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राजकाज

Monday, September 13, 2021 11:55 AM
राजकाज

सूबे में इन दिनों वर्कर्स नेताओं के पुत्र मोह के फेर में ऐसे फंस गए कि उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ गया। कई वर्कर्स तो बेचारे चमक नींद सो रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स अपना मुंह खोलने की कोशिश करते हैं, लेकिन बेचारे यह सोच कर चुप रह जाते हैं कि सामने वाला नेताजी का खास तो नहीं है। अब देखो ना कई सालों तक अपने बर्थ डे पर होर्डिंग-बैनर एंड कटआउट लगवाने वाले पिंकसिटी के नेताजी ने इस बार फरमान जारी किया कि सैकण्ड पीढ़ी के राजकुमार का जन्म दिन मनाने में कोई कसर नहीं रहे। अब बेचारे वर्कर्स के सामने हुकुम की पालना करने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था, सो भाग-भाग कर गवर्नमेंट हॉस्टल से पीसीसी तक सड़कों को रंगने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई। चूंकि मामला पंडितजी की दूसरी पीढ़ी से ताल्लुकात जो रखता है।


ना हम जीते, ना तुम हारे
सूबे में प्रधानी और जिला प्रमुखी के चुनावों को लेकर दोनों दलों के लीडर्स ने मुंह मीठा कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मिठाई खाने वाले छोटे-मोटे नहीं बल्कि पार्टी के सूबे के सदर हैं। अब देखो ना सूबे की राजधानी के प्रमुखी में कैंडिडेट गोद लेकर क्रॉस वोटिंग के जरिए पहले दिन भगवा वालों ने जंग जीतकर खूब मिठाइयां खाई, तो दूसरे दिन उप प्रमुखी में उसी हथियार के जरिए हाथ वाले भाई लोगों ने लड्डूओं से एक-दूसरे का मुंह भरा। और तो और नेताओं ने ना जीते हम, ना हारे तुम की दुहाई देकर एक-दूसरे के गले लगने में भी कसर नहीं छोड़ी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि दोनों दलों के नेताओं की नीति और रीति हार्डकोर वर्कर्स के इसलिए गले नहीं उतर रही कि उसूलों का दावा करने वालों को ऐसा ही करना था, तो सिम्बल देकर चुनाव लड़ाने की क्या जरूरत थी।


खाकी और इंदिरा गांधी भवन
सूबे की राजधानी गुलाबीनगर में बना इंदिरा गांधी भवन इन दिनों काफी चर्चा में है। हर कोई उधर से गुजरता है, तो उसकी नजर इस पर पड़े बिना नहीं रहती। नजर पड़ने का कारण भी ऐसा है कि सुनकर हर कोई हंसे बिना नहीं रहता। हंसने का कारण है कि इन दिनों इंदिरा गांधी भवन पर खाकी वालों का जबरदस्त पहरा है। चौबीस घंटों पहरे के लिए चालीस जवान तैनात हैं। इस भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर आने वाले भी इस पहरे से नाखुश हैं। उनमें खुसरफुसर है कि भवन के ठिकानेदार पिछले कुछ दिनों से इतने खौफजदा हैं कि खाकी वालों के अलर्ट होने के सिग्नल के बाद ही उनके कदम लेफ्ट-राइट होते हैं।  


खाकी हुई पानी-पानी

पानी में रास लीला का वीडियो क्या वायरल हुआ, सूबे में खाकी वाले पानी-पानी हो गए। कई साहब तो इस पानी वाली लीला के चलते नप भी गए। नपते भी क्यों नहीं पानी पी-पीकर, मामले को ले देकर मामले को निपटाने में कोई कसर भी तो नहीं छोड़ी थी। अब बेचारों को क्या पता था कि पानी में बना वीडियो पानी पीने के बाद भेजने से बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। पीएचक्यू में खाकी वाले साहब लोगों में खुसरफुसर है कि इनवेस्टीगेशन में मामले की परतें खुलेंगी, तो और कई साहब लोगों का पानी उतरने को रोकना मुश्किल हो जाएगा। स्वीमिंग पूल वाले वीडियो की आंच खाकी से निकलकर ब्यूरोक्रेसी को भी लपेटे में लिए बिना नहीं बुझेगी, चूंकि बिना ब्यूरोके्रसी के दबाव के मामला ऐसे रफा-दफा थोड़े ही होता।


हम नहीं तो कोई नहीं

भगवा वाली पार्टी में एक संदेश तेज गति से फैल रहा है। संदेश भी हम नहीं तो कोई नहीं का है। पौने तीन साल से कोई तालमेल नहीं बैठते देख दुखी कार्यकर्ताओं ने संदेश के सहारे यह सोच कर  राजनीति शुरू की है, कि शायद कोई सुलह हो जाए। पर दोनों और से कोई भी तालमेल को तैयार नहीं है। राज का काज वालों के लंच केबिन में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि सूबे में विपक्ष कहां गायब हो गया। आखिर राज के नवरत्नों पर नजर रखने वाला तो कोई हो, जिनकी बीस अंगुलियां घी में डूबी हुई है।

        एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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