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Wednesday 1st of April 2020
 
ओपिनियन

‘आप’ जीती, कांग्रेसी गाए बधाई

Monday, February 24, 2020 14:30 PM
पी चिदंबरम (फाइल फोटो)

दिल्ली महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम को आईना दिखाया है। उन्होंने उन कांग्रेसियों की बोलती बंद कर दी जो दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) को मिली विजय पर ‘बधाई’ गा रहे थे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा ने चिदम्बरम के एक ट्वीट को री-ट्वीट करते हुए कहा है, वह बस इतना जानना चाहतीं हैं क्या कांग्रेस पार्टी अन्य राज्यों में भाजपा को हराने के लिए क्षेत्रीय दलों को आउट सोर्स कर रही है? यदि नहीं तो फिर हम अपनी पराजय पर मंथन करने की बजाए ‘आप’ की जीत पर गर्व क्यों कर रहे हैं? और अगर ऐसा है तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी को सम्भवत: अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए।

चिदम्बरम ने आम आदमी पार्टी की विजय पर कहा था, ‘आप जीती’ झांसा और दर्पोक्ति की हार। उन्होंने यह भी कहा था कि ‘मैं दिल्ली वालों को सलाम करता हूं। उन्होंने 2021 और 2022 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं उनके लिए मिसाल पेश की है। जो दिल्ली में हुआ वह अन्य राज्यों में भी हो सकता है। दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार पर चिंता करने की बजाए भाजपा की पराजय पर खुश होने वालों की सूची काफी लंबी है। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी की प्रतिक्रिया को लें। चौधरी ने एग्जिट पोल के नतीजों के आधार पर कहा था, इस चुनाव में भाजपा ने अपना साम्प्रदायिक एजेंडा चलाया, अगर केजरीवाल जीतते हैं तो यह विकास के एजेण्डे की जीत होगी।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की प्रतिक्रिया और भी बचकानी श्रेणी की रही। उन्होंने भाजपा को आईना दिखाने के लिए केजरीवाल को बधाई दी। कमलनाथ से सवाल किया जा सकता है केजरीवाल तो पिछले तीन विधानसभा चुनावों से कांग्रेस को भी आईना दिखा रहे हैं तब आपका, आप बधाई गान सिर्फ भाजपा को कोसने तक क्यों सीमित रहा। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला की प्रतिक्रिया में ‘आप’ की स्तुति झलकती है। सुरजेवाला की टिप्पणी का विश्लेषण करें। उन्होंने कहा, ध्रुवीकरण के प्रयास कुछ हद तक सफल रहे। दिल्ली ने साम्प्रदायिक ताकतों का साथ नहीं दिया। कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं के दिल भी ‘आप बधाई-गान’ के लिए मचल रहे थे लेकिन शर्मिष्ठा मुखर्जी के ट्वीट के बाद उन्हें मन-मसोस कर चुप रहना पड़ेगा।

कांग्रेस में अलका लांबा और सांसद केटीएस तुलसी की प्रतिक्रिया अवश्य संतुलित और व्यावहारिक कही जा सकती है। तुलसी ने कहा है कि दिल्ली में भाजपा-विरोधी वोटों का बंटवारा रोकने और आपको जिताने के लिए कांग्रेस ने खुद को कुर्बान कर दिया। अधीर रंजन चौधरी से कुछ हद तक अधिक राजनीतिक परिपक्वता अलका लांबा की प्रतिक्रिया से झलकती है। चांदनी चौक से कांग्रेस प्रत्याशी रहीं अलका ने कहा कि पूरी तरह हिंदू और मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण हो गया था। वैसे, उनकी यह बात पचास प्रतिशत ही सही कही जा सकती है। मुफ्तखोरी की राजनीति के साथ मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण ‘आप’ की विजय का एक बड़ा कारण रहा है। मुसलमानों ने भाजपा के विरोध में ‘आप’ के पक्ष में एक तरफा मतदान किया। दूसरी ओर भाजपा अपने पक्ष में हिंदू मतों का ध्रुवीकरण नहीं कर पाई। कांग्रेस के पुराने और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता दिल्ली चुनावों के परिणामों और उस पर कुछ नेताओं की प्रतिक्रियाओं पर अवश्य चिंतित होंगे।

बात चिंता की है। लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस लगातार तीन बार चुनाव हारी है। उसका वोट प्रतिशत गिरकर चार प्रतिशत पर आ गया। लगातार दूसरी बार कांग्रेस दिल्ली में खाता नहीं खोल पाई। शर्मनाक बात यह है कि इस बार कांग्रेस के 63 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। मतदाताओं पर कांग्रेस की पकड़ छूटने के लिए दिल्ली कांग्रेस के प्रभारी पी सी चाको ने दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर दोष मढ़ा है। पद से इस्तीफा देने के बाद चाको ने कहा कि 2013 में शीला दीक्षित के समय ही कांग्रेस का वोट बैंक कम होने लगा था। अब कांग्रेस का समूचा वोट बैंक ‘आप’ के पास चला गया है। चाको की टिप्पणी को सही माना लें तब भी वह दिल्ली में कांग्रेस की चुनावी तबाही की जिम्मेदारी से स्वयं को अलग नहीं रख सकते। दिल्ली कांग्रेस का प्रभारी रहते स्वयं चाको ने पार्टी को बचाने और उबारने के लिए क्या किया था?

दिल्ली के चुनाव परिणामों के बाद जिस तरह की बातें कांग्रेसी कर रहे हैं, उससे बोध तो यही होता है कि इस दुर्दशा का पूर्वाभास उन्हें पहले से था। क्या कांग्रेस की शर्मनाक पराजय को टेक्टीकल डीफीट कहा जा सकता है। कांग्रेस को अहसास था कि वह भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। इसीलिए उसने अनमने ढंग से विधानसभा चुनाव लड़ा। कह सकते हैं कि उसने चुनाव लड़ कर चेहरा दिखाने की औपचारिकता पूरी की थी। भाजपा को विजय से वंचित करने के लिए उसने कब का मैदान छोड़ दिया था। इस आरोप का क्या कोई जवाब है कि कांग्रेस ने चुनाव भाजपा के हिंदू वोट काटने के लक्ष्य से लड़ा था? और अब क्या किया जा रहा है? ‘आप’ की विजय पर ‘बधाई’ गाई जा रही है। शर्मिष्ठा मुखर्जी जैसे खुद्दार कांग्रेसियों को इस पर दुख होना और गुस्सा आना स्वाभाविक है। दुश्मन की एक आंख फोड़ने के चक्कर में अपनी दोनों आंखें फुड़वा लेना क्या बुद्धिमानी है।                          
-अनिल बिहारी श्रीवास्तव (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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