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5 सितंबर शिक्षक दिवस विशेष

Saturday, September 04, 2021 12:00 PM
कॉन्सेप्ट फोटो

शिक्षक दिवस की सभी देशवासियों को अनेक-अनेक शुभमंगलकामनाएं। 5 सितंबर के ही दिन महान् शिक्षक और हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. एस.  राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। चलिए उनके जीवन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना पर पहले प्रकाश डालते हैं। राष्ट्रपति बनने से पूर्व वे बंगलोर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। वे अपने विद्यार्थियों को और विद्यार्थी उन्हें बेहद प्यार करते थे। एक दिन उन्हें आदेश मिला कि उनका तबादला कोलकात्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में कर दिया है। उन्होंने अपने विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें बंगलोर छोड़कर जाना होगा। बच्चे उन्हें जाने नहीं देना चाहते थे। खैर, जाना तो था। जाने का दिन आया। स्टेशन जाने के लिए घोड़ा गाड़ी मंगवाई गई। जैसे ही घोड़ागाड़ी आई बच्चों ने उसमें से घोड़े खोल दिए। औरों घोड़ों की जगह सैंकड़ों बच्चे खुद घोड़ा गाड़ी में जुत गए। पूरे शहर में अपने शिक्षक का जुलूस निकालते हुए उन्हें स्टेशन छोड़कर आए। डॉ. साहब ने पूछा ये सब क्या है? बच्चों ने कहा- ‘आपने हम गधों को घोड़ा बना दिया है।’ अत: हम आपके घोड़े हुए, इसलिए हम घोड़ों की जगह स्वयं जुतकर आए हैं। ऐसा था बच्चों का उनके प्रति आदर सम्मान।
कोई भी शिक्षा जब तक व्यवहार में न लाई जाए, वह कोरी शिक्षा ही रहती है। विद्या नहीं बन पाती। जिस दिन वह व्यवहार में आ जाती है, हमारे काम आने लग जाती है, उसी दिन से वह विद्या बन जाती है। जैसे आपने तैरने के बारे में जानकारी ले ली, किताब में पढ़ लिया। लेकिन जब तक पानी में उतरकर आपने तैरना नहीं सीखा वह मात्र कोरी शिक्षा ही रहती है, जो किसी काम की नहीं। जिस दिन से सीखी हुई शिक्षा व्यवहार में आने लग जाए उसी दिन से वो विद्या बन जाती है। आज ऐसी ही विद्या की जरूरत है। जीवन में विद्या ही काम आती है, कोरी शिक्षा नहीं। इसलिए शिक्षा के व्यवहारिक पक्ष पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए बजाए सैद्धांतिक पक्ष है, तभी कल्याण होगा।आज तो ‘टीचर’ ट्यूटर बन गए हैं। इसलिए अपना सम्मान भी खो बैठे हैं। बच्चा समझता है ‘ये’ तो मेरे बाप का नौकर है, मेरा बाप इसे पैसे देता है और बदले में ‘ये’ पढ़ता है। इसलिए बच्चों में शिक्षकों के प्रति सम्मान भी घटता जा रहा है। बच्चे दूर से झुककर अपने शिक्षक को ‘नमस्ते’ करते हैं और मन ही मन गाली दे रहे होते हैं। टीचर समझता है बच्चा नमस्ते कर रहा है! शिक्षकों का खोया सम्मान फिर से कैसे वापस लाया जाए, इस और गम्भीरता से सोचना होगा। ताली दोनों हाथ से बजती है। शिक्षकों को शिक्षा को व्यवसाय न समझकर सेवा की भावना से पढ़ाना होगा। शिक्षकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। मां-बाप अपने बच्चे के भविष्य की डोर और जिम्मेदारी शिक्षकों के हाथ में सौंपते हैं। कितनी बड़ी जिम्मेदारी है! ये ही बच्चे कल देश का भविष्य बनेंगे। अत: शिक्षकों को अपनी भूमिका ठीक से निभानी होगी, तभी सही मायने में शिक्षक दिवस मनाने की सार्थकता है। शिक्षा के व्यवसायीकरण को सेवा रुप में बदलना होगा। तभी बात बनेगी। आज किसी भी स्कूल में, दो चार स्कूलों की बात छोड़ दें, नैतिक शिक्षा नहीं दी जाती। किसी स्कूल में बच्चों को शील, संयम, सदाचार, शिष्टाचार, लोकाचार, सभ्याचार नहीं सिखाया जाता। विपरीत परिस्थितियों में कैसे सम रहना है, कैसे बड़ों का सम्मान करना हैं, कैसे अपने आपको हर हाल में खुश रखना है, कैसे संसार के द्वंदों के बीच अपने आपको संभालना है। इन सबकी कहीं कोई चर्चा नहीं, कोई शिक्षा नहीं। बस कोर्स पूरा कराया और हो गया! याद रखें स्कूली परीक्षा में तो सिलेबस में से प्रश्न आते हैं, लेकिन जीवन रूपी परीक्षा में कोई भी प्रश्न कहीं से कभी भी आ सकता है। कोई सिलेबस नहीं होता। इन सबके लिए हमें कैसे तैयारी करनी है, ये स्कूलों में सिखाया जाना चाहिए। मात्र रोजी-रोटी कमाने की विद्या भर सीखा देने से काम नहीं चलेगा। आज पढ़ना तो सबको आ गया, पर क्या पढ़ना है यह नहीं आया। हमें फिर से गुरुकुल पद्धति की ओर अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। तभी बात बनेगी।
                 -ललित शर्मा
         (ये लेखक के अपने विचार हैं)


कोई भी शिक्षा जब तक व्यवहार में न लाई जाए, वह कोरी शिक्षा ही रहती है। विद्या नहीं बन पाती। जिस दिन वह व्यवहार में आ जाती है, हमारे काम आने लग जाती है, उसी दिन से वह विद्या बन जाती है। जैसे आपने तैरने के बारे में जानकारी ले ली, किताब में पढ़ लिया। लेकिन जब तक पानी में उतरकर आपने तैरना नहीं सीखा वह मात्र कोरी शिक्षा ही रहती है, जो किसी काम की नहीं। जिस दिन से सीखी हुई शिक्षा व्यवहार में आने लग जाए उसी दिन से वो विद्या बन जाती है। आज ऐसी ही विद्या की जरूरत है। जीवन में विद्या ही काम आती है, कोरी शिक्षा नहीं। इसलिए शिक्षा के व्यवहारिक पक्ष पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए बजाए सैद्धांतिक पक्ष है, तभी कल्याण होगा।

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