनी कराहती होगी-कौन जाने?
                 -गुलाब बत्रा
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)


भरतपुर रियासत में हिन्दी को राजभाषा बनाने की दिशा में 1895 में ‘गबन’ की रोकथाम के उद्देश्य से सरकारी कागजातों में उर्दू भाषा के अंकों के स्थान पर देवनागरी अंकों का प्रयोग आरम्भ किया गया था। इसके लिए ‘हिन्दी दफ्तर’ की पृथक व्यवस्था की गई। राजकाज में शनै-शनै: हिन्दी भाषा का प्रयोग होने लगा।

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