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मैसूरु जहां आज भी सजता है 'राजदरबार', विजयादशमी पर निकलती है भव्य सवारी

Monday, September 30, 2019 12:25 PM
फाइल फोटो।

मैसूरु। आजादी के बाद भले ही देशभर की विभिन्न रियासतों का विलय हो गया हो, लेकिन कर्नाटक से करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित मैसूरु शहर में आज भी भव्य ‘राजदरबार’ सजता है। बाकायदा, राजपरिवार का वंशज यानी राजा का स्वर्ण निर्मित राज सिंहासन पर बैठना, राजसी वस्त्र और गहने धारण करना। यहां तक की परिवार के सदस्यों और बाहर से बुलाए गए मेहमानों के लिए भी सिंहासन लगते हैं। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से विजयादशमी तक यह ‘राजदरबार’ लगता है। इन दस दिनों में विभिन्न धार्मिक आयोजन और अनुष्ठान होते हैं। 

आपको बता दें कि चंदन के लिए मशहूर मैसूर जिसे अब मैसूरु के नाम से जाना जाता है वह कभी कर्नाटक की राजधानी हुआ करती थी। दशहरा महोत्सव के लिए मैसूरु दुनियाभर में प्रसिद्ध है। महोत्सव के अंतिम दिन निकलने वाली भव्य जम्भो सवारी यहां का मुख्य आकर्षण है, जिसमें देश-विदेश से भारी संख्या में लोग जम्भो सवारी का दीदार करने पहुंचते हैं। जम्भो सवारी के साथ महोत्सव का समापन होता है। माना जाता है कि इस समारोह की शुरुआत मैसूरु के महाराजा चामराज वाडियार दशम ने सन् 1880 में की थी। इस राजपरिवार का इतिहास काफी दिलचस्प है।

क्या है जम्भो सवारी
दस दिवसीय महोत्सव के अंतिम दिन विजयादशमी पर शानदार जम्भो सवारी निकलती है। इसमें बैंड बाजे के साथ कर्नाटक की संस्कृति को झलकाने वाली विभिन्न झांकियां पूरे लवाजमे के साथ निकलती हैं। शोभायात्रा में कई हाथी शामिल होते हैं, जो इसका मुख्य आकर्षण होते हैं। मुख्य हाथी की पीठ पर मां चामुण्डेश्वरी विशाल ‘स्वर्ण हौदा’ (हाथी पर बैठने का स्थान) विराजमान होती हैं। जिस सिंहासन पर मां विराजमान होती हैं, वह करीब 750 किलो वजनी होता है, जिसका भार सहज में एक हाथी नहीं उठा सकता। हाथी यह वजन उठा ले, इसके लिए उसे कई दिन तक इसका अभ्यास कराया जाता है।

ऐसे तैयार किया जाता है हाथियों को
मुख्य हाथी के साथ अन्य हाथियों को महोत्सव से कई दिन पहले मैसूरु लाया जाता है। उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता है। स्वास्थ्य की जांच की जाती है, वजन तौला जाता है। प्रतिदिन शोभायात्रा के लिए चयनित मार्ग पर घुमाया जाता है। इस बीच हाथी की पीठ पर थोड़ा-थोड़ा वजन रखा जाता है और महोत्सव तक उसे स्वर्ण हौदा उठाने के लिए अभ्यस्त बनाया जाता है।

नौ दिवस तक मनाया जाता है दशहरा
धार्मिक मान्यता है कि मां चामुंडेश्वरी और महिसासुर के बीच आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को भयंकर युद्ध आरंभ हुआ था। दस दिन चले इस युद्ध में मां चामुंडेश्वरी ने महिसासुर का वध कर विजय हासिल की। इसी उपलक्ष्य में मैसूरु में दशहरा महोत्सव मनाया जाता है। कर्नाटक के साथ आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में भी दशहरा महोत्सव मनता है, यहां रावण दहन नहीं होता। 

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