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ओपिनियन

भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा

Friday, September 20, 2019 11:15 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

वर्ष 2019-2020 में भारतीय अर्थतंत्र के साथ- साथ विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गहरा संकट लेकर उभरा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विभिन्न आर्थिक क्षेत्र मंदी की मार झेल रहा है और उन्हें मदद की दरकार है। सरकार पर विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप कार्य की घोषणा करने का दबाव है। अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय आय गिर रही है। बड़ी-बड़ी कम्पनियां बंद हो रही है। रोजगार घट रहे हैं। कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है। कुल मिलाकर पिछले 70 साल में उनकी हालत कभी भी आज जितनी दयनीय नहीं है। राष्ट्रीय आय वृद्धि 5 प्रतिशत तक आ गई है। उत्पादन वृद्धि का स्तर गिरा है। उत्पादन कम हो रहा है। निवेश दर गिर रही है। विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी आ रही है। आम आदमी की क्रय शक्ति सुधरने के संकेत नहीं है। दालों, खाद्य तेलों, दूध, फलों आदि के दाम अधिकांश लोगों की पहुंच से बाहर है। कृषि उत्पादन में गिरावट आई है।

आम उपयोग के खाद्यानों की उपलब्धता में कमी, रोजगार योजनाओं पर पड़ने वाले प्रभाव, निर्यात में गिरावट, औद्योगिक उत्पादन क्षमता से कम, कारखानों में उत्पादन में कमी, पिछले सालों में फैक्ट्री क्षेत्रों में रोजगार घटकर 62 लाख के करीब आ गया। कलकारखानों में रोजगार उत्साहवर्द्धन नहीं माना जा सकता। करोड़ों लोगों की श्रमशक्ति जनसंख्या में आधे से ज्यादा युवा लोगों का बढ़ता अनुपात, विद्यमान रोजगारों में श्रमिकों की छंटनी और हर साल लाखों नए हाथ काम तलाशते है। कलकारखानों के लिए पर्याप्त निवेश नहीं मिल रहा, सरकारी कार्यक्रमों में सृजित रोजगार मौदिक आय ही बनकर रह रहा है। भ्रष्टाचार में लिप्त प्रशासनिक प्रणाली, पर्याप्त आजीविका के साधन नियमित रूप से उपलब्ध नहीं करा रही है। कलकारखानों में रोजगार घटा है।

संगठित सिरमौर कम्पनी क्षेत्र भी पक्की नौकरियां नहीं देकर दिहाड़ी और ठेके के मजदूरों से काम चला रहे है। ब्याज दर घटाकर कम्पनियों को राहत तो दी गई है, किन्तु इससे मांग नहीं बढ़ रही। 10-20 लाख कीमत वाले मकानों के लिए सस्ता कर्ज देशव्यापी मकान की कीमत को पूरा नहीं कर सकता। इनकी मांग उच्चे मांग वाले है और इसका लाभ मकानों की खरीद बिक्री करने वाले जमीन जायदाद के सटौरियों को ही मिलता है। नव उदारवादी नियंत्रण ही निजी निवेश और लाभ से प्रेरित विशेष विदेशी वित्तीय संसाधनों को भारतीय बाजारों में खुली छूट देने की नीतियों के लाभों व अवसरों का वितरण, धनी और कर्ता की भूमिका निभाने वाले पक्ष में ही बढ़ता जाता है। ज्यादातर लोगों का मुख्य स्रोत अनौपचारिक क्षेत्र है। असंगठित क्षेत्र की कमियों, मजबूरियों और उपेक्षा की पहचान पर अधिसंख्यक भारतीयों के विकास की ओर लाभ पहुंचाया जा सकता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में निर्यात का प्रतिशत कोई खास नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था घरेलू बाजार पर अधिक निर्भर है। अनेक उद्योग जो निर्यात पर निर्भर है प्रभावित हुए है। वाहन क्षेत्र के लिए कर में कटौती की घोषणा हुई है। रिजर्व बैंक ने रेपों और रिवर्स रेपो दरों में कमी की है। जमीन जायदाद के क्षेत्र में और बढ़ावा देने के लिए बैंक ने उधार दरों और जमा दरों में कटौती की है।

