Dainik Navajyoti Logo
Thursday 23rd of January 2020
 
ओपिनियन

गहलोत सरकार की वित्तीय चुनौतियां

Monday, December 09, 2019 14:20 PM
अशोक गहलोत (फाइल फोटो)

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की गठबंधन युक्त कांग्रेस सरकार को एक वर्ष हो गया है जिसका अधिकांश समय लोकसभा व स्थानीय सरकारों के चुनावों में व्यतीत हो गया है तथा आगामी लगभग 6 माह का समय भी पंचायतों के चुनावों में चला जाएगा। इस तरह से लगभग डेढ़ वर्ष तो प्रजातांत्रिक व्यवस्था में चुनावों में बीत जाता है तो पांच वर्ष के कार्यकाल में केवल साढ़े तीन वर्ष ही रह जाते हैं क्योंकि समय-समय पर चुनाव आचार संहिता लग जाती है तथा प्रशासन की शक्ति चुनाव संचालन एवं व्यवस्था में लग जाती है। नीतिगत निर्णयों में बाधा आती है तथा चुनाव घोषणा पत्र एवं बजटीय घोषणाओं की क्रियान्वयन गति बाधक होती है। एक वर्ष की समय अवधि में गहलोत सरकार ने बजट, 2019-20 प्रस्तुत किया तथा राज्य की अर्थव्यवस्था के विकास एव खुशहाली के लिए अनेक घोषणाएं एवं कार्यक्रम घोषित किए गए तथा महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन भी आवंटित किए गए हैं लेकिन सवाल वित्तीय चुनौतियों से मुकाबला करने का है। जब तक अतिरिक्त संसाधन नहीं जुटाए जाएंगे तो अतिरिक्त व्ययों के लिए बजट व्यवस्था कैसे होगी?

वर्ष 2019-20 के लिए 1 लाख 16 हजार 735 करोड़ रुपये तो योजना उद्व्यय प्रस्तावित है जो कि पूर्व वर्ष 2018-19 की तुलना में लगभग 8.35 प्रतिशत अधिक है जिसका लगभग 43.50 प्रतिशत तो सामुदायिक एवं सामाजिक सेवाओं पर व्यय किया जाएगा। जो कि लगभग 50 हजार 679 करोड़ रुपये होगा तथा इसमें से शिक्षा पर 19,563 करोड़ रुपये, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य पर 7477 करोड़ रुपये, आवास एवं नगरीय विकास पर 4,669 करोड़ रुपये व्यय किए जाने प्रस्तावित है। योजना आयोग तो समाप्त हो गया तथा केन्द्रीय स्तर पर नीति आयोग कार्य कर रहा है लेकिन राज्यों के स्तर पर योजनाएं बनाने का कार्य जारी है जिसकी सम्पूर्ण व्यवस्था राज्य सरकार को केन्द्रीय सहायता, राज्य बजटीय सहायता व ऋणों के माध्यम से पूरी करनी है। इतिहास यह है कि जितना योजना उद्व्यय घोषित किया जाता है उसकी तुलना में संसाधनों की सीमितता के कारण राज्य सरकारें वास्तविक खर्च नहीं कर पाती है तथा योजना आकार कटौती का अप्रिय निर्णय लेना होता है तथा पूर्व सरकार द्वारा चलाए जाने वाले सामाजिक, आर्थिक कार्यक्रमों एवं महत्कांक्षी परियोजनाओं को बंद या स्थगित करना होता है। राज्य में तेल शोधन परियोजना, मेट्रो परियोजना, रिंग रोड परियोजना, द्रव्यवती परियोजना इसी श्रेणी में आती है जो कि संसाधनों की कमी के चलते रफ्तार खो रही है तथा निर्धारित समय तक पूरा होने की उम्मीद को धक्का पहुंचा रही है। समय विलंबता के कारण लागत स्फीति का भी सामना करना पड़ता है जो कि अधिक संसाधनों की आवश्यकता को दर्शाता है। वित्तीय संसाधनों की दृष्टि से राज्य की केन्द्र पर अत्यधिक निर्भरता है लेकिन सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था सूस्ती से त्रस्त है तथा अनौपचारिक क्षेत्र सर्वाधिक चपेट में है। किसान कर्ज माफी योजना तथा बेरोजगारी भत्ता दिया जाना है जो कि राज्य सरकार का चुनावी घोषणा पत्र के आधार पर नीतिगत निर्णय हैं लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी बाधक बनेगी तो किसानों एवं बेरोजगार युवाओं में असंतोष पैदा होगा।

