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राजा मानसिंह ने अफगानी कबायलियों पर दर्ज की थी जीत

Tuesday, August 17, 2021 12:15 PM
राजा मानसिंह, फाइल फोटो

जयपुर। अफगानिस्तानी सैनिकों ने कट्टरपंथी तालिबानियों के सामने ने हथियार डाल दिए हैं, वहां के राष्ट्रपति सहित अधिकांश नेता देश छोड़कर भाग गए हैं लेकिन 1550 में आमेर के कछावा राजा मानसिंह प्रथम ने काबुल में अफगानी कबायलियों पर विजय दर्ज की थी और अपना झंडा फहराया था।   राजा मानसिंह अकबर के सबसे भरोसेमंद सेनानायक थे, जिन्होंने अकबर के साम्राज्य को बहुत विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

आमेर के राजा भगवंत दास के बेटे मानसिंह की शौर्य और वीरता की गाथाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। अकबर के सौतेले भाई और काबुल के गवर्नर मिर्जा हाकिम ने अकबर के खिलाफ सन् 1580 में विद्रोह कर दिया था। कुछ मुस्लिम अधिकारियों ने मिर्जा को अपनी मदद देना शुरू कर दिया था।
ये विद्रोह शांत नहीं हुआ तो 1885 में राजा मानसिंह को काबुल भेजा गया और उन्होंने खैबर दर्रे को पार कर अफगान कबाईलियों का दमन किया और काबुल को पुन: मुगल साम्राज्य में मिला लिया। मानसिंह की इस विजय पर आमेर रियासत का ध्वज पांच रंग का (पचरंगा) किया गया और यही पचरंगा ध्वज आजादी तक जयपुर रियासत का ध्वज बना रहा। राजा मानसिंह ने 1586 में कश्मीर को जीतकर मुगल साम्राज्य में मिला लिया और कश्मीर को काबुल प्रान्त का एक जिला माना गया। अंग्रेजों और सम्राट अशोक के शासनकाल में भी अफगानिस्तान भारत का अभिन्न अंग था।
शाजी जमांं और राहुल सांकृत्यायन की किताब अकबर के अनुसार, 1586 ईसवी, में जैन खां कोका को यूसुफजई कबीले को शिकस्त देने के लिए तैनात किया गया था। जब उन्होंने और फौज मांगी तो बादशाह ने बीरबल को वहां मदद के लिए भेजा। फिर एहतियातन उन्होंने पीछे-पीछे हकीम अबुल फतह को भी भेज दिया। बीरबल की जैन खां कोका और हकीम अबुल फतह दोनों से नहीं बनती थी। बीरबल, हकीम अबुल फतह, जैन खां कोका और पूरा लश्कर संकरे पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ा तो पहले से भी ज्यादा घमासान हुआ। बागी कबिलाइयों ने हथियार और पत्थरों से चौतरफा हमला किया। इस जंग में बीरबल ऐसे घिरे कि उनकी लाश तक नहीं मिली। अकबर ने अथक प्रयास किए की बीरबल के शरीर का कोई भी अंग अगर मिल जाए तो उनका अंतिम संस्कार किया जा सके लेकिन वे सफल नहीं हो पाए।


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