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ओपिनियन

राजस्थान में बिजली का बोझ

Wednesday, September 11, 2019 11:10 AM
फाइल फोटो।

राजस्थान के उपभोक्ताओं पर प्रति माह बिजली का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन बिजली का उपयोग करना एक विवशता है। चाहे कृषि हो या उद्योग, व्यापार एवं घरेलू तथा सेवा क्षेत्र हो। विद्युत उपभोग विकास का सूचक माना जाता है लेकिन यहां पर सवाल यह है कि बिजली के बढ़ते हुए वित्तीय बोझ को वहन कौन करे? सरकार, विद्युत वितरण कम्पनियां या निरिह उपभोक्ता!

राजस्थान में विद्युत उपभोक्ता की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जो कि गत वर्ष की तुलना में लगभग 7.34 प्रतिशत बढ़कर लगभग 15 करोड़ हो गई है जो कि राज्य की कुल आबादी से भी लगभग दुगुनी है। जहां तक विद्युत उपलब्धता (उत्पादक से खरीद सहित) एवं शुद्ध उपलब्धता तथा उपभोक्ताओं को विक्रय की गई ऊर्जा का सवाल है। वर्ष 2011-12 की तुलना में वर्ष 2018-19 में उपलब्ध एवं उपभोग में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ऊर्जा की उपलब्धता 5000 करोड़ यूनिट से बढ़कर वर्ष 2018-19 में बढ़कर 8,271 करोड़ यूनिट हो गई है। लेकिन विद्युत दरों को बढ़ाने का सिलसिला खत्म नहीं होता है। विद्युत उपलब्धता एवं शुद्ध उपलब्धता में वर्ष 2018-19 में अन्तर लगभग 600 करोड़ यूनिट का है जो कि प्रसारण या वितरण तंत्र की हानि को कुल उपलब्धता का लगभग 7 प्रतिशत दर्शाता है। शुद्ध उपलब्धता एवं उपभोक्ताओं को विक्रय की गई ऊर्जा का अंतर लगभग 1600 करोड़ यूनिट का है जो कि कुल उपलब्धता को 20 प्रतिशत है।

यह स्पष्ट है कि वितरण एवं विद्युत चोरी से होने वाली लगभग 27 प्रतिशत बिजली का भार कौन वहन करें। यह प्रश्न विचारणीय है। राज्य में उपभोक्ताओं की श्रेणी के अनुसार कितने मूल्य पर प्रति यूनिट बिजली उपलब्ध रहेगी। इसका निर्धारण स्वतंत्र तंत्र राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा किया जाता है लेकिन विद्युत दरों का निर्धारण उपभोक्ताओं की सहमति से लिया जाता है। उन्हें प्रस्तावित दरों पर विरोधस्वरूप याचिका दायर करने का अधिकार है। तथ्य यह है कि डिस्कॉम कम्पनियों को राज्य सरकार द्वारा कृषि एवं बीपीएल परिवारों को देय बिजली की दरों में व्यावसायिक एवं घरेलू दरों में अंतर की सब्सिडी प्रदान की जा रही है जिसका वित्तीय भार लगभग 11 हजार करोड़ रुपये का आ रहा है।

डिस्कॉम कम्पनियों के गठन एवं विद्युत क्षेत्र में स्वायत्तता तथा निजीकरण की दिशा में लिए गए सुधारवादी कदमों का एक उद्देश्य उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धात्मक दरों पर आवश्यकतानुसार विद्युत उपलब्ध करवाना है लेकिन विद्युत दरों को लेकर राज्य के उपभोक्ताओं में भारी असंतोष है। राज्य में प्रस्तावित दरों के कारण 500 यूनिट से अधिक के मासिक उपभोग पर विद्युत दर लगभग 9 रुपये प्रति यूनिट वहन करनी होगी जो कि निश्चित रूप से उपभोक्ताओं पर प्रति माह लगभग 20 प्रतिशत भार डालेगी। राज्य के किसान मुफ्त या न्यूनतम दर पर बिजली की मांग करते हैं तथा 50 यूनिट प्रति माह तक विद्युत उपभोग पर प्रति यूनिट दर लगभग 3 रुपये प्रति यूनिट आती है। समस्या क्रॉस सब्सिडी की है जो कि घरेलू एवं वाणिज्यिक श्रेणी के उपभोक्ताओं को वहन विद्युत खर्च के बोझ के रूप में वहन करनी होती है। प्रति वर्ष लगभग 1800 करोड़ यूनिट का भार घरेलू एवं वाणिज्यिक श्रेणी के उपभोक्ताओं का अधिक दर का भुगतान करके करना पड़ रहा है।

