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Friday 28th of January 2022
 
ओपिनियन

कोरोना का संकट और स्वास्थ्य सुविधाएं

Saturday, January 08, 2022 14:10 PM
कॉन्सेप्ट फोटो

देश में कोरोना का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। मौजूदा हालात इस बात के सबूत हैं कि फिलहाल इस महामारी से निजात नहीं मिलने वाली। कोरोना के नए वैरिएन्ट ओमिक्रॉन ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। इस बारे में डब्ल्यूएचओ की वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन का कहना है कि-ओमिक्रॉन को सहज लेना घातक है। यह कोरोना की दूसरी लहर से भी ज्यादा खतरनाक है। इसलिए सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। देश की औद्यौगिक राजधानी मुंबई हो या फिर देश की राजधानी दिल्ली की हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही है। देश के 25 राज्यों में कोरोना के मामले में महाराष्टÑ शीर्ष पर है। देश में जहां ओमिक्रॉन के 2100 मामले हैं, वहीं अकेले महाराष्टÑ में 600 में से राजधानी मुंबई में इनकी तादाद 100 का आंकड़ा पार कर चुकी है। वहां यदि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे की माने तो राज्य में कोरोना संक्रमितों की तादाद 26000 और अकेले मुंबई में यह 15,166 को पार कर चुकी है और रोजाना 10,000 से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। राज्य के 10 मंत्री और तकरीबन 60 विधायक कोरोना संक्रमित हैं। हालात की भयावहता का सबूत यह है कि राज्य के कुल संक्रमित 218 सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों में से 199 अकेले मुंबई के सरकारी अस्पतालों के हैं। ऐसे हालात में कम्युनिटी स्प्रैड की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। सबसे बड़ी दुखदायी और चिंता की बात यह है कि जिन पर लोगों के इलाज का जिम्मा है, जब वही बीमार हैं, उस दशा में संक्रमितों का इलाज भगवान भरोसे है जबकि संक्रमितों की तादाद 34 फीसदी की दर से बढ़ रही हो। उस हालत में यह खतरा और बढ़ जाता है जबकि राज्य में 16,000 लोगों पर एक डाक्टर हो और राज्य में 25 फीसदी डाक्टरों के पद खाली पड़े हों। टाटा सामाजिक अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट तो यही दावा करती है। देश की राजधानी दिल्ली में बीते 24 घंटों में संक्रमितों का आंकड़ा 10,000 से भी ज्यादा पहुंच गया है। इस मामले में आम लोगों की बात तो दीगर है अति विशिष्ट लोग भी इससे अछूते नहीं हैं। बिहार के दो उप मुख्यमंत्री, दो मंत्री, पंजाब के मुख्यमंत्री आवास के 30 और कार्यालय के दो कर्मचारी, दिल्ली के मुख्यमंत्री, देश के महानायक अमिताभ बच्चन और पूर्व क्रिकेट कप्तान सौरभ गांगुली का आवास भी कोरोना के चंगुल से नहीं बचा है। यह हालत कमोवेश समूचे देश की है।
दुख तो इस बात का है कि लोग अब भी बचाव के नियमों का पालन नहीं कर रहे। वह चाहे मुंबई की बोरिवली हो, दादर हो, दिल्ली का सदर बाजार हो या कोई अन्य बाजार हो, कोलकाता हो, किसी भी शहर-कस्बे का बाजार हो या सब्जी मंडी या लोकल ट्रेन, उनमें बिना मास्क के भीड़ ही भीड़ नजर आती है। सोशल डिस्टैंसिंग का तो सवाल ही कहां उठता है। जबकि इस बाबत संचार माध्यम हों या समाचार पत्रों के द्वारा लगातार चेतावनियां दी जाती रहती हैं। मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में लोकल ट्रेन की संख्या बढ़ाए जाने की मांग की जा रही है, लेकिन इस बाबत सरकार की चुप्पी समझ से परे है। वह बात दीगर है कि किसी राज्य में रात का कर्फ्यू लागू है तो कहीं लॉकडाउन की तैयारी है। वैसे अर्थव्यवस्था को मद्देनजर रखते हुए पूर्ण लॉक डाउन की अब उम्मीद नहीं के बराबर है। अधिकतर राज्यों में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। लेकिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव समय पर होंगे। चुनावी रैलियों पर कोई रोक नहीं है। उ.प्र. हाई कोर्ट तो काफी पहले ही अनुरोध कर चुका है कि चुनाव टाल दिए जाएं।


भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में अमेरिकी अर्थशास्त्री, जलवायु विशेषज्ञ और संयुक्त राष्टÑ के महासचिव रहे कोफी अन्नान के विकास नीति सलाहकार जेफ्री सैश का मानना है कि भारत ने आजादी के बाद से ही स्वास्थ्य में बहुत कम निवेश किया है। जरूरत से कम निवेश एक पुरानी बीमारी है। इसे अब आगे नहीं जाना चाहिए। अब आपके पास सभी माध्यम हैं। ऐसे हालात में अधिक निवेश और कुशल प्रबंधन समय की मांग है। आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में दुनिया में भारत की रैंक्रिग 145 है। असल में स्वास्थ्य के मामले में हमारा रिकार्ड बहुत ही शोचनीय है। नतीजन लोगों को गुणवत्ता पूर्ण चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती। कोरोना महामारी के दौर ने इस तथ्य को सबके सामने उजागर करके रख दिया है। देश में संक्रमितों की रोजाना हो रही लगभग 10 हजार से अधिक की बढ़ोतरी गंभीर चिंता का विषय है। इस बारे में हार्बर्ड हैल्थ इंस्टीट्यूट का कहना है कि फिलहाल कोरोना के खात्मे की उम्मीद दूर की कौड़ी है। इसलिए धैर्य के साथ हमें सावधानी के उपायों का पालन करना बेहद जरूरी है। फिर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। वह बात दीगर है कि बीते दो सालों में स्वास्थ्य कर्मियों ने दिन-रात एक कर संक्रमितों का इलाज किया है। सैकड़ों ने अपनी जान भी गंवाई है। गौरतलब है कि जीवन के अधिकार में स्वस्थ जीवन का अधिकार शामिल है, लेकिन इस ओर ध्यान न दिया जाना बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सीडीडीईपी की रिपोर्ट अनुसार हमारे यहां 10 लाख 41 हजार 395 एलोपैथिक डाक्टर रजिस्टर्ड हैं। हर 10,189 लोगों पर एक डाक्टर है जबकि डब्ल्यूएचओ ने एक हजार लोगों पर एक डाक्टर की सिफारिश की है। इस तरह छह लाख डाक्टरों की कमी है। हर 483 लोगों पर एक नर्स है यानी 20 लाख नर्सों की कमी है। यहां डाक्टर मरीजों को दो मिनट का समय भी नहीं दे पाते। जबकि अमेरिका, स्वीडन और नार्वे जैसे देशों में डाक्टर मरीज को 20 मिनट का समय देते हैं। यहां 90 करोड़ ग्रामीण आबादी की स्वास्थ्य सम्बंधी देखभाल हेतु 1.1 लाख डाक्टर हैं। ग्रामीण इलाके में 5 में केवल एक डाक्टर ठीक से प्रशिक्षित है। हमारे ग्रामीण इलाकों की स्थिति पाकिस्तान, वियतनाम और अल्जीरिया से भी बदतर है। स्वास्थ्य सेवाओं और डाक्टरों की मौजूदगी के मामले में ग्रामीण इलाकों की हालत बेहद खराब है। दि हेल्थ वर्क फोर्स इन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार देश में ढाई लाख हेल्थ वर्करों में से 59.2 फीसदी शहरी इलाकों में जबकि 40.8 फीसदी गांव में प्रैक्टिस करते हैं। कुल मिलाकर 72.2 फीसदी जनता के लिए केवल 40.8 फीसदी हैल्थ वर्कर हैं। देश में एक लाख आबादी पर 79.7 फीसदी डाक्टर, 61.3 फीसदी नर्स और 201 हैल्थ वर्कर हैं। आजादी के समय हमारे यहां कुल 23 मेडीकल कालेज थे जबकि 2016 में 420। उसके बाद खुले मेडीकल कालेजों की तादाद अलग है। इनमें हर साल केवल 60 हजार डाक्टर तैयार हो पाते हैं। इनमें 55 फीसदी निजी कालेजों से आते हैं। हर साल 100 मेडीकल कालेज खोले जाये ंतब कहीं डाक्टरों की कमी पूरी हो सकेगी।
देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश में 18,500 डाक्टर की जगह 11,500 हैं जबकि 7,000 पद खाली हैं। यहां 33,000 विशेषज्ञ डाक्टर चाहिए लेकिन हैं आधे भी नहीं। आबादी के मुताबिक 14,000 अतिरिक्त एमबीबीएस डाक्टर चाहिए। प्रदेश सरकार ने रा’य में मेडीकल कालेज तो जिलों में खोल दियें लेकिन कहीं प्रिंसीपल नहीं, कहीं डाक्टर नहीं, कहीं पर डाक्टरों का रोजाना बाहर से आने-जाने में ही अधिकांश समय बीत जाता है, उस हालत में मरीज कौन देखेगा। पिछली सरकार में जो मेडीकल कालेज खुले, उनका इस सरकार ने बजट ही कम कर दिया। स्वास्थ्य रैंकिंग में 21 बड़े रा’यों में उत्तर प्रदेश निचले पायदान पर है। उसके बाद बिहार, ओडिसा, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड हैं। छोटे रा’यों में त्रिपुरा अब्बल है। बिहार में 3536 की जगह 1300 डाक्टर हैं जबकि 11,373 पद सृजित हैं। यहां की स्वास्थ्य सेवाओं को बिहार हाई कोर्ट सबसे बदहाल करार दे चुकी है। उत्तराखण्ड में 2800 सृजित डाक्टरों के पदों में से 1500 ही कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश संविदा पर हैं जो ग्रामीण अंचलों से गायब रहते हैं। पीएचडी चैंम्बर्स आॅफ कामर्स के अध्ययन की रिपोर्ट इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा दिल्ली सरकार की प्राथमिकता है और दोनों क्षेत्रों में खर्च एक प्रकार का निवेश है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल्स द्वारा किये सर्वे के अनुसार बाजार में बिक रहीं 3.16 फीसदी और सरकारी अस्पतालों-डिस्पेंसरियों की दवाओं की 10.02 फीसदी गुणवत्ता खराब है। जांच में सरकारी अस्पतालों-डिस्पेंसरियों की दवाओं की गुणवत्ता घटिया पायी गई। ऐसी हालत में सरकारी अस्पतालों-डिस्पेंसरियों की दवाई मरीज की जानलेवा बन रही हैं। सरकारी अस्पतालों में स्वीपर इंजैक्शन लगाते पाये गए हैं। मजबूरी में गरीब वहां जाता है। निजी अस्पताल रोगियों से ’यादा मुनाफे पर ध्यान देते हैं। फिर सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों-कर्मचारियों में संवेदनशीलता और सहानुभूति का पूर्णत: अभाव है। इससे लगता है कि स्वास्थ्य सेवाओं को ही इलाज की सबसे ’यादा जरूरत है। इन हालात में कोरोना का मुकाबला आसान नहीं है। सबसे बड़ी बात बचाव और अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की है। इससे बचने का यही कारगर उपाय है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

अभिमत
भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में अमेरिकी अर्थशास्त्री, जलवायु विशेषज्ञ और संयुक्त राष्टÑ के महासचिव रहे कोफी अन्नान के विकास नीति सलाहकार जेफ्री सैश का मानना है कि भारत ने आजादी के बाद से ही स्वास्थ्य में बहुत कम निवेश किया है। जरूरत से कम निवेश एक पुरानी बीमारी है। इसे अब आगे नहीं जाना चाहिए। अब आपके पास सभी माध्यम हैं। ऐसे हालात में अधिक निवेश और कुशल प्रबंधन समय की मांग है। आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में दुनिया में भारत की रैंक्रिग 145 है। असल में स्वास्थ्य के मामले में हमारा रिकार्ड बहुत ही शोचनीय है। नतीजन लोगों को गुणवत्ता पूर्ण चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती।

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