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महिला दिवस विशेष: चुनौतियों के पथ पर पहचान बनाती महिलाएं

Thursday, March 05, 2020 12:10 PM
परिचर्चा में भाग लेते हुए जेसीआई कोटा सुरभि के सदस्य

कोटा। महिलाएं समाज और परिवार की धुरी हैं, इसके बाद भी आधी आबादी को समानता का हक पूरी तरह से हासिल नहीं हो सका है। महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। अपनी पहचान बनाने के लिए जूझ रही हैं। किंतु इस संघर्ष में सबसे बड़ी बाधा लैंगिक असमानता है। महिलाओं की भागीदारी को कम करके आंका जाता है। वर्ष 2019 में विश्व आर्थिक फोरम की रिपोर्ट में भारत स्त्री-पुरुष असमानता मेें 112वें स्थान पर हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार चीन, श्रीलंका और नेपाल की स्थिति भारत से अच्छी है। स्वास्थ्य  और आर्थिक भागीदारी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत सबसे नीचे स्थान पाने वाले पांच देशों में शामिल है । 

 
जबकि वर्ष 2018 में भारत इस सूची में 108वें स्थान पर था।  वर्ष 2018 के मुकाबले वर्ष 2019 में चार पायदान फिसल गए। आज  उन्नति कर लेने के बाद भी महिला-पुरुष के बीच असमानता की दीवार क्यों? समाज में यदि हम चाहते है कि लैंगिक असमानता दूर हो तो इसकी शुरुआत स्कूलों से करने की जरुरत है। लड़के-लड़कियों को समानता के महत्व के बारे में समझाया जाएं। स्कूलों में नैतिक शिक्षा में यह पाठ पढ़ाया जाएं। शुरू से ही हिंसा के विरुद्घ आवाज उठाने को भी प्रोत्साहित किया जाएं। लैंगिग समानता के महत्व को घर के अंदर भी समझाया जाएं। इसकी शुरुआत जितनी घर से हो सकती है। उतनी ही स्कूलों से भी। इसमें अध्यापक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 
 
बेटे और बेटी में भेदभाव की मानसिकता के कारण आज भी सुदूर, गांवों में बेटियों की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य को महत्व नहीं दिया जाता है। हमारे सांस्कृतिक परिवेश में नारी को देवी मानकर पूजा जाता है। नारी को शक्ति बताकर संबोधित किया जाता है। इसके बाद भी घरेलू हिंसा, दहेज, कन्या, भ्रूण हत्या, बाल विवाह जैसे दंश आज भी महिलाओं को झेलने पड़ रहे हैं। दुखद पहलू तो यह है कि सार्वजनिक स्थलों पर भी महिलाएं सुरक्षित नहीं है। यह सभ्य समाज के लिए सोचने वाली बात है। महिलाओं के आज हर क्षेत्र में तरक्की करने के बाद भी अभी बहुत से लोगों की सोच महिलाओं के प्रति नहीं बदली है।
 
महिला दिवस 8 मार्च के अवसर पर दैनिक नवज्योति ने इसी विषय को उठाया। लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए समाज में किस तरह बदलाव किया जा सकता हैं। लोगों को कैसे जागरूक किया जाए। दैनिक नवज्योति ने ‘जेसीआई कोटा सुरभि’ की महिला सदस्यों व इनके परिजनों के साथ परिचर्चा आयोजित की। जिसमें जेंडर इनइक्वालिटी दूर करने के प्रैक्टिकल सॉल्यूशंस  क्या हों इस विषय पर उनसे सुझाव जानें। परिचर्चा में तीन सदस्यों के सुझाव श्रेष्ठ रहे। परिचर्चा के सफल आयोजन के लिए जेसीआई कोटा सुरभि की अध्यक्ष करिश्मा माहेश्वरी का सराहनीय योगदान रहा। 
 
 
 इंजीनियर नेहा सेठी का कहना है महिलाओं और लड़कियों को समाज में खुलकर अपनी बात कहने दें। वह अपनी समस्याओं के साथ नए नवाचारों पर भी समाज में खुलकर बोल सकेगी। यह महिलाओं और समाज को सशक्त करने में मदद करेगा। महिलाओं को शिक्षित करें- शिक्षा केवल डिग्र्री ही नहीं देती है। बल्कि सोचने और गलत के  खिलाफ आवाज उठाने की क्षमता भी देती है।  समाज लड़की होने पर लड़की को प्रताड़ित करना बंद करना चाहिए। लड़की को पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकारना चाहिए। अगर माता-पिता भेदभाव नहीं करेंगे तो पीढ़ी दर पीढ़ी भी ऐसा नहीं होगा। अगर परिवार द्वारा एक मां को सशक्त और सम्मानित किया जाता है तो आने वाली पीढ़ी भी महिलाओं के महत्व और समानता को समझेगी। लैंगिक समानता केवल महिलाओं के लिए नहीं हैं यह दोनों के लिए हैं।
 
 
सीए स्टूडेंट पुष्पेन्द्र सिंह का कहना है लैंगिक समानता के लिए महिलाओं को शिक्षित करना आवश्यक है। इसके लिए  लोगों और माता-पिता को जागरूक करना चाहिए। महिलाएं शिक्षित होंगी तभी उन्हें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी होगी। महिलाओं को सभी क्षेत्र में रोजगार के समान अवसर प्रदान करने चाहिए। महिला आरक्षण को बढ़ावा देना और इसे सभी जगह लागू करना चाहिए। महिलाओं को शिक्षित करने के लिए गांवों में ‘चल विद्यालय’ ‘रात्रि विद्यालय’ जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। जो ग्र्रामीण विवाहित अशिक्षित महिलाओं को शिक्षित करें। सरकार को प्राइवेट सेक्टर को भी ‘महिला कर्मचारियों की न्यूनतम संख्या’ को रखना जरूरी करना चाहिए। सरकार व समाज पुरुष और लड़कों को लैंगिक समानता के लिए जागरूक करें। बच्चों को बचपन से लैंगिक समानता के लिए जागरूक करना चाहिए लैंगिक समानता के लिए प्रत्येक व्यक्ति को, महिला को जागरूक होना चाहिए।
 
 इंस्टीट्यूट आॅफ चार्टर्ड अकाउन्टेंट्स आॅफ इंडिया कोटा सीए ब्रांच की चेयरपर्सन रजनी मित्तल का कहना है लोगों में जागरूकता पैदा करके कि लड़कियों को समान रूप से शिक्षित करने की आवश्यकता है। ऐसा करके समानता प्राप्त की जा सकती है। महिलाओं के लिए शादी की उम्र बढ़ा कर प्राप्त किया जा सकता है ताकि परिवार लड़कियों के विवाह से परे भी सोचेंगे। लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाओं को सीटों को आरक्षित करके समानता को हासिल किया जा सकता है। चाहे वह शिक्षा, नौकरी आदि हो। लड़कों को महिलाओं के प्रति आदर, सम्मान और समानता के प्रति शिक्षित करें। महिलाओं के लिए बुनियादी शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए। प्रत्येक प्रशासनिक व्यवस्था में महिला सीटें आरक्षित होनी चाहिए। समाज की सोच बदलने के लिए महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा किया जाना चाहिए।
 
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