Dainik Navajyoti Logo
Thursday 27th of February 2020
 
ओपिनियन

क्या बदलेगा राजनीति का चेहरा

Thursday, February 13, 2020 10:00 AM
अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

भारतीय राजनीति में दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के नतीजों ने वायदों को नकारने और हकीकत को स्वीकारने की एक नई शुरुआत कर दी है या भारतीय मतदाता ने अपनी परिपक्वता पर मुहर लगा बता दिया कि कौन कितने पानी में है। निश्चित रूप से धड़कनें तो सभी दलों की बढ़ गईं है, क्योंकि कथनी और करनी के बीच फर्ककरने की मतदाताओं की निपुणता ने दिग्गजों की अटकलों को ध्वस्त जरूर कर दिया। दिल्ली नतीजों के ट्रेन्ड ने होने वाले बिहार व प. बंगाल में संभावित विधानसभा चुनावों को लेकर वहां राजनीतिक दलों की परेशानी खासी बढ़ा दी है। जिसका काम दिखेगा, सत्ता तक वही पहुंचेगा की नई शुरुआत ने जुबानी जमा खर्च और जुमलों के सहारे जीतने के मंसूबों को बुरी तरह से ध्वस्त कर खलबली मचा दी है। आम आदमी पार्टी की लगातार तीसरी और सरीखे भारी, भरकम सफलता ने देश ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सोचने को तो मजबूर कर ही दिया। कांग्रेस के लिए अस्तित्व बचाए रखने की नई चुनौती भी पेश कर दी। इसके साथ ही केन्द्र और राज्य की राजनीति का असली फर्क भी जतला दिया तथा हर कहीं व्यक्ति केन्द्रित राजनीति,  मतदाताओं का ध्रुवीकरण, जांत-पांत की खाई और नकारात्मकता के प्रवाह के जरिए वोट हासिल करने वालों को आगाह भी कर दिया है। दिल्ली में वोट प्रतिशत के लिहाज से भी एक अलग नजारा दिखा जिसका अलग बारीकी से विश्लेषण होगा व नतीजों को दूसरे दृष्टिकोणों से भी देखा जाएगा। अलबत्ता केजरीवाल की जीत को लेकर संदेह किसी को नहीं था हां सारे सर्वेक्षणों का निचोड़ भी सभी को जोड़कर औसत ही दिखा।

यानी चुनाव के पहले ही जीत की सच्चाई सबको पता थी पर आंकड़ों की सच्चाई हमेशा ऊपर नीचे दिखी है। दिल्ली के नतीजों से इतना तो साफ  हो गया है कि केन्द्र हो या राज्य सभी सरकारों को जनता की कसौटी पर खरा उतरना ही होगा वरना हिसाब-किताब करने में माहिर मतदाता जरा सी भी चूक नहीं करेगा। इसके अलावा केन्द्र और राज्य की राजनीति का फर्क भी उसी मतदाता ने समझा दिया है जिसने पिछले आम चुनाव में दिल्ली में लोकसभा की सभी सातों सीट पर भाजपा को बड़े बहुमत से वोट देकर झोली भरी थी उसे ही महज 9 महीनों में हासिए पर पहुंचा दिया। विकास के मुद्दे और जनसरोकारों से सीधे जुड़ने की आम आदमी पार्टी की हकीकत ने केन्द्र में अपने दम पर पूर्ण बहुमत पा चुकी भाजपा को विधानसभा में औंधे मुंह गिरने को मजबूर कर दिया। वायदों और क्रियान्वयन को लेकर आम आदमी पार्टी की एक नई केमेस्ट्री की शुरुआत हो चुकी है जो विधानसभा के रास्ते लोकसभा के सफर पर निकल सकती है। दिल्ली के चुनाव में न नकारात्मक राजनीति ही चली और न ही मतदाताओं का ध्रुवीकरण दिखा। यदि ऐसा होता तो पूर्वांचल के मतदाताओं की 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ नतीजे कुछ और ही होते तथा भाजपा को और ज्यादा सीटें मिलती। जाहिर है दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव ने राजनीति की नई परिभाषा गढ़ी है और वह है वायदे, जो हकीकत में पूरे होते दिखे। दिल्ली में सरकारी स्कूलों के बदले रंग रूप और बेहतरीन पढाई, मोहल्ला क्लीनिकों की असरदार स्वास्थ्य सुविधा लंबे-चौड़े बिजली बिलों से छुटकारा ऊपर से 200 यूनिट फ्री बिजली का तोहफा महिलाओं को सम्मान के साथ डीटीसी की बसों में मुफ्त सवारी की सुविधा, पानी के बिलों में कटौती और नए जमाने में युवाओं को लुभाने फ्री वाई-फाई यानी करीब आधा दर्जन वो हकीकत जो सीधे-सीधे आम आदमी से जुड़ी हैं और जेब पर असर डालती हैं।

शायद बड़े-बड़े लोकलुभावन वायदों की फेहरिस्त से ऊब चुका मतदाता थोड़े से ही लेकिन असर डालने वाले वायदों पर अमल से कितना खुश हो जाता है। निश्चित रूप से चाहे फ्री बिजली हो या पानी यह केवल जेब की बचत नहीं बल्कि बचत की आदत को बढ़ाने जैसा रहा। वरना कई राज्यों में फ्री लैपटॉप, रंगीन टीवी, सस्ता खाना और हाल में घर-घर शौचालय, सस्ता और अनिवार्य बीमा, उज्ज्वला के तहत मुफ्त सिलेण्डर, किसानों को नकद सहायता जैसी तमाम सुविधाओं के मुकाबले दिल्ली से निकला महज आधा दर्जन मदद  फॉर्मूला ज्यादा असर दिखा गया। निश्चित रूप से सरकारी स्कूल, अस्पताल, दवा, बिजली, पानी वो अहम मुद्दे होंगे जो अगले चुनावों में हर राज्य में सभी दलों के लिए खास होने वाले हैं। यह वही आम आदमी पार्टी है जो 26 नवंबर 2012 को  दिल्ली के जंतर-मंतर में भारतीय संविधान अधिनियम की 63वीं वर्षगांठ के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के लोकपाल आन्दोलन से जुड़े तमाम सहयोगियों के आन्दोलन से उपजी और दिल्ली में मजबूत पकड़ बनाई तथा अनेकों नामी, गिरामी हस्तियां जुड़ती गईं। बाद में उसी तेजी से तमाम हस्तियों ने आम आदमी पार्टी से खुद को अलग भी कर लिया या फिर पार्टी ने ही बाहर जाने को मजबूर कर दिया। एक बार तो यह भी लगने लगा था कि अकेले केजरीवाल कब तक चल पाएंगे। लेकिन दिल्ली की नब्ज को पकड़ चुके केजरीवाल ने चंद भरोसेमंद सहयोगियों के सहारे ही भारतीय राजस्व सेवा की अपनी काबिलियत का इस्तेमाल किया और वायदों की फेहरिस्त के बजाए जनसाधारण से सीधे जुड़कर असर डालने वाले गिने-चुने अहम मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया और बिना भटके जुटे रहे। उन्होंने यह साबित कर दिया कि मजबूत इच्छा शक्ति और काम करने की नीयत के आगे चुनौती कुछ हो ही नहीं सकती।       

- ऋतुपर्ण दवे

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

यह भी पढ़ें:

न्यायिक प्रक्रिया में संस्थागत मध्यस्थता

राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रीड के आंकडों के अनुसार 3 करोड़ 14 लाख न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं।

15/02/2020

हेकड़ी बनाम वाटर-बम

आज ‘हेकड़ी’ की बात करते हैं। इसकी बात इसलिए उठी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाड़मेर की चुनाव सभा में इस शब्द का इस्तेमाल जो किया।

23/04/2019

खतरा सही या ध्यान भटकाने की रणनीति

पूरे चुनाव अभियान के दौरान एक बात लगातार गूंजती रही है कि सुरक्षा खतरा का हौव्वा वस्तुत: सत्तारुढ़ घटक जानबूझकर लोगों का ध्यान जरुरी मुद्दों से भटकाने के लिए खड़ा कर रहा है।

24/05/2019

पानी की कमी का गहराता संकट

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पानी के मुद्दे को लेकर तनातनी चलती ही रही है। इसके अलावा उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों के बीच भी पानी की वजह से झगड़े होते रहे हैं।

03/07/2019

अब यहां सभी विकल्प खुले हैं

राजस्थान में भी इस बार लोकसभा की 25 सीटों का मतदान दो चरणों में पूरा होगा। इसमें 13 सीटों का मतदान आगामी 29 अप्रेल को है तो शेष 12 सीटों का चुनाव 6 मई को है।

25/04/2019

यूनिवर्सल इनकम स्कीम लागू हो

चुनाव के इस मौसम में दोनों प्रमुख पार्टियों भाजपा तथा कांग्रेस के बीच मतदाता को लुभाने की घोषणाएं की जा रही हैं। पहले भाजपा के वित्त मंत्री ने अन्तरिम बजट में एलान किया

23/04/2019

बच्चों के लिए सुकुन भरा होगा यह फैसला

चीन सरकार का हालिया फैसला बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार की गंभीरता को दर्शाता है। अब चीन में बच्चों को रात दस बजे के बाद अनिवार्यत: सोना होगा। हालांकि इस पर दुनिया के देशों में बहस शुरु हो चुकी है।

15/11/2019