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ओपिनियन

बच्चों के लिए सुकुन भरा होगा यह फैसला

Friday, November 15, 2019 10:00 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

चीन सरकार का हालिया फैसला बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार की गंभीरता को दर्शाता है। अब चीन में बच्चों को रात दस बजे के बाद अनिवार्यत: सोना होगा। हालांकि इस पर दुनिया के देशों में बहस शुरु हो चुकी है। पर यह चीन सरकार का सही समय पर सही निर्णय माना जा सकता है। हालांकि चीन की सरकार का यह निर्णय बच्चों के होमवर्क के बढ़ते बोझ के संदर्भ और शिक्षा व्यवस्था के सुधार के रुप में देखा जा रहा है। लेकिन देखा जाए तो क्या बच्चे क्या बड़े देर रात तक जगना और फिर या तो नींद पूरी नहीं होना या देर से उठना गंभीर चुनौती के रुप में उभर रही है। दुनिया के देशों में तेजी से अनिद्रा की बीमारी फैल रही है तो देर रात यहां तक कि आधी रात तक जगते रहने से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव गंभीर समस्या बनता जा रहा है। देर रात तक नींद नहीं आने की बीमारी आम होती जा रही है। यहां स्वास्थ्य विज्ञानियों व मनोविश्लेषकों का साफ-साफ मानना है और स्वास्थ्य विज्ञान को लेकर पिछले दिनों आए अनेक निष्कर्षों से यह साफ हो चुका है कि समय पर नहीं सोने और नहीं जागने से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, कुंठा, आक्रोश, ब्लड प्रेशर और ना जाने कितनी ही बीमारियां केवल और केवल नींद पूरी नहीं होने से जुड़ी है।

दरअसल मानसिक बीमारियों और डिप्रेशन का एक बड़ा कारण नींद पूरी नहीं होना है। बदलती जीवन शैली का ही परिणाम है कि देश दुनिया में नींद की दवाओं के कारोबार में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक बार सोने जागने की व्यवस्था अनियमित हो जाती है तो फिर पूरी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती है और उसके बाद समय रहते आदत में सुधार नहीं होता है तो फिर सीधे सीधे स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ने लगता है। जहां तक बच्चों का प्रश्न है आज की व्यवस्था से बच्चे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। दरअसल जब कोई व्यवस्था लागू करते हैं तो पुरानी कहावत में कहे तो उस समय हम आगा-पीछा नहीं सोचते और जब समस्या गंभीर हो जाती है या विरोध के स्वर तेज होने लगते हैं तब सोचना शुरु करते हैं। फिर तो एक के बाद आयोग पर आयोग बनने लगते हैं। आज बच्चे किस कदर तनाव से गुजरने लगे है उसकी गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि छोटे-छोटे बच्चे बस्तों के बोझ से दबे जा रहे हैं। जब चिकित्सा विज्ञानियों और समाज विज्ञानियों ने बच्चों की पीठ पर स्कूल बैग के बोझ के चलते बच्चों के सीधे चलने तक में कठिनाई की और ध्यान दिलाया तब जाकर सरकारों ने इस और सोचना शुरु किया। इसी तरह से बच्चों के तनाव का एक बड़ा कारण अब पेरेन्टस की अति महत्वाकांक्षा होती जा रही है।

टीवी चैनलों के बच्चों के रियलिटी प्रोग्राम हो या आईआईटी-डॉक्टर बनाने की अंधी होड़ में स्कूल के साथ-साथ कोचिंग का बोझ बच्चों की मानसिकता को प्रभावित कर रही है। इसके अलावा दिखाए जाने वाले अधिकांश विज्ञापन बच्चों को केन्द्रीत कर ही बनाए जा रहे हैं तो वीडियो गेम्स और टीवी चैनलों पर बच्चों के कार्यक्रमों का देर रात तक प्रसारण निश्चित रुप से बच्चों की मानसिकता को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही सिनेमा हॉल का टीवी के रुप में घर पर आना और देर रात तक सास-बहू जैसे सीरियलों में टीवी चैनलों पर एक दूसरे के खिलाफ अंतहीन साजिशों का सिलसिला बच्चों के कोमल दिमाग पर विपरीत प्रभाव ड़ाल रहा है। इसी तरह से सावधान इण्डिया या इसी तरह के दूसरे कार्यक्रम बच्चों की कच्ची मानसिकता को प्रभावित कर रहे हैं। थिएटर के घर के ड्राइंग रुम ही नहीं अब तो बेड़ रुम में प्रवेश के यह दुष्परिणाम भी अब सामने आने लगे हैं। खुले मैदान के बच्चों के परंपरागत खेल अतीत की बात होते जा रहे है और बच्चे वीडियो गेम के आदी होते जा रहे हैं। बच्चों का कोमल मन और संवेदनाएं कहीं खोती जा रही है और उसका स्थान कुंठा, संवेदनहीनता, अवसाद आदि लेते जा रहे हैं। यह एक तरह से अंतहीन सिलसिला चल निकला है। हालांकि अब देश दुनिया के सरकारें गंभीर होने लगी है। चाइल्ड लॉक या इसी तरह के दूसरे उपाय इस समस्या का हल नहीं हो सकता। ऐसे में चीन सरकार का हालिया फैसला सराहनीय माना जाना चाहिए।

बात भले ही दकियानुसी लगे पर इसमें आज भी दम है। अभी भी उम्र के पांचवें या छठे दशक के पड़ाव में चल रहे लोगों को याद होगा कि उनके जमाने में जल्दी सोना और जल्दी उठना स्वास्थ्य की पहली शर्त होती थी। सूर्योदय से पहले बिस्तर छोड़ देने और रात नौ दस बजे तक सो जाना बच्चों को सिखाया जाता था। कोई भी मेडिकल पैथी हो सभी में नींद का पूरा होना जरुरी बताया गया है। उम्र के हिसाब से कम से कम कितने घंटे सोना जरुरी है उसका भी निर्धारण किया हुआ है। ऐसे में चीन सरकार द्वारा बच्चों के लिए रात दस बजे तक सोना अनिवार्य करने की व्यवस्था को आलोचना से उपर उठकर सराहना की जानी चाहिए ताकि बच्चों के स्वास्थ्य से हो रहे खिलवाड़ से उन्हें बचाया जा सके। बचपन में ही प्रोढ़ बनाने की पेरेन्ट्स की आदत को बदलना होगा। हमारी सोच में बदलाव लाना होगा। बच्चे ही नहीं परिवार के सभी सदस्यों के नियत समय पर सोने और उठने की आदत निश्चित रुप से लाभदायक होगी। हमारे देश सहित दुनिया के देशों को चीन की पहल का स्वागत करते हुए इस तरह की व्यवस्था अपने देशों में भी करनी चाहिए। केवल नींद पूरी होने मात्र से ही कई बीमारियों खासतौर से मानसिक बीमारियों से आसानी से निजात मिल सकती है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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