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जयपुर के इंजीनियर की तकनीक से बनेंगी गांवों की सड़कें, ग्राउंड वॉटर को रिचार्ज करेगा बारिश का पानी

Monday, February 03, 2020 10:55 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जयपुर। अमेरिका से लौटकर सिविल लाइन में रह रहे सड़क बनाने के एक्सपर्ट इंजीनियर 84 वर्षीय पृथ्वी सिंह कांधल पिछले 15 साल से भूजल संरक्षण करने वाली सड़क बनाने के फार्मूले को क्रियान्वित कराने के लिए कभी जयपुर तो कभी दिल्ली के सरकारी विभागों में घूमते रहे। आखिर में अब उनकी तकनीक से बारिश के जल को बचाने की सुराखदार सड़कों के निर्माण को केन्द्र सरकार ने मंजूरी दी है। उनकी पोरस सड़कें यानी सुराखदार सड़कें और पार्किंग सड़कों के फार्मूले से प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनने वाली 20 फीसदी सड़कों को बनाया जाएगा। छलनी की तरह काम करने वाली इन सड़कों से बारिश का पानी सीधे जमीन में जाकर भूजल स्तर को रिचार्ज करेगा। 

केन्द्रीय मंत्री घर पहुंचे और फार्मूला लागू हुआ
पेन्सिलवेनिया में चीफ बिटूमन रोड इंजीनियर के रूप में काम करते हुए पृथ्वी सिंह कांधल ने फिलाडेलफिया की फ्रेंकलिन इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर 1980 में इस फार्मूले को विकसित किया था। वहां इस फार्मूले से हजारों किमी सड़कें और पार्किंग बनी। रिटायर होकर जब वह जयपुर लौटे तो जेडीए-नगर निगम, पीडब्ल्यूडी और फिर दिल्ली में भी इस फार्मूले को लेकर घूमते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। कांधल ने बताया कि थक-हार कर वह घर बैठ गए। पिछले महीने अचानक फोन आया कि केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत उनके घर आ रहे हैं। वे आए तो मैंने उन्हें विस्तार से तकनीक की जानकारी दी। अब फार्मूलें पर काम शुरू हो गया है।

2012 में गांधीनगर स्टेशन के बाहर बनाई थी पार्किंग
कांधल ने बताया कि वर्ष 2012 में उन्होंने इस तकनीक को तत्कालीन जेडीसी और वर्तमान सीएम सचिव कुलदीप रांका को जाकर बताई थी। उन्होंने मुझे गांधीनगर स्टेशन के बाहर इस तकनीक से पार्किंग का एक हिस्सा बनाने की इजाजत दी थी। मैंने उसे अपनी निगरानी में बनवाया। बारिश का पानी रिचार्ज हो रहा है, लेकिन फार्मूले को क्रियान्वित नहीं किया गया। उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

क्या है सुराखदार सड़क की तकनीक
सड़क की ऊपर की लेयर 75 एमएम डामर मिक्स से बनती है। यह छलनी की तरह होती है। इसके नीचे बड़े पत्थरो की लेयर होती है। यहां ऊपर से पानी आकर इकट्ठा होता है। यहां से पानी नीचे मिट्टी से रिस-रिस कर भूजल को रिचार्ज करता है। इस तरह की सड़कें सामान्य सड़कों से 15 फीसदी महंगी होती है, लेकिन बारिश का पूरा पानी जमीन में चला जाता है।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि पिछले महीने जयपुर आया था, तब पृथ्वी सिंह कांधल से मिला। वे इस बात से दुखी थे कि इस तकनीक को उन्होंने दुनिया को दिया, लेकिन भारत में इस पर काम नहीं हुआ। भूजल संरक्षण का उनका फार्मूला वाकई बेहतर है। फिर मैंने दिल्ली जाकर केन्द्रीय सड़क मंत्री नितिन गड़करी और ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से इस पर चर्चा की है। अब फैसला हुआ कि पीएमजीएसवाई की 20 फीसदी सड़कें इस फार्मूलें से बनेगी, ताकि बारिश के पानी से भूजल बढ़ाया जा सके।

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