भारत में बुनियादी ढ़ांचे के विकास की आवश्यकता है। देश के 6 लाख से अधिक गांवों में बिजली, पानी, सड़क आदि बुनियादी आवश्यकता का अभाव है। अनेक शहरों में भी बुनियादी ढ़ांचे की स्थिति दयनीय है। बड़े शहरों में भी बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता है ये भी अभाव से ग्रस्त है। निर्यात क्षेत्र में समस्याएं हैं। रूपये के मूल्य में उतार चढ़ाव की स्थिति बनी हुई है। जमीन जायदाद और आवास ऐसे क्षेत्र है जिनकी गिरती कीमतों से मांग में वृद्धि हो सकती है। निर्यात की मांग सिकुड़ गई है। अर्थव्यवस्था में अधिक पूंजी निवेश के सरकार के प्रयासों के साथ विभिन्न क्षेत्रों के कारोबार में आई गिरावट से राजस्व में कमी आ रही है और राजकोषीय घाटा ज्यादा ही रहने की संभावना है। अर्थव्यवस्था में निश्चित रूप से धीमापन आया है और भारत मंदी का शिकार हो रहा है। बदलाव दिनोंदिन हर क्षेत्र में आया परन्तु उसी अनुपात में रोजगार के क्षेत्र में नहीं आ पाया। आर्थिक विकास व रोजगार को सर्वाधिक समर्थन अब उद्योग व सेवा क्षेत्र से मिल रहा है, कृषि की हिस्सेदारी कम हो गई है।

भारत सरकार के रोजगार एवं प्रशिक्षण निदेशालय ने जो आंकड़े जारी किए है उनके अनुसार संगठित क्षेत्र में रोजगार के आंकड़े घटे है। बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाईयां बंद हो गई है। पिछले वर्षों में अर्थव्यवस्था में गिरावट से मंदी, राज्यों पर बढ़ते कर्ज, औद्योगिकरण दर में कमी व विनिवेश की नीति, निर्यात में कमी, रोजगार के अवसरों में निरन्तर हो रही कमी के कारण है। आज भी दो तिहाई आबादी अपना जीवन बसर कृषि पर कर रही है। बचतों, रचनात्मक उपायों, पूंजी बाजार में कमी को दूर करने, सेवा क्षेत्र का विस्तार करने, बढ़ते वित्तीय घाटे को कम करने, विदेशी विनिवेश को बढ़ाने, बुनियादी, औद्योगिक और ढांचागत विकास में निवेश में वृद्धि की घोषणा अभी केवल कागजी रह गई है। आगे बढ़ने के बावजूद रोजगार के अवसर घटे है। सैकड़ों उद्योग धंधे बंद हो गए, हजारों बंद होने के कगार पर है। राजकोषिय घाटा बढ़ रहा है। मुद्रास्फीति व महंगाई बढ़ी है। बढ़ती जनसंख्या व आर्थिक असमानता के बीच बढ़ती जनसंख्या विकराल रूप धारण कर रही है। देश की विकास रणनीति श्रम व उत्पादकता उन्मुख होनी चाहिए, बेरोजगारी मिटाने के लिए दिखावटी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। समग्र विकास के लिए आवश्यक है कि रोजगार सृजन हो। वर्तमान सरकार अपने कार्यकाल में 7 फीसदी के आसपास विकास दर अर्जित करने को प्रयासरत है। आर्थिक विकास दर का लक्ष्य रखा है लेकिन रोजगार सृजन की स्थिति तो अत्यन्त चिंताजनक है। सरकार देश में सर्वाधिक युवा शक्ति होने का दंभ भरती है परन्तु युवाओं को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ रही है।   
डॉ. सत्यनारायण सिंह (आई.ए.एस.) (आर) (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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