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ओपिनियन

अर्थजगत : देश में मुद्रा का विमुद्रीकरण एवं नकदी

Thursday, November 18, 2021 12:50 PM
कॉन्सेप्ट फोटो

देश में लगभग 5 वर्ष पूर्व लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने बड़े-बड़े नोटों के चलन को अचानक बंद करके नोटबंदी का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। यह निर्णय ऐतिहासिक इसलिए माना जाता है क्योंकि यह कठोर निर्णय लिया गया था तथा इस निर्णय ने संपूर्ण भारतीय अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचा दी थी।नोटबंदी के निर्णय को लगभग 5 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। यह एक पर्याप्त समय है, जबकि हम नोटबंदी के उद्देश्य एवं प्रभाव का मूल्यांकन कर सकती हैं। नोटबंदी के प्रमुख उद्देश्य भुगतान व्यवस्था को सुदृढ़ करके अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना, बड़े-बड़े नोटों के रूप में जमा काली मुद्रा को समाप्त करना, पाकिस्तान एवं आतंकवाद से पीड़ित जाली मुद्रा के चलन पर रोक लगाना, डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देकर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक अर्थव्यवस्था में बदलना था। लेकिन सवाल यह है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था के बढ़ने के बावजूद की नकदी मुद्रा का चलन एवं इसके प्रति आकर्षण नियंत्रित तथा कम हो पाया?
देश में भारतीय रिजर्व बैंक वैधानिक मुद्रा जारी करता है तथा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ही मौजूद नियंत्रण एवं आपूर्ति का कार्य किया जाता है। मुद्रा चलन के नवीनतम आंकड़े यह दर्शाते हैं कि देश में लगभग 29 लाख करोड़ की वैधानिक मुद्रा का चलन हो रहा है तथा वित्तीय वर्ष 2021-22 के पहले 9 महीनों में ही 3.23 लाख करोड़ की नई मुद्रा जारी की गई है। वित्तीय वर्ष 2021 में देश के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में चलन मुद्रा 14.5 प्रतिशत रही है जबकि वर्ष 2011 में यह अनुपात 12.1 प्रतिशत था।


नोटों के विमुद्रीकरण के बाद डिजिटल भुगतान जो कि यूपीआई, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, फास्टट्रैक, एनईएफटी, आरटीजीएस, ऑनलाइन बैंकिंग के माध्यम से किया जाता है को निश्चित रूप से बढ़ावा मिला है जो कि नोटबंदी का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था। भारतीय रिजर्व बैंक का डिजिटल भुगतान सूचकांक यह दर्शाता है कि वर्ष 2018 की तुलना में वर्ष 2021 में सूचकांक 3 गुना हो गया है जो कि निश्चित रूप से सुखद है तथा वित्तीय साक्षरता एवं समावेशीकरण की दृष्टि से अच्छा माना जा सकता है। लेकिन डिजिटल भुगतान एवं नकद की तीव्रता के मध्य संबंध है या यह अलग-अलग है यह विचारणीय विषय है।सामान्यत: यह माना जाता है कि डिजिटल भुगतान के कारण नकदी की आवश्यकता कम होगी, लेकिन यह जरूरी नहीं है। प्रमुख अर्थशास्त्री जेएम किनस का मानना है कि नगदी के आवश्यकता केवल लेन-देन एवं सट्टा उद्देश्य के लिए ही नहीं होती है, बल्कि असामान्य परिस्थितियों एवं दूरदर्शिता के लिए भी होती है। कोरोना काल के समय जबकि रोजगार छिन गई थी तथा लॉकडाउन लगाना पड़ा था एवं संपूर्ण व्यवस्था ठप्प हो गई थी, आय, व्यापार, निवेश रुक गया था तो ऐसे संकट के समय उन लोगों को कठिनाई कम हुई थी जिनके पास नगद अतिरेक में पड़ा था। नकद सुख का साथी माना जाता है जो आपके पास में हमेशा रहता था तथा आपको किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। यद्यपि बैंक में जमा को भी नकद के समकक्ष माना जाता है, लेकिन यदि बैंक बंद हो जाता है या बैंकिंग व्यवहार पर रोक लगा दी जाती है आपके पास जो नकदी होता है, वही काम आता है, लेकिन यह असामान्य संकट के समय की बात है।
नोटबंदी के समय देश में लगभग 18 लाख करोड़ की मुद्रा का चलन था तथा लगभग 85 प्रतिशत मुद्रा 500 एवं 1000 के रूप में जारी की गई थी, लेकिन जब यह मुद्रा वापस भारतीय रिजर्व बैंक के पास आई तो यह पता लगा कि अधिकांश मुद्रा लगभग 99.3 प्रतिशत तो बदलनी पड़ी थोड़ी मुद्रा ऐसी थी जो मुद्रा की चलन से बाहर हो पाती। ऐसे में सवाल उठे कि क्या नोटबंदी से काली मुद्रा एवं कमाई पर नियंत्रण लग पाया? यह माना जाता है कि देश में काली मुद्रा वैधानिक मुद्रा के समानांतर कार्य करती है, महंगाई को बढ़ाने में सहायक होती है लेकिन काली मुद्रा के सृजन को नहीं रोका जा सकता है। इसका रूप बदल जाता है। कभी यह सोने-चांदी में निवेश की जाती है तो कभी रियल एस्टेट बाजार में। वायदा कारोबार में भी जाती है।


नोटबंदी के बाद यह माना गया है, जो कि विशेषज्ञ तथा एसबीआई ग्र्रुप के मुख्य अर्थशास्त्री का मत है कि भारत में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का आकार सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20 प्रतिशत रह गया है, जो कि पूर्व में लगभग 50 प्रतिशत तक माना जाता है। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में मुख्यत कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सम्मिलित किया जाता है, जो कि नकदी व्यवस्था के दायरे से बाहर आ रही है। यही कारण है कि कोरोना काल में सकल घरेलू उत्पाद में कमी के बावजूद जीएसटी की वसूली में वृद्धि हो रही है। इसका श्रेय डिजिटल भुगतान व्यवस्था को सुदृढ़ एवं आसान बनाने में है। देश में मोबाइल एवं नेट का उपयोग बढ़ रहा है, जो कि खास व्यक्ति की आवश्यकता ही नहीं है बल्कि आमजन की आवश्यकता बन गया है। नोटबंदी ने नकदी आवश्यकता को कम तो नहीं किया है, लेकिन इसके प्रति आकर्षण में कमी अवश्य आई है। भविष्य में अर्थव्यवस्था का आकार लगभग ़5 टिरिलियन होने का अनुमान लगाया जा रहा है, जो कि वर्तमान में लगभग 3 टिरिलियन डालर है तो नकदी की आवश्यकता से पूर्णतया इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन कागजी छापने की बजाए वैधानिक डिजिटल मुद्रा घोषित की जाए, यह आज की आवश्यकता है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक विचार कर रहा है।                         

    -डॉ. सुभाष गंगवाल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



देश में भारतीय रिजर्व बैंक वैधानिक मुद्रा जारी करता है तथा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ही मौजूद नियंत्रण एवं आपूर्ति का कार्य किया जाता है। मुद्रा चलन के नवीनतम आंकड़े यह दर्शाते हैं कि देश में लगभग 29 लाख करोड़ की वैधानिक मुद्रा का चलन हो रहा है तथा वित्तीय वर्ष 2021-22 के पहले 9 महीनों में ही 3.23 लाख करोड़ की नई मुद्रा जारी की गई है। वित्तीय वर्ष 2021 में देश के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में चलन मुद्रा 14.5 प्रतिशत रही है जबकि वर्ष 2011 में यह अनुपात 12.1 प्रतिशत था।

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