सरकार के विभिन्न विभागों में लगभग 75 हजार पदों पर सरकारी भर्ती किए जाने की घोषणा की गई है लेकिन वास्तविक रूप से राज्य सरकार कितने पदों को भर पाती है यह मूल्यांकन का विषय है। आगामी वित्त वर्ष 2019-20 के लिए राजस्व घाटा 27,014 करोड़ रुपये, राजकोषीय घाटा 32,678 करोड़ रुपये का अनुमानित रखा गया है जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 3.19 प्रतिशत रहेगा तथा कुल ऋण एवं दायित्व लगभग 3.50 करोड़ रुपये अनुमानित है जो कि सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 33.13 प्रतिशत होगा। सर्वाधिक महत्वपूर्ण वित्तीय समस्या सरकारी कर्मचारियों का वेतन, भत्ते, पेंशन भुगतान एवं ब्याज अदायगी की है जो कि राज्य की स्वयं की कर राजस्व प्राप्ति से अधिक हो गई है। राज्य का कर राजस्व तो 73,742 करोड़ रुपये अनुमानित है लेकिन राज्य सरकार को वेतन एवं पेंशन तथा ब्याज अदायगी पर लगभग 1,02,050 करोड़ रुपये व्यय करने हैं। राज्य सरकार के कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की किश्त देनी है जबकि केन्द्र सरकार महंगाई भत्ता दे चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि आगामी समय में केन्द्र के अनुरूप राज्य सरकार कैसे वेतन एवं भत्तों का भुगतान कर पाएगी। राज्यों के अपने वित्तीय संसाधन सिकुड़ते जा रहे हैं। वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद से कर दरों के निर्धारण में राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है। कर निर्धारण एवं नीतिगत निर्णय समस्त राज्यों की परिषद द्वारा लिया जाता है। केन्द्रीय करों से राज्य को हिस्सेदारी के 44,618 करोड़ रुपये प्राप्त होने है तथा केन्द्रीय सहायता 26,676 करोड़ रुपये अनुमानित है लेकिन यदि जीएसटी राजस्व घटता है तथा प्रत्यक्ष कर राजस्व में कमी आती है तो केन्द्र से मिलने वाले संसाधन कम हो जाएंगे। जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा है कि वित्त वर्ष 2019-20 में केन्द्र से राज्य को लगभग 11 हजार करोड़ रुपये कम प्राप्त होंगे।
डॉ. सुभाष गंगवाल (ये लेखक के अपने विचार हैं)

यह भी पढ़ें:

भारत में डिजिटल क्रांति की चुनौतियां

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को ‘डिजिटल इण्डिया’ का विजन दिया है ताकि डिजिटल क्रांति को देश में साकार रूप प्रदान किया जा सके। इक्कसवीं सदी सूचना प्रौद्योगिकी को समर्पित है लेकिन इस क्षेत्र में तकनीकी नवप्रर्वतन, सुधार एवं समायोजन की अत्यंत गुंजाईश है।

16/09/2016

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर इन दिनों कई भाई लोगों की आंखें लाल हैं। जब भी उनका ठिकाने पर पगफेरा होता है, तो कोई न कोई बखेड़ा हुए बिना नहीं रहता। अब देखो ना राज ने ठिकाने पर जनता दरबार लगाते समय यह थोड़े सोचा था कि अपने ही रत्नों को इन लाल आंखों वालों से रूबरू होना पड़ेगा।

14/10/2019

राजनीतिक इस्तीफों का दौर

सवाल उठता है, क्या निर्वाचित प्रतिनिधि का यह दायित्व नहीं बनता कि वह अपना कदम उठाने से पहले उनसे भी कुछ पूछ ले जिन्होंने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है?

12/07/2019

श्रमिक दिवस की प्रासंगिकता

प्रतिवर्ष 1 मई का दिन ‘अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ अथवा ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है।

01/05/2019

चुनाव में दागी प्रत्याशी क्यों?

यह माना जाता है कि जनतंत्र में जनता की राय और जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है। इसी मान्यता के चलते जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार को वैधता प्राप्त होती है

26/04/2019

बंगाल में राष्ट्रपति शासन के हालात

बंगाल में यह भी दिखाई दे रहा है कि वहां की जनता जय श्रीराम का नारा लगाकर ममता बनर्जी को चिढ़ा रही है। सवाल यह है कि जब स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी देश के आराध्य भगवान राम के नाम से चिढ़ रही हैं, तब आम कार्यकर्ता कैसा सोच रखता होगा, यह समझा जा सकता है।

21/06/2019

एक साथ चुनाव आसान नहीं

भारत में लोकसभा के साथ विधानसभाओं के चुनाव पहले कई बार हो चुके हैं। 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में राज्य विधानसभा चुनावों का आयोजन लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ था।

26/06/2019