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ओपिनियन

बढ़ती जा रही है कैंसर की चुनौती

Friday, February 07, 2020 13:15 PM
कॉन्सेप्ट फोटो।

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में 10 भारतीयों में से एक को अपने जीवनकाल में कैंसर होने और 15 में से एक की इस बीमारी से मौत होने की आशंका जताई है। भारत में 2018 में कैंसर के लगभग 11.6 लाख मामले सामने आए और कैंसर के कारण 7,84,800 लोगों की मौत हो गई। दरअसल, कैंसर का तात्पर्य शरीर में अनियंत्रित रूप से वृद्धि करने वाली कोशिकाओं से हैं। यह अनावश्यक रूप से वृद्धि कर ऊतक को प्रभावित करती है तथा शरीर के बचे हुए भाग को इसके संपर्क में ले लेती है। कैंसर एक ऐसा रोग है जो किसी भी उम्र में हो सकता है। यह एक साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक में पाया जा सकता है। वैसे तो कैंसर के सौ से अधिक प्रकार हैं लेकिन इनमें स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, ब्रेन कैंसर, बोन कैंसर, ब्लैडर कैंसर, पेंक्रियाटिक कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, गर्भाशय कैंसर, किडनी कैंसर, लंग कैंसर, त्वचा कैंसर, स्टमक कैंसर, थायरॉड कैंसर, मुंह का कैंसर व गले का कैंसर प्रमुख है।

आमतौर पर शरीर के वजन बढ़ने व शारीरिक सक्रियता में कमी आने तथा दोषपूर्ण व असंतुलित खान-पान, व्यायाम नहीं करने, नशीले पदार्थों के रूप में अल्कोहल की अधिक मात्रा का सेवन करने से इस रोग के शिकार होने की संभावना अधिक रहती है। चाय और कॉफी जैसे पेय पदार्थों के आदी व्यक्ति को भी कैंसर होने का ज्यादा खतरा रहता है क्योंकि चाय और कॉफी में चार हजार से अधिक घातक तत्व पाए जाते हैं। इसके अलावा मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति में कैंसर होने की अधिक संभावनाएं होती हैं। कैंसर एक आनुवांशिक बीमारी होने के कारण कई बार कैंसर से पीड़ित माता-पिता के जीन के माध्यम से यह बीमारी उनकी संतान में भी आ जाती है। वहीं दवाओं के साइड इफेक्ट्स से भी कैंसर होने की बात की जाती है। देश में सामान्य, ओरल, सर्वाइकल और ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2019 की रिपोर्ट के मुताबिक एनसीडी क्लिनिक्स ने 2017 से 2018 के बीच कैंसर के मामलों की पहचान की है।

आंकड़ों पर गौर करें तो इस एक साल के अंतराल में देश में कैंसर के मामले 324 प्रतिशत यानी तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ गए हैं। राजस्थान में 2017 में सरकारी एनसीडी केंद्रों में पहुंचे करीब 30 लाख (30,91,378) लोगों में से 1,358 लोगों को सामान्य कैंसर निकला। वहीं 2018 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 3,414 हो गया। यह करीब 150 प्रतिशत यानी डेढ़ गुना बढ़ोतरी है। 2017 में 3,57,23,660 लोग जांच कराने पहुंचे। इनमें से 39,635 लोगों में सामान्य कैंसर पाया गया। 2018 में यह संख्या बढ़कर 6,51,94,599 हुई। इनमें 1,68,122 में सामान्य कैंसर की पुष्टि हुई है। गुजरात में 2017 में 3,939 कैंसर पीड़ितों की पुष्टि हुई थी। 2018 में यह संख्या बढ़कर 72,169 हो गई। यानी गुजरात में सामान्य कैंसर के नए मामले 68,230 बढ़े हैं। गुजरात के बाद सबसे खराब हाल कर्नाकट, महाराष्ट्र, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल का रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों की बदलती लाइफस्टाइल, तनाव, खान-पान की आदतें, शराब और तंबाकू सेवन इसकी बड़ी वजह रहा है।

हर दिन औसतन 1300 से अधिक लोग इस डरावनी बीमारी के शिकार हो रहे हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक कैंसर के मामलों में 25 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। हर साल कैंसर के 10 लाख नए मामलों का निदान किया जा रहा है और 2035 तक हर वर्ष कैंसर के कारण मरने वाले लोगों की संख्या बारह लाख तक बढ़ने की उम्मीद है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत में कैंसर रोग से प्रभावितों की दर कम होने के बावजूद यहां 15 प्रतिशत लोग कैंसर के शिकार होकर अपनी जान गंवा देते हैं। डब्लूएचओ की सूची के मुताबिक 172 देशों की सूची में भारत का स्थान 155वां हैं। वर्तमान में कुल 24 लाख लोग इस बीमारी के शिकार है।

एक अनुमान के मुताबिक भारत में 42 प्रतिशत पुरुष और 18 प्रतिशत महिलाएं तंबाकू के सेवन के कारण कैंसर का शिकार होकर अपनी जान गंवा चुके हैं। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के एक प्रतिवेदन के अनुसार देश मे हर साल इस बीमारी से 70 हजार लोगों की मृत्यु हो जाती है, इनमें से 80 प्रतिशत लोगों के मौत का कारण बीमारी के प्रति उदासीन रवैया है। उन्हें इलाज के लिए डॉक्टर के पास तब ले जाते हैं जब स्थिति लगभग नियंत्रण से बेकाबू हो जाती है। कैंसर संस्थान की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल सामने आ रहे साढ़े बारह लाख नए रोगियों में से लगभग सात लाख महिलाएं होती है। लगभग इनमें से आधी साढ़े तीन लाख महिलाओं की मौत हो जाती है। इनमें से भी 90 प्रतिशत की मृत्यु का कारण रोग के प्रति बरते जाने वाली अगंभीरता है। ये महिलाएं डॉक्टर के पास तभी जाती है जब बीमारी अनियंत्रण की स्थिति में पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति में यह बीमारी लगभग लाइलाज हो चुकी होती है। नि:संदेह यदि किसी व्यक्ति को कैंसर से बचाव करना है या कोई देश अपने को कैंसर मुक्त राष्ट्र बनाने का सपना देखता है तो उसे अपने देश में धड़ल्ले से बिक रहे मादक व नशीले पदार्थों व शराब की फैक्ट्रियों पर राजस्व की चिंता कई बगैर रोक लगाने के लिए कदम उठाने होंगे। यहां तक कि मोटापे को बढ़ाने का कारण बन रहे जंक फूड पर फैट टैक्स लागू कर इनके सेवन से आमजन को बचाने के लिए प्रयत्न करने होंगे।
देवेन्द्रराज सुथार (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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