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गणेश चतुर्थी 2020: विधि-विधान से गणपति बप्पा की पूजा करने पर पूरी होगी हर मनोकामना

Wednesday, August 19, 2020 14:45 PM
22 अगस्त को गणेश चतुर्थी।

जयपुर। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाते हैं। इस साल यह तिथि 22 अगस्त 2020 को है। इस तिथि को भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जानते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन गणपति को स्थापित किया जाता है। इस पर्व को दो ये दस दिन तक मनाया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान गणेश संकट, कष्ट और दरिद्रता से मुक्ति दिलाते हैं। कहते हैं कि गणपति की विधि-विधान से पूजा करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

बप्पा को ऐसे करें प्रसन्न
सिंदूर लगाएं: भगवान गणेश को सिंदूर प्रिय है। ऐसे में गणेश चतुर