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ओपिनियन

कानून को जन प्रिय बहुमत नहीं

Friday, December 20, 2019 12:40 PM
अमित शाह (फाइल फोटो)

नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित हो गया है। जिस भारी बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी चुनाव में विजयी हुई थी, उसे देखते हुए कानून का पारित न होना ही आश्चर्य की बात होती। अब देशभर में इस कानून को लेकर प्रतिक्रिया हो रही है। इस कानून का विरोध करने वाले सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गए हैं- वे इस कानून को संविधान विरोधी बता रहे हैं। कोर्ट का निर्णय क्या होगा यह तो आने वाला कल ही बतायेगा, लेकिन देशभर में जिस तरह से इस कानून का विरोध हो रहा है, उसे सिर्फ राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित अथवा कुछ उपद्रवी तत्वों की कार्रवाई बताकर ही समझा जाना वास्तविकता से आंख चुराना ही होगा। असम से लेकर मुंबई तक और दिल्ली से लेकर केरल तक विद्यार्थियों का विरोध-प्रदर्शन कुछ कह रहा है, इसे अनसुना करने का मतलब जनतांत्रिक मूल्यों-परंपराओं को अस्वीकारना होगा। यह सही है कि संसद ने बहुमत से कानून पारित किया है, पर एक लोकप्रियता का बहुमत भी होता है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसी लोकप्रियता की कसौटी पर इस कानून को परखने की बात कही है।

जनतंत्र में विरोध का विशेष महत्व होता है। विरोध छोटा या कमजोर हो, तब भी उसकी अवहेलना नहीं होनी चाहिए और न ही उसे नकारा जाना चाहिए। जिस तरह का वातावरण आज देश में बन रहा है, उसे मात्र राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बताकर सत्तारूढ़ पक्ष अपने बहुमत की दुहाई दे सकता है, लेकिन इस सवाल का जवाब वह अब तक युक्तियुक्त ढंग से नहीं दे पाया कि इस कानून में एक धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार क्यों कर दिया गया है। अपेक्षा थी कि सरकार, विशेषकर सबका साथ, सबका विकास की बात कहने वाले प्रधानमंत्री, इस संदर्भ में पूरे देश को अपनी बात समझने का ठोस प्रयास करेंगे। पर जब प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि कानून का विरोध करने वालों के कपड़ों से ही पता चल जाता है कि उनका उद्देश्य क्या है, तो स्पष्ट दिखता है कि वे देशभर में हो रहे विरोध को राजनीति के चश्मे से ही देख रहे हैं।

वस्तुत: यह विरोध या ऐसा कोई भी विरोध सरकार की रीति-नीति का विरोध होता है, इसे देश के साथ गद्दारी कहना गलत है। विरोधियों को पाकिस्तान की भाषा बोलने वाले कहना भी उतना ही गलत है। जनतंत्र में विरोध का सम्मान किया जाता है, विरोध के कारणों को समझने की कोशिश की जाती है, उनके निवारण के उपाय खोजे जाते हैं। दुर्भाग्य से आज ऐसा होता नहीं दिख रहा। इस सारे संदर्भ में राष्ट्रवाद की दुहाई देना भी एक गलत तर्क द्वारा अपने पक्ष को सही सिद्ध करने की कोशिश ही कहा जाएगा। यहां मुझे देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल की एक बात याद आ रही है। संविधान सभा में नागरिकता के संदर्भ में बोलते हुए उन्होंने कहा था, हम संकुचित राष्ट्रवाद के नजरिए को स्वीकार नहीं कर सकते। संकुचित राष्ट्रवाद से उनका मतलब वह राष्ट्रवाद था जिसका आधार धर्म या जाति हो। कोई हिंदू या मुसलमान या ईसाई आदि होने पर गर्व कर सकता है, पर एक संविधान में विश्वास करने वाले नागरिक के नाते भारतीय होने पर गर्व करना ही हमारी सही पहचान है। सवाल यह भी है कि मेरे हिंदू या मुसलमान होने में मेरा क्या योगदान है। यह पहचान तो मुझे धर्म-विशेष वाले परिवार में पैदा होने से मिली है। मैं इस पर गर्व करने का अधिकारी तभी हो सकता हूं जब मैं अपना कुछ योगदान करुं अपने होने में। हिंदू परिवार में जन्मा हूं तो अच्छा हिंदू बनने की कोशिश करूं। अच्छा हिंदू यानी परायी पीड़ को जानने वाला, वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास करने वाला, यह मानने वाला कि सत्य एक ही है, जिसे ज्ञानी लोग अलग-अलग तरह से समझते हैं। यह समझने वाला कि हम सब यानी मनुष्य मात्र एक ईश्वर की संतान हैं, अलग-अलग धार्मिक विश्वास उसी ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं... ये सब बातें ही मुझे अच्छा हिंदू या इंसान बनाती हैं। सब धर्म यही सिखाते हैं। बस, हम सीखना नहीं चाहते।

जब सरदार पटेल ने नागरिकता का विस्तृत दृष्टिकोण अपनाने की बात कही थी तो वे वस्तुत: इसी अच्छा इंसान वाली बात को ही समझा रहे थे। हमें अच्छा इंसान भी बनना है और हमें न्यायपूर्ण समाज भी बनाना है। ऐसा समाज कानून के समक्ष समानता के आधार पर ही बन सकता। उस समाज धर्म या जाति या वर्ण-वर्ग के आधार पर किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। हमने अपने लिए जिस संविधान को स्वीकारा है, वह भी इसी प्रकार के न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए ही है। इसलिए, धर्म के आधार पर नागरिकता का निर्धारण न्याय की अनदेखी करना ही होगा। इसीलिए संसद में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध बार-बार इस आधार पर हो रहा था किसी एक धर्म को नकार कर शेष धर्मों के लोगों को नागरिकता देने की बात हमारे संविधान का अपमान है, और उन मूल्यों का भी, जिनके आधार पर हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी।          
विश्वनाथ सचदेव (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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