विद्युत उत्पादन एवं वितरण कम्पनियों का वेतन एवं प्रशासनिक खर्च का भार भी लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में राज्य में ऊर्जा क्षेत्र में कार्यरत कम्पनियों एवं निगमों की वित्तीय हालात अधिक चिंता का विषय है। जिनकी वित्तीय हालत लगातार पतली होती जा रही है। राज्य सरकार ने राज्यपाल के वर्तमान 2019-20 के अभिभाषण में माना है कि 15 विद्युत कम्पनियों का वर्ष 2013-14 में कुल संचयी घाटा 77 हजार करोड़ था जो कि उदय योजना के अन्तर्गत 32 हजार 700 करोड़ रुपये के घाटे के अधिग्र्रहण तथा विद्युत दरों में 26 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद वर्ष 2017-18 के अंत में संचयी घाटा बढ़कर 92 हजार 460 करोड़ हो गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि राज्य सरकार की उदय योजना भी विद्युत वितरण कम्पनियों के संजयी घाटे को नहीं रोक पाई तथा विद्युत दरों में वृद्धि के विकल्प के अलावा कोई चारा नहीं बचा।
विद्युत उपलब्धता आज की अति महत्वपूर्ण आवश्यकता है जिसकी आपूर्ति मांग के अनुरूप होनी चाहिए। लेकिन विद्युत उत्पादन एवं वितरण कम्पनियों की अकार्य कुशलता का खामियाजा उपभोक्ता क्यों वहन करें। यह सवाल है। राज्य सरकार की स्वयं की वित्तीय हालत ऐसी नहीं है कि सब्सिडी के बढ़ते हुए बोझ को सहन कर सके। बिजली खरीदने के लिए वित्तीय संस्थाओं से साख एवं ऋण लिए जाने की आवश्यकता है लेकिन वित्तीय संस्थाएं विद्युत कम्पनियों को साख एवं ऋण प्रदान नहीं करे तो क्या किया जाए। लेखा पुस्तकों में आपसी प्रविष्टियां किए जाने से तो काम नहीं चलेगा।

आज हालत यह है कि चाहे बिजली हो या पानी या सड़क परिवहन सभी की आवश्यकता ढांचागत विकास के लिए जरूरी है। लेकिन समस्या यह है कि निजीकरण एवं सार्वजनिक निजी सहभागिता मॉडल से भी तो काम नहीं चल रहा है। चुनाव के समय विद्युत की मांग की जाती है तथा राजनेताओं द्वारा आश्वासन दिए जाते हैं। जन अपेक्षाएं बढ़ती जा रही है लेकिन यह भी समझना होगा कि यदि तकनीकी कारणों से वितरण तंत्र कमजोर होता है तथा वित्तीय नुकसान पैदा होता है तथा उपभोक्ताओं द्वारा खुलेआम राजनीतिक संरक्षण एवं ताकत के बल पर बिजली की चोरी की जाती है तथा चूना आम उपभोक्ता के जेब पर लगता है तो यह कृत्य भी तो दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है। स्थिति के नियंत्रण के लिए स्पेशल ऑडिट एवं विद्युत चोरी के अपराधों की जांच तथा आवश्यकतानुसार कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता है।                            
डॉ. सुभाष गंगवाल (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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