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ओपिनियन

राजस्थान में बिजली महंगी

Wednesday, March 04, 2020 10:10 AM
अशोक गहलोत (फाइल फोटो)

विकास के नाम पर प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के आकड़े दर्शाए जाते हैं, लेकिन इसकी तुलना इस बात से भी की जानी चाहिए कि पूर्व जीवन स्तर को ही अर्जित करने में लागत में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है। आप पार्टी के नेतृत्व में बनी दिल्ली की सरकार 200 यूनिट प्रति माह व 20 हजार लीटर पेयजल आम जन को मुफ्त में उपलब्ध करवाती है। देश की राजधानी दिल्ली में आप पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ प्रमुख राजनीतिक दलों को पटकनी देते हुए तीसरी बार सत्तारूढ़ हुई है, जो कि राज्य सरकारों के लिए एक संदेश है कि उन्हें वापस सत्ता हासिल करनी है, तो राज्य की जनता को न केवल आधारभूत सुविधाएं मुहैया करवानी होगी, बल्कि उसकी जीवन स्तर की लागत को कम करना होगा। आम जन महंगी बिजली, पानी, संचार सुविधाएं, यातायात सेवा, शिक्षा, चिकित्सा आदि की मार से पीड़ित है, जो कि उसकी वास्तविक आय व क्रय शक्ति को बढ़ा नहीं रहे है बल्कि कम कर रहे हैं। विकास के नाम पर प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के आकड़े दर्शाए जाते हैं, लेकिन इसकी तुलना इस बात से भी की जानी चाहिए कि पूर्व जीवन स्तर को ही अर्जित करने में लागत में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है। आप पार्टी के नेतृत्व में बनी दिल्ली की सरकार 200 यूनिट प्रति माह व 20 हजार लीटर पेयजल आम जन को मुफ्त में उपलब्ध करवाती है।

सरकारी स्कूलों में वे सुविधाएं दी जा रही है, जो कि निजी एवं पब्लिक स्कूलों में दी जाती है। स्कूल फीस बढ़ोत्तरी पर नियंत्रण है व पर्यावरण के स्तर पर प्रभावी कार्यवाही हुई है। इसके ठीक विपरीत राजस्थान में बिजली के दामों में लगभग 11 प्रतिशत बढ़ोतरी किए जाने का निर्णय बिजली कम्पनियों की सिफारिश पर राजस्थान विद्युत नियामक आयोग ने लिया है, जो कि स्वायत्तशासी है तथा विद्युत दरों के निर्धारण पर अंतिम निर्णय लेता है। वर्तमान में लिए गए बढ़ोत्तरी के निर्णय से राज्य के लगभग 70 लाख उपभोक्ता प्रभावित होंगे, जिन्हें की लगभग 2,350 करोड़ का वित्तीय भार वहन करना होगा तथा राज्य सरकार को भी लगभग 2,500 करोड़ रुपये का वित्तीय भार करना होगा, जो कि एक तरह से राज्य की जनता पर ही अप्रत्यक्ष वित्तीय भार है, जो कि उसे ही अनेक प्रकार के कर व शुल्क देकर चुकाना होगा। राज्य में समय-समय पर बिजली के दाम बढ़ाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है। राज्य में 8 बार बिजली के दाम 9 प्रतिशत से लेकर 23 प्रतिशत तक बढ़ाए है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण बिजली वितरण कम्पनियों का वित्तीय कुप्रबंध है। राज्य के विद्युत वितरण निगमों का संचयी घाटा 77 हजार करोड़ था, जो कि बढ़कर 92,450 करोड़ रुपये हो गया है। पूर्व में 4 वर्ष बिजली के दाम नहीं बढ़ने के कारण 9393 करोड़ का घाटा हुआ है। राज्य सरकार क्रॉस सब्सिडी के कारण टैरिफ अनुदान देती है, जो कि वर्ष 15,676 करोड़ रुपये हो गया है। राज्य में बिजली वितरण प्रबंध को सुधारने के लिए पूर्व भाजपा सरकार योजना लाई थी। इस योजना के अन्तर्गत विद्युत वितरण कम्पनियों का बकाया ऋण व राज्य सरकार ने अपने अधीन क्रमश: 15 हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष किया है तथा वर्ष वितरण कम्पनियों का ऋण भार टेक ओवर किया है तथा 14,721 करोड़ रुपये उपलब्ध किए जाएंगे। पूर्व राज्य सरकार द्वारा योजना लाए जाने का उद्देश्य वितरण कम्पनियों को प्रति वर्ष बाजार में देय महंगे ब्याज भार से बचाना था तथा यह भी अपेक्षा की गई थी कि वितरण कम्पनियां टी एवं डी नुकसान 24 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत तक लाएगी। वितरण एवं छीजत के नुकसान को कम करके अतिरिक्त आय प्राप्त होगी तथा ब्याज भार में कमी व अतिरिक्त राजस्व के द्वारा वितरण कम्पनियों की वित्तीय हालत को सुधारा जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। टी एवं डी नुकसान 15 प्रतिशत अर्जित नहीं कर सका तथा बिजली चोरी की समस्या ज्यों की त्यों विद्यमान है। टी एवं डी नुकसान को कम करने के लिए अत्यधिक पूंजी विनियोग की आवश्यकता है। ट्रांसफोरमर्स बदलने की जरूरत है तथा बिजली चोरी रोकने के लिए ईमानदार अंकेषण एवं सतर्कता दलों के द्वारा सख्ती से कार्यवाही करने की आवश्यकता है।

बिजली की चोरी आम उपभोक्ता द्वारा नहीं की जाती है, बल्कि प्रभावशाली बड़े-बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों, कृषकों, सरकारी विभागों, राजनेताओं एवं प्रशासनिक तंत्र द्वारा की जाती है। राज्य में मात्र 50 यूनिट उपभोग धारक के लिए बिजली की दरें यथावत रहेगी, जिसका लाभ लगभग 56 प्रतिशत उपभोक्ताओं को मिलेगा, लेकिन बिजली की दरों का निर्धारण स्लैब के अनुसार किया जाता है। 50 यूनिट प्रति माह पर ही बिजली की दर 90 पैसे प्रति यूनिट अधिक वसूली जाएगी, जो कि आगामी स्लैबों में लगभग 40 पैसे से लेकर 95 पैसे प्रति यूनिट तक अतिरिक्त आएगी। इसके अतिरिक्त स्थाई शुल्क, फ्यूज चार्ज व मीटर किराया तो बढ़ता ही रहता है। राज्य को विद्युत की मांग को पूरा करने के लिए एक रुपये प्रति यूनिट महंगी बिजली बाजार से खरीदनी पड़ रही है, लेकिन सवाल यह है कि एक तरफ तो राज्य में विद्युत सरफ्लस की तरफ बढ़ने तथा पूर्णतया आत्म निर्भर बनाए जाने की बात जाती है तथा दूसरी तरफ महंगी बिजली के दंश को झेलना पड़ रहा है। राज्य में सौर ऊर्जा के माध्यम से विद्युत उपलब्धि की संभावनाएं प्रबल है, लेकिन सवाल तुलनात्मक सौर ऊर्जा की प्रति यूनिट लागत का है। जो कि पूंजी विनियोग की तुलना में अधिक है। इसके कारण गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के विकास में कठिनाई आती है। राज्य में केन्द्र की नई योजना को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिसके अन्तर्गत बंजर भूमि, खेत आदि में सौलर प्लांट लगाकर बिजली की उपलब्धता बढ़ाए जाने के लिए सब्सिडी दिए जाने का निर्णय लिया गया है।

- डॉ. सुभाष गंगवाल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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