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भारत-श्रीलंका रिश्ते में नई सनसनी संभव

Friday, November 29, 2019 11:45 AM
श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्ष

श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्ष अपने पहले विदेशी दौरे में भारत आ रहे हैं। राष्ट्रपति चुने जाने की बधाई उन्हें सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी। शपथ ग्रहण के अगले दिन 19 नवंबर को राष्टÑपति गोटाबाया राजपक्ष से मिलने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर कोलंबो पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निमंत्रण पत्र राजपक्ष को दिया। जयशंकर के साथ श्रीलंका में भारत के हाई कमिश्नर चरनजीत सिंह संधू भी थे। गोटाबाया ने नरेंद्र मोदी का न्योता स्वीकार कर लिया और 29 नवंबर को भारत आने का प्रोग्राम बना लिया।


नए श्रीलंका राष्टÑपति के कार्यकाल में उनका भारत से कैसा रिश्ता रहेगा। इसके आकलन के लिए उनके अगले कदम का इंतजार तो करना होगा । लेकिन ऐसे सनसनीखेज वातावरण में राष्टÑपति चुनाव हुए और पिछले राष्टÑपति का कार्यकाल गुजरा, उससे भारत-श्रीलंका रिश्ते में सनसनी कम होने की गुंजाईश नहीं लग रही है। गोटाबाया राजपक्ष ने मैत्रीपाला सिरिसेना की जगह ली है। सिरिसेना ने भी राष्टÑपति बनने के बाद सबसे पहले भारत आने का प्रोग्राम फरवरी 2015 में बनाया । सिरिसेना ने राष्टÑपति चुनाव में महिंदा राजपक्ष को हराया था । महिंदा राजपक्ष के ‘सहयोग’ से मैत्रीपाला सिरिसेना ने युनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलायंस नाम से राष्टÑीय मेलजोल सरकार बनाई। उसके बाद से ही श्रीलंका के अंदरूनी मेलजोल और भारत-श्रीलंका रिश्ते में उथल-पुथल शुरू हो गई। इस सबके सूत्रधार थे, मंहिदा राजपक्ष जो 2005 से 2014 तक राष्टÑपति थे।


महिंदा राजपक्ष मंत्रिमंडल में पूर्व मंत्री मैत्रीपाला सिरिसेना अपने पूरे कार्यकाल 2014-2019 में भारत-श्रीलंका रिश्ता बिगाड़ने और सरकार के अंदर उठापटक मचाने में जुटे रहे। महिंदा राजपक्ष ने भारत को मोहरा बनाया और रिश्ते में सनसनी फैलाने वाली कूटनीतिक चालबाजी में मैत्रीपाला सिरिसेना को भी लपेटे में ले लिया। मैत्रीपाला सिरिसेना राष्टÑपति पद के उम्मीदवार अभी नहीं बने। गोटाबाया राजपक्ष ने अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्ष के प्रबल प्रतिद्वंद्वी युनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के उम्मीदवार साजित प्रेमदास को हराया। यूएनपी प्रमुख रानिल विक्रम सिंधे प्रधानमंत्री थे, जिनसे इस्तीफा दिलवाकर नए राष्टÑपति ने बड़े भाई को प्रधानमंत्री बनाया।


अब राष्टÑपति को जल्द से जल्द संसदीय चुनाव कराना है, क्योंकि वर्तमान संसद में बहुमत युनाइटेड नेशनल पार्टी के साथ है। इसका सबूत रानिल विक्रम सिंधे दो बार दे चुके हैं। उसी के चलते महिंदा राजपक्ष को गत वर्ष दिसंबर में प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा। राष्टÑपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने रानिल विक्रम सिंधे को अचानक बर्खास्त करके महिंदा राजपक्ष को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था। गोटाबाया राजपक्ष ने 18 नवंबर को राष्टÑपति पद की शपथ लेने के बाद कहा कि श्रीलंका के सभी देशों से मैत्रीपूर्ण संबंध रहेंगे और अंतरराष्टÑीय ताकतों से जुड़े विवादों में न पड़कर ‘तटस्थता’ की नीति अपनाई जाएगी। मगर वास्तव में और खासकर चीन के मामले में श्रीलंका तटस्थ रह पाएगा या नहीं, इसके लिए वक्त का इंतजार करने की जरूरत नहीं। मैत्रीपाला सिरिसेना के कार्यकाल में श्रीलंका की चीन से नजदीकी बनी रही और भारत से संबंध अच्छे नहीं बने। श्रीलंका हमेशा से चीन का व्यावसायिक तथा सामरिक अड्डा बना रहा। महिंदा राजपक्ष शासनकाल में चीन से दोस्ती गहरी हुई और भारत से तनातनी रही। मैत्रीपाला सिरिसेना के राष्टÑपति बनने के बाद भी भारत से जुड़े घरेलू और विदेशी मामलों में नीति निर्धारण की कमान महिंदा राजपक्ष के ही हाथों में रही। 2015 में श्रीलंका का राजनीतिक घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा कि मैत्रीपाला सिरिसेना जनवरी में राष्टÑपति चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले भारत आए और ‘अच्छे रिश्ते’ का भरोसा दिलाया। फिर उसके बाद अगस्त में रानिल विक्रम सिंधे श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के मैत्रीपाला समर्थक गुट के समर्थन से महिंदा राजपक्ष को संसदीय चुनाव में हराकर प्रधानमंत्री बने। विक्रम सिंधे भी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सबसे पहले भारत आए । मैत्रीपाला सिरिसेना महिंदा रापजक्ष की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के ही हैं।


श्रीलंका की वर्तमान संसद में नए राष्टÑपति के लिए और नए प्रधानमंत्री के लिए कोई भी बिल पास कराना कठिन होगा। क्योंकि 225 सदस्यीय संसद में राजपक्ष एंड कंपनी के मात्र 96 सदस्य हैं । इसलिए समय पूर्व राष्टÑपति चुनाव की तरह समय पूर्व संसदीय चुनाव भी होने की संभावना है। वर्तमान संसद का कार्यकाल अगस्त, 2020 तक है। संविधान के अनुसार राष्टÑपति मार्च में संसद भंग करके चुनाव का एलान कर सकते हैं। गोटाबाया राजपक्ष की सिंहली समर्थक पार्टी को अगर जीत नहीं मिली तो फिर उथल-पुथल जारी रहेगी और उसका ठीकरा भारत के मत्थे मढ़ा जाएगा। इसके लिए थोड़ा पीछे चलें। अप्रैल, 2018 में महिंदा राजपक्ष के इशारे पर रानिल विक्रम सिंधे के खिलाफ  पेश अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में राष्टÑपति मैत्रीपाला सिरिसेना गुट के सांसद समेत 6 मंत्रियों ने वोट डाले। 

- शशिधर खान (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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