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दूसरे राज्यों से हमारी ब्यूरोक्रेसी बेहतर, जनहित के फैसले ले रही सरकार: मुख्य सचिव डीबी गुप्ता

Sunday, December 15, 2019 11:20 AM
मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने कहा कि दूसरे राज्यों से हमारी ब्यूरोक्रेसी बेहतर है।

जयपुर। किसी भी राज्य की ब्यूरोक्रेसी में ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि कोई आईएएस अधिकारी दो सरकारों में मुख्य सचिव की कुर्सी पर काबिज रहा हो, लेकिन 1983 बैच के आईएएस अधिकारी डीबी गुप्ता इस जिम्मेदारी को भली भांति निभा रहे हैं। किसी समय में स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस और धर्मवीर भारती की अंधा युग पुस्तक पढ़ने के शौकीन गुप्ता अब इनसे दूर हो गए हैं। अब केवल सरकार की ईमानदार, पारदर्शी और जवाबदेही के साथ सुशासन की मंशा को धरातल पर उतारने में बेहतर तालमेल के साथ कार्य कर रहे है।

 

फेस टू फेस कार्यक्रम के तहत शनिवार को दैनिक नवज्योति कार्यालय में मुख्य सचिव ने विशेष भेंट के दौरान खुलकर बातचीत की। अपने अब तक के प्रशासनिक अनुभव को शेयर करते हुए उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों से हमारी ब्यूरोक्रेसी बेहतर है, लेकिन थोड़ा तालमेल का अभाव है। उनका मानना है कि इसमें सुधार की जरुरत है। दैनिक नवज्योति के साथ गुप्ता की यूं रही विशेष बातचीत।

सवाल : मौजूदा सरकार का एक साल हो रहा है, आप इसे किस तरह से देखते है?
जवाब : वैसे तो यह साल ज्यादातर चुनावों के लिए ही रहा। केवल काम करने के लिए सरकार को आठ महीने ही मिले हैं। इनमें सरकार की ओर से जनहित के कई फैसले लिए गए, चाहे किसान ऋण माफी हो या फिर चिकित्सा, शिक्षा और इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूती के फैसले। आमजन के मद्देनजर यह निर्णय लिए गए है।

सवाल : दोनों सरकारों में सीएस रहे, इसका क्या राज है?
जवाब :अपनी जिम्मेदारी से काम करते रहो, फिर चाहे कोई भी सरकार हो। इसके साथ मैं अपना काम करने में विश्वास करता हूं। मेरा प्रयास रहता है कि जो जिम्मेदारी मुझे दी जाती है, उस पर उसी मंशा के साथ खरा उतरूं। अब तक का मेरा अनुभव भी यहीं रहा है, जिसमें सफल भी हुआ।

सवाल :  सरकार की वित्तीय स्थिति खराब है, इसका योजनाओं पर कोई असर पड़ रहा है?
जवाब : आर्थिक मंदी का राज्य में ही नहीं देशभर में असर है। केन्द्र में भी वित्त की स्थिति ठीक नहीं है। अपने राज्य में ही नहीं दूसरे राज्यों में भी आर्थिक तंगी है। केन्द्र से विभिन्न मदों में करीब 15 हजार करोड़ का नहीं मिल पा रहा है, अटका हुआ है। इसका असर योजनाओं पर भी पड़ेगा, लेकिन सरकार की भी मंशा है कि जनहित की योजनाओं में पैसे की परेशानी आड़े नहीं आएगी।

सवाल : पब्लिक सर्विस डिलीवरी सिस्टम को लेकर सीएम ने नाराजगी जताई है, ऐसा क्यों?
जवाब : ऐसा नहीं कह सकते है कि पब्लिक सर्विस डिलीवरी सिस्टम पूरा ही खराब है, कुछ जगहों की व्यवस्थाओं में जरूर कमी है, जिसमें सुधार के कार्य किए जा रहे है। अधिकारियों व कर्मचारियों की काम के लिए जिम्मेदारी तय करने की दिशा में पब्लिक अकाउंटिबिलिटी बिल पर फोकस कर रहे है ताकि हर काम निर्धारित समय में पूरा हो।

सवाल : कई योजनाएं ऐसी है, जो लंबे समय से अटकी है, ऐसा क्यों?
जवाब : वर्तमान हालातों में किसी भी प्रोजेक्ट की लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है। मौजूदा वित्तीय संसाधनों के जरिए उनकों हाथ में नहीं लिया जा सकता। ऐसे में अब बडे प्रोजेक्ट पर सरकार का यही प्रयास है कि एडीबी, जायका या फिर वर्ल्ड बैंक के जरिए ही प्रोजेक्ट को हाथ में लिया जाए। पीपीपी मोड वर्तमान हालातों में सफल नहीं है।

सवाल : ऐसा कोई काम जो करना चाहते थे, लेकिन नहीं कर सके?
जवाब :  सरकार कोई भी हो। अब तक का मेरा अनुभव रहा है कि जिस मामले में मुझे जो अपनी राय व्यक्त करनी होती है, वो मैं कर देता हूं। ऐसे में मुझे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती। उच्चस्तर पर यह भी बड़ी बात है कि मेरा सुझाव भी मान लिया जाता है।

सवाल :  ऐसा नहीं लगता कि जन सूचना संपर्क सूचना पोर्टल मंशा पर खरा नहीं उतर पा रहा है?
जवाब :  पोर्टल की व्यवस्थाओं को मजबूती देने की दिशा में काम किया जा रहा है। निस्तारित होने वाले प्रकरणों की जांच थर्ड पार्टी से करवाई जाए या फिर इसे आउट सोर्सिंग ही करने पर भी विचार किया जा रहा है। छोटी शिकायतों के निस्तारण में भी निचले स्तर पर कमी सामने आती है। इसमें सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।

सवाल :   सोशल मीडिया का जमाना है, सरकार इसे किस तरह से देखती है?
जवाब : आज के दौर में इसका प्रभाव ज्यादा नजर आता है। सरकारी सिस्टम में इसका किस तरह से उपयोग किया जाए। इसके लिए आईटी और जनसंपर्क विभाग मिलकर काम करेंगे। साथ ही भ्रामक प्रचार प्रसार पर किस तरह से रोक लगाई जाए। इस पर भी काम किया जा रहा है।

सवाल :  क्या कारण है तो आप से हर व्यक्ति मिलकर खुश नजर आता है?
जवाब :  इसमें मैं क्या कह सकता हूं, हमारे संस्कार ही कुछ ऐसे रहे है। हम जब छोटे थे तब देखते थे कि दीपावली पर पिताजी हमारे दादाजी व दादीजी की पूजा किया करते थे। हमारे पिताजी हर संडे को हमें स्टेच्यू सर्किल पर लेकर आते थे और कहते थे कि कोई भी सवाल पूछो। इस तरह शुरू से ही बड़ों का आदर करना और नम्रता से उसकी बात सुनना मेरी आदत रही है। यह जरूरी है कि नम्रता का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए और गुस्से में आपा नहीं खोना चाहिए। मुझे याद है जब में आईएएस में आया था तक किसी ने कहा था कि जब भी सामने बैठने वाले की बात सुनोें तो ऐसे सुनों कि उसकी जगह आप होते तो क्या करते। बस उसी के अनुरूप मैं अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा हूं।

सवाल :  व्यस्तता के बीच परिवार के लिए कैसे निकालते है समय?
जवाब :  परिवार के लिए व्यस्तता के बीच ही समय निकालना मुश्किल होता है। पहले किताबें पढ़ने में बहुत रूचि थी, लेकिन अब सब छूट गई। अब तो दिनभर इतनी व्यस्तता रहती है कि सुबह से शाम तक का पता ही नहीं चल पाता। ऐसे में भी कोशिश करता हूं कि मेरे पास आने वाला व्यक्ति निराश नहीं लौटे।

 

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