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ओपिनियन

युद्ध की शांति है तो आजादी ही गुलामी है?

Thursday, November 21, 2019 11:25 AM
संसद भवन।

आज के नए भारत को समझने के लिए हम लोगों को जॉर्ज औरवैल का, अंग्रेजी भाषा में लिखा उपन्यास 1984 एक बार जरूर पढ़ना चाहिए, क्योंकि अब हमारा लोकतंत्र, संविधान और आजादी एक-ऐसी प्रयोगशाला में बदल गए हैं जहां हर डॉक्टर जनता को किसी विकास और परिवर्तन की खोज में किसी मेंढक, चूहे, छिपकली, बंदर और मुर्दा शरीर की तरह इस्तेमाल कर रहा है। जिस तरह पथ के दावेदार कभी, जीवन के हर रास्ते पर अपना अधिकार जताते थे, ठीक उसी तरह आज लोकतंत्र का हर प्रथम सेवक हमें ये समझा रहा है कि युद्ध ही शांति है तो आजादी ही गुलामी है तो अज्ञान ही शक्ति है। चारों तरफ एक ऐसा भय, आशंका, आतंक और अविश्वास का अंधेरा फैल गया है कि धरती, आकाश, वायु, अग्नि, जल सभी एक दूसरे की जासूसी कर रहे हैं और लग रहा है कि कोई अदृश्य महाबली हमें देख रहा है।

हमारे आज की ये कहानी हमारे बीते हुए कल में जॉर्ज औरवैल ने एक भविष्यवाणी की तरह अपने प्रसिद्ध उपन्यास 1984 में लिखी थी। जिस तरह कभी कथाकार प्रेमचन्द ने भारत के गांव, गरीब और किसान की व्यथा-कथा अपने उपन्यास ‘गोदान’ में हमें सुनाई भी और मैक्सिम गोर्की ने कभी अपने उपन्यास ‘मां’ के बहाने रूस की जारशाही की दारूण गाथा बताई थी और कभी ज्यांपॉल सात्र, माओत्से तुंग, अब्राहम लिंकन, मार्टीन लूथर किंग और नेल्सन मण्डेला ने अपने-अपने देश, काल और समाज की आप बीती दर्द और पीड़ा हमें अपनी कविता और कथाओं से समझाई थी, ठीक वैसे ही नए भारत की ये महाकथा जॉर्ज औरवेल ने भारत में जन्म लेकर ही (1903-1950) के बीच प्राप्त अल्प आयु में दिखाई है।

दूसरे विश्व युद्ध (1940) के  बाद की दुनिया और आज की दुनिया के बीच में जो कुछ अब घटित हो रहा है उसे जानने के लिए हमें एक  बार फिर से अपन भीतर के इस नए सच और झूठ को पढ़ना चाहिए। उपनिवेशवाद से साम्राज्यवाद और सामंतवाद और समाजवाद तथा लोकतंत्र के रास्ते- राष्ट्रवाद तक आते-आते हमारा भूत, भविष्य और वर्तमान अब इतना हिंसक और संवेदनहीन हो गया है कि भारत का आम नागरिक जैसे मौत के कुए में सपनों की साइकिल चला रहा है। हम भारत के लोग अपने संविधान की शपथ को बार-बार दोहराते हुए कभी अपनी आत्मा और परमात्मा से तो कभी अपनी आस्था और परम्परा से पूछ रहे हैं कि जब जीना और मरना सभी यहीं है, तो फिर हम कहां जाएं?

आपने कभी सोचा ही नहीं होगा कि आजादी (1947) के बाद हमारी पहली मुठभेड़ महात्मा गांधी की साम्प्रदायिक शहादत से होगी तो दूसरी मुठभेड़ पृथकतावाद, आतंकवाद और राष्ट्रवाद से होगी तो फिर कोई भिड़न्त मण्डल-कमण्डल से होगी और आपातकाल से गुजर कर हम राम-रहीम में बंट जाएंगे तो मंदिर-मस्जिद के नाम पर धर्म और आस्था के रथ पर सवार होकर अपने लोकतंत्र, संविधान और आजादी को गैर बराबरी के दल-दल में फंसाएंगे। हमें अनुमान तक नहीं था कि 1990 के बाद ये दुनिया एक खुले बाजार में बदल जाएगी और समाजवाद तथा धर्म निरपेक्षता का हमारा सपना भूख, गरीबी, अशिक्षा, कुपोशण और जाति-धर्म की महाभारत में बदल जाएगा। हमें ये भी पता नहीं था कि भारत के 135 करोड़ देवी-देवता अपने अच्छे दिनों की तलाश में अपने लोकतंत्र को ही बहुमत की तानाशाही का अखाड़ा बना देंगे और धारा 370, समान नागरिक संहिता और मंदिर निर्माण को ही लोकतंत्र का विकल्प समझ लेंगे?

अब हमारी आजादी, संविधान और लोकतंत्र-इतनी उलझन में और धर्म-आस्था के आदिकाल में चला गया है कि हिंसा ही अहिंसा हो गई है, तो झूठ ही सत्य के प्रयोग बन गए हैं तो प्रतिबंध ही मानवाधिकार समझ लिए गए हैं तो बहुमत के आदेश ही सर्वमत के जनादेश हो गए हैं। जॉर्ज औरवैल का उपन्यास 1984 अब 2019 में इस तरह साकार हो रहा है कि जैसे विज्ञान और धर्म-आस्था की जुगलबंदी ने जनता को जुगलबंदी ने जनता को गुलामों का द्वीप समूह बना दिया है तो विकास और परिवर्तन को ही तेरी, मेरी, सबकी चौकीदारी में बदल दिया है। एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना अब एक देश, एक चुनाव और एक व्यक्ति-एक विधान में बदल रहा है क्योंकि लोकतंत्र में जिन्दा कौमों को भी पांच साल तक तानाशाही के बहुमत की भूल-भुलैया में जीना-मरना पड़ता है और रहीम दास को भी बुरे दिनों के चक्कर में चुप बैठना होता है। इसलिए ये हमारा आज बेरोजगारी, महंगाई, दलित- महिला उत्पीड़न और कश्मीर में धारा 370, नागरिक अधिकारोंं के हनन और गांव-गरीब की बदहाली पर अब बाजार और झूठ का प्रचार मुस्करा रहा है। ऐसे असुरक्षित लोकतंत्र में जहां विधायिका और कार्य पालिका मिलकर बहुमत को एकाधिकार और फिर तानाशाही में बदल रही हो तब फिर न्यायपालिका भी आस्था के दबाव से मुक्त होकर लोकतंत्र और संविधान को भला कैसे बचा सकती है? क्योंकि बड़ा भाई (दादा) सबको देख रहा है और कोई जॉर्ज औरवैल (1984) फिर से हमें याद दिला रहा है कि नए भारत में युद्ध ही शांति है तो आजादी ही गुलामी है और अज्ञान ही शक्ति है। अत: जोर से बोलिए-भारत माता की, जय हो!
वेदव्यास (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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