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सोशल मीडिया : प्लीज,सोशल ही रहने दीजिए!

Monday, September 13, 2021 16:10 PM
कॉंसेप्ट फोटो

अभी तक सिनेमा, दूरदर्शन और समाचारों की दुनिया में ही सीक्वेंस की धूम रहती थी, लेकिन संभवत: पहली बार सोशल मीडिया पर इसकी धमक सुनाई पड़ी है। एक महिला पुलिस कर्मी और आरपीएस की अश्लील वीडियो जिस तरह से दो पार्ट में व्हाट्सएप पर वायरल हुआ है उससे सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मामला चर्चा में आ गया है। पहले भी फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर इस तरह की सामग्री आती रही हैं और इसको लेकर इनके ऑनर तथा विभिन्न सरकारें समय-समय पर तमाम दिशा-निर्देश देते रहे हैं। जिस तरह से गत वर्ष के लॉकडाउन के बाद इन मीडिया टूल का इस्तेमाल तेजी से हुआ है उससे अब समाज में अश्लीलता तथा असमाजिक गतिविधियों के खतरे और बढ़ गए हैं। सोशल मीडिया का दुरुपयोग किस कदर हो रहा है इसका सीधा सा उदाहरण महिला पुलिस कर्मी और आरपीएस के अश्लील वीडियो तो हैं ही,दूसरे वह उदाहरण भी हैं जिसमें मुख्यमंत्री तक के नाम से फर्जी पोस्ट डालना शमिल है। इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है कि छोटे बच्चे ऑनलाइन क्लास में पढ़ते समय अश्लील वीडियो तक सेंड कर देते हैं।


कुछ उदाहरण देख लीजिए

राजस्थान में रीट परीक्षा एक हॉट परीक्षा मानी जा रही है। इसमें रिकॉर्ड परीक्षार्थी बैठे रहे हैं। यह लंबे समय से टलती रही है। गत दिनों पहले किसी ने सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री के नाम से एक फर्जी पोस्ट डाल दी थी। उसके बाद  मुख्यमंत्री के ओएसडी लोकेश शर्मा ने यह बताया कि यह पोस्ट फर्जी है और जिस ट्वीट को मुख्यमंत्री का कहा जा रहा है वह उनका नहीं है। इसी साल मार्च माह में फोन टेपिंग पर ऑडियो क्लिप का मामला भी काफी चर्चित रहा था। इसकी गंभीरता यह थी कि इस पर कोर्ट में मामला चला गया। व्हाट्सएप पर ही शिक्षा मंत्री के रिश्तेदारों के चयन का मामला भी खूब चला था, बाद में उन्होंने खुद ही कहा था कि इन अफवाहों का वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। इन मामलोें को यदि छोड़ भी दिया जाए तो कोरोना जैसी बीमारी को भी लोगों ने नहीं बख्शा। व्हाट्सएप पर मुख्यमंत्री आपदा सहायता के नाम पर एक फार्म ही जारी कर दिया। जबकि ओएसडी के मुताबिक इसका राजस्थान सरकार से कोई लेना देना नहीं था। यह कुछ मामले हैं जो सीधे राज्य की सर्वोच्च शासन व्यवस्था से जुड़े हैं। इससे ही पता चल जाता है कि सोशल मीडिया को किस तरह अनसोशल बनाया जा रहा है।


सरकारों के प्रयास

देश-विदेश की सरकारें इस मामले में गंभीरता से इस तरह की अनसोशल गतिविधियों को रोकने के प्रति समय-समय पर प्रयास करती रही हैं। व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे टूल पर तो कई बार कानूनी प्रयास भी किए गए हैं लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी अनसोशल पोस्टें रुक ही नहीं रहीं हैं। प्राइवेसी का  कानून भी लंबे समय से विवादों मे रहा है। यह सब तब है जब आईटीएक्ट में गैर जमानती मामला दर्ज करने, दस लाख तक जुर्माना करने और पांच साल तक की कैद की सजा का प्रावधान है। भारत में ही नहीं विदेशों में भी तमाम वीआईपी के सोशल मीडिया एकाउंट गलत सूचनाओं या दूसरे कारणों से फ्रीज होते रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के फेसबुक पेज को फेसबुक ने  इसलिए ही फ्रीज किया गया था कि उनकी एक पोस्ट गलत सूचना मानी थी। भारत में तो समय-समय पर इस तरह के मामले चर्चित रहते हैं।


छोड़ दिया सोशल मीडिया
सोशल मीडिया के अनसोशल होने के खतरे को देखते हुए तमाम सेलिब्रिटी इससे दूर हो चुके हैं। कोरोनाकाल के दौरान आमिर खान ने इसे छोड़ दिया था और कहा था कि उनकी कंपनी अब इसकी जानकारी देगी। उनके बाद ईशा गुप्ता इसे छोड़ गई। वरीना हुसैन ने तो सीधे-सीधे लिखा-सोशल मीडिया आजकल बहुत टॉक्सिक बन गया है इसलिए वह इससे खुद को बचाने के लिए दूर हो रही हैं। भारतीय सिनेमा स्टार खुशबू सुंदर,सोनाक्षी सिन्हा, हॉलीबुड स्टार एलेक बाल्डविन, ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य प्रिंस हैरी और मेगल मार्केल,फेमस सिंगर एड शिरिन आदि के साथ ही ऐसे सेलिब्रिटी की कमी नहीं है जिन्होंने सोशल मीडिया को यह कहते हुए छोड़ा कि यह हमारी प्राइवेसी को खत्म करता है,यह खुशनुमा नहीं है या फिर यहां के ट्रोलर से वह दुखी हो चुके हैं। सोशल को अनसोशल बनाने में इन ट्रोलर्स का बहुत बड़ा हाथ होता है। हालांकि सभी इस माध्यम को छोड़ देते हों ऐसा भी नहीं है,यह लंबे समय के लिए इससे बे्रक ले लेते हैं,और एक समय ऐसा आता है कि फिर इसमें इनकी रूचि न के बराबर रह जाती है। शायद यही कारण है अब एक बड़े वर्ग की मांग होने लगी है कि सोशल मीडिया को सोशल ही रहने दो अनसोशल न बनाएं।


सामाजिक-पारिवारिक परेशानी
सोशल मीडिया पर जिस तरह के कंटेट आजकल बहुतायत में आ रहे हैं उनसे बड़े तो बच जाते हैं या फिर वह उन गु्रप को वह ब्लॉक कर देते हैं अथवा खुद उसमें से निकल जाते हैं,लेकिन छोटे बच्चे इनमें रूचि रखने लगते हैं जिसका परिणाम होता है वह उन साईटों को भी देखते हैं जो उनके लिए प्रतिबंधित या हानिकारक होती हैं। इसके कारण तमाम सामाजिक-पारिवारिक परेशानियां पैदा हो जाती हैं।

        मनोज वार्ष्णेय

(यह लेखक के अपने विचार है)

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