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ओपिनियन

सामयिकी : जर्मनी में बदलाव के बाद अब गठबंधन की कवायद

Tuesday, October 05, 2021 14:10 PM
कॉन्सेप्ट फोटो

यूरोपीय महाद्वीप की सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था वाले देश जर्मनी में पिछले सप्ताह चुनाव संपन्न हुए। सामने आए चुनावी नतीजों से यह साफ हो गया है कि वहां एक बार फिर गठबंधन सरकार ही बनेगी। यहां बता दें कि वर्ष 1945 के बाद से ही जर्मनी में कोई भी दल अपने बूते सरकार नहीं बना पाया है। ऐतिहासिक तथ्य तो यह भी रहा, वर्ष 1949 के बाद डैनिश अल्पसंख्यक पार्टी (एसएसडब्ल्यू) भी इस बार संसद में पहुंची, भले ही उसे एक मात्र सीट पर जीत मिली हो।


सत्ता की दौड़ में इस बार सोशल डेमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व वाइस चांसलर ओलाफ शोल्ज और यूनियन ब्लॉक के नेता आरमिन लैशेट के बीच होड़ बनी हुई है। जो इन दिनों सत्ता तक पहुंचने के लिए समान मुद्दों पर तालमेल बिठाने के लिए विभिन्न दलों से बातचीत के दौरों में व्यस्त हैं। इन चुनावों में सोशल डेमोक्रेट पार्टी को सर्वाधिक 25.9 और यूनियन ब्लॉक को 24.1 फीसदी मत मिले।


ऐसे में अब तीसरे और चौथे स्थान पर रही क्रमश: ग्रीन पार्टी 14.8 और फ्री डेमोक्रेट्स 11.5 फीसदी मत हांसिल करने वाले यह दल किंग मैकर्स की भूमिका में आ गए हैं। वैसे आल्टर्नेटिव फॉर जर्मनी जिसे 10.3 फीसदी मत मिले, गठबंधन की संभावना में उसकी भी अहमियत कम नहीं है। सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को संसद (बुंडस्टेग) में 50 फीसदी से अधिक मत मिलना जरूरी होता है। गठबंधन बनने में कुछ सप्ताह से लेकर महीने भी लग सकते हैं। उम्मीद है कि अगले क्रिसमस तक नई सरकार गठित हो जाएगी। जब तक नई सरकार का गठन नहीं हो जाता पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल बतौर कार्यवाहक चांसलर बनी रहेंगी। यहां बता दें कि पिछली बार वर्ष 2017 में अपनी सरकार गठित करने के लिए मर्केल को पांच माह लग गए थे। जो कि इतिहास में सबसे बड़ी समयावधि माना जाता है। जर्मनी के इतिहास में सबसे अधिक समय यानी सोलह साल तक मर्केल ने शासन किया है। वे यूरोपीय राजनीति में छाई रहीं। कोरोना महामारी के दौर में बड़े धैर्य के साथ जर्मनी में राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास एवं राजनयिक स्तर पर उन्होंने जर्मनी के प्रभाव को बनाए रखा।


इस बार का चुनावी मुकाबला काफी करीबी रहा। आम चुनावों में इस बार वामपंथी सोशल डेमोक्रेट्स पार्टी ने मर्केल के यूनियन ब्लॉक को पराजित किया था। इसके नेता ओलाफ शोल्ज चांसलर बनने की होड़ में सबसे आगे हैं। उनका दावा भी है चुनावी नतीजे स्पष्ट जनादेश को दर्शाते हैं। हम मिलकर जर्मनी में एक बेहतर और व्यावहारिक सरकार का गठन सुनिश्चत करेंगे। उन्हें ग्रीन पार्टी और फ्री डेमाक्रेट्स का समर्थन मिलने की उम्मीद है। यहां बता दें कि मर्केल शासन में, शोल्ज पूर्व वाइस चांसलर पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्ष 2018 में अपने पद से इस्तीफा देकर, वे अलग हो गए थे।


वहीं यूनियन ब्लॉक के नेता आरमिन लेशेट समर्थकों का भी दावा है कि यूनियन के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए वह हरसंभव प्रयास करेंगे। उन्होंने जर्मनी के भविष्य के लिए ऐसी गठबंधन सरकार को जरूरी बताया जो देश का आधुनिकीकरण कर सकें। इन्होंने भी ग्रीन पार्टी और फ्री डेमोक्रेट्स का समर्थन मिलने की उम्मीद जताई है। लेसेट, नॉर्थ राइनेवेस्टफालिया प्रांत के गवर्नर रहे हैं।


चुनावी परिणामों के अनुसार इस बार एसपीडी ने 206, सीडीयू-सीएसयू ने 196, ग्रीन ने 118, एफडीपी ने 92, एएफडी ने 83, लिंके ने 39 और अन्य ने एक सीट जीती। इस बार चुनावों में कुल 47 दलों ने अपना भाग्य आजमाया था। मतदान में छह करोड़ से अधिक मतदाताओं ने भाग लिया था। जर्मनी की संसद में कुल 598 सीटें होती हैं। इनमें से आधे यानी 299 सांसद पार्टी को मिले वोट के आधार पर चुने जाते हैं। और इतनी ही संख्या में यानी 299 निर्वाचन जिलों से चुनकर आते हैं।
बाद में यह चांसलर का चुनाव करते हैं। किसी पार्टी को संसद में बहुमत मिल जाता है तो उसके चांसलर कैंडिडेट का नाम पक्का हो जाता है। जर्मनी में सभी दलों के लिए चांसलर कैंडिडेट का नाम चुनाव से पहले बताना जरूरी होता है। इन्हीं चेहरों के नाम से चुनाव लड़ा जाता है।


इस बार यह चुनावी मुद्दे रहे। मार्केल की पार्टी ने जर्मनी को 2045 तक ग्रीन हाउस गैस न्यूट्रल बनाने, ग्रीन पार्टी और डाइ लिंके ने इस लक्ष्य को पहले पूरा कर 2030 तक आशिंक रूप से कोयले से संचालित इलेक्ट्रिसिटी स्टेशनों को चरणबद्ध तरीके से बंद करने, कोरोना महामारी से अस्त-व्यस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, दो लंबे लॉकडाउन के प्रभाव को झेलने के लिए बड़ी मात्रा में कर्ज लिया है लेकिन सीडीयू और एफडीपी ने भविष्य में टैक्स को न बढ़ाने का चुनावी वादा किया था।
भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्टर जे लिंडनर ने कहा है कि बर्लिन की अगली गठबंधन सरकार के भारत के साथ प्रगाढ़ संबंध कायम रखने की उम्मीद है।

      महेश चंद्रा शर्मा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


इस बार का चुनावी मुकाबला काफी करीबी रहा। आम चुनावों में इस बार वामपंथी सोशल डेमोक्रेट्स पार्टी ने मर्केल के यूनियन ब्लॉक को पराजित किया था। इसके नेता ओलाफ शोल्ज चांसलर बनने की होड़ में सबसे आगे हैं। उनका दावा भी है चुनावी नतीजे स्पष्ट जनादेश को दर्शाते हैं।

हम मिलकर जर्मनी में एक बेहतर और व्यावहारिक सरकार का गठन सुनिश्चत करेंगे। उन्हें ग्रीन पार्टी और फ्री डेमाक्रेट्स का समर्थन मिलने की उम्मीद है। यहां बता दें कि मर्केल शासन में, शोल्ज पूर्व वाइस चांसलर पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्ष 2018 में अपने पद से इस्तीफा देकर, वे अलग हो गए थे।

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