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Wednesday 3rd of June 2020
 
ओपिनियन

राजनीति का गिरता स्तर

Saturday, February 08, 2020 10:25 AM
फाइल फोटो

मंच से नारे लगवाता है कि देश के गद्दारों को, गोली मारो। चुनाव-आयोग में जब इस भड़काऊ आचरण की शिकायत पहुंचती है, तो संबंधित सांसद को 36 घंटे तक चुनाव-प्रचार न करने का दंड सुनाया जाता है। ज्ञातव्य है कि सांसद महोदय के इस भाषण और नारेबाजी के बाद गोली चलाने की 3 घटनाएं हो चुकी हैं। क्या देश के नागरिकों को इस तरह भड़काना देशद्रोह नहीं है। 9  साल की बच्ची की मां नजूमुन्निसा देशद्रोह के आरोप में बीदर की जिला जेल में बंद है। वह अपनी बेटी को लेकर गांव से बीदर आ गई थी और सहायक की तरह काम करके अपनी बेटी को पढ़ा रही है। 5वीं कक्षा में पढ़ने वाली उसकी बेटी ने कुछ दिन पहले स्कूल में बच्चों द्वारा खेले गये नााटक में कुछ ऐसा बोल दिया, जो कुछ लोगों को नागवार गुजरा। दरअसल स्कूल में यह नाटक बच्चों को नागरिकता संशोधन कानून की जानकारी देने के लिए खेला गया था।

इसी नाटक में वह नौ साल की बच्ची एक डायलॉग बोलती है, जिसमें वह कहती है कि अगर किसी ने उससे दस्तावेज मांगे तो वह उसे जूते मारेगी। नाटक में जूते मारने वाली यह बात तीन बार दुहरायी गयी है और बच्ची ने पुलिस को बताया कि यह डायलॉग उसे मां ने याद करवाया था। किसी दर्शक की शिकायत पर इस बात को देशद्रोह मान लिया गया और पुलिस ने बच्ची की मां को दोषी ठहराकर जेल में डाल दिया। सबूत के रूप में पुलिस के पास वह सैंडल भी है, जो 9 साल की बच्ची ने नाटक में हाथ में लेकर दिखाया था। यह समाचार जब अखबार में पढ़ा, तो अनायास हंसी आ गयी थी। तरस भी आया उनकी बुद्धि पर जिन्हें 9 साल की बच्ची का वह डायलॉग देशद्रोह लगा, लेकिन अब लग रहा है, बात हंसी और तरस से कहीं आगे, बहुत आगे जाती है। सामने वह समाचार भी है, जिसमें एक सांसद राजधानी दिल्ली की एक चुनावी सभा में नागरिकता कानून का विरोध करने वालों को गद्दार कहकर उन्हें गोली मारने की बात कहता है।

मंच से नारे लगवाता है कि देश के गद्दारों को, गोली मारो। चुनाव-आयोग में जब इस भड़काऊ आचरण की शिकायत पहुंचती है, तो संबंधित सांसद को 36 घंटे तक चुनाव-प्रचार न करने का दंड सुनाया जाता है। ज्ञातव्य है कि सांसद महोदय के इस भाषण और नारेबाजी के बाद शाहीन बाग इलाके में गोली चलाने की तीन घटनाएं हो चुकी हैं। क्या देश के नागरिकों को इस तरह भड़काना देशद्रोह नहीं है। बीदर की 9 साल की बच्ची ने तो सिर्फ जूते मारने की बात कही थी, हमारे माननीय सांसद महोदय तो गोली मारने की बात कह रहे हैं। एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि चुनाव आयोग ने 36 घंटे तक चुनाव-प्रचार करने पर रोक लगाकर सांसद को सजा दे दी है। सवाल है कि यदि 9 साल की बच्ची की जूते मारने वाली बात देशद्रोह मानी जा सकती है तो गोली मारने की बात कहने वाले सांसद महोदय को देशद्रोह के आरोप में सजा क्यों नहीं। कथित अपराध करने वाली बच्ची की मां यदि जेल में है, तो वह जेल में क्यों नहीं है, जिसने सांसद महोदय को भड़काऊ और अश्लील नारा लगवाने की प्रेरणा दी। बात तो यह है कि उस सांसद को चेतावनी देने के बजाए सत्तारूढ़ दल ने संसद में नागरिकता कानून के संदर्भ में हो रही बहस की शुरूआत करने का अवसर दिया।

बात बीदर की बच्ची या भाजपा के सांसद की ही नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बच्ची की मां को आरोपी बनाने वाली पुलिस को अपनी गलती समझ में आ जाएगी। पर सवाल देश की राजनीति चलाने वालों की समझ का है। राजनीति का जो स्तर आज देश में दिख रहा है और जिस तरह की भाषा का उपयोग हमारे नेता कर रहे हैं, उसे देखकर शर्म भी आती है, और गुस्सा भी। राजनीति में भाषा का यह अवमूल्यन कुछ व्यक्तियों और कुछ दलों तक ही सीमित नहीं है। हमारे राजनेताओं ने यह मान लिया है कि राजनीति के खेल में वे कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी बोल सकते हैं। सब कुछ क्षम्य है उनके लिए। अपने राजनीतिक विरोधी पर किसी भी तरह का आरोप लगाने में हमारे नेताओं को कोई संकोच नहीं होता। जैसे, देशद्रोह एक बहुत ही गंभीर अपराध है, और देशद्रोही को सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन जरा सोचिए, आज तक ऐसे कितने लोगों को सजा मिली है जिन पर देशद्रोह के आरोप लगे हैं। सवाल यह भी उठता है कि यदि किसी पर लगाया गया देशद्रोह का आरोप गलत सिद्ध होता है तो झूठा आरोप लगाने के लिए कितने लोगों को सजा मिली है। किसी एक को भी नहीं। मान लिया गया है कि इस तरह आरोप लगाना राजनीतिक दांव-पेंच का हिस्सा है और राजनीति में सब कुछ माफ होता है। नहीं, सब कुछ माफ नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए। घटिया भाषा, झूठे आरोप, भड़काऊ नारेबाजी आदि सब अपराध है।

कानून के शासन में विश्वास करने वाली व्यवस्था में अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए। बिना प्रमाण के किसी को गद्दार घोषित कर देना, देशद्रोही बताना, किसी को अर्बन नक्सली की ‘उपाधि’ दे देना, किसी को आतंकवादी कह देना एक गंभीर अपराध माना जाना चाहिए और अपराधी को दंड मिलना ही चाहिए। कोई व्यवस्था ऐसी भी होनी चाहिए कि झूठे आरोप लगाने वाले को ऐसा करने में कुछ डर लगे। पर हमारे यहां तो किसी मुख्यमंत्री को यह कहने में भी संकोच नहीं होता कि ‘बोली से नहीं माने तो गोली से मानेंगे।

राजनीति अपने आप में एक घटिया खेल मानी जाती है और कुछ लोग तो इसे बदमाशों की अंतिम शरणगाह भी कहते हैं, लेकिन राजनीति हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जनतांत्रिक व्यवस्था में हम इससे बचकर नहीं रह सकते, बचकर रहना भी नहीं चाहिए। इसलिए जरूरी है कि राजनीति को बेहतर बनाने की कोशिश लगातार होती रहे। इस कोशिश का बड़ा दायित्व हमारे राजनेताओं पर है। उनकी कथनी-करनी, दोनों पर जनता की नजर रहती है।                   

- विश्वनाथ सचदेव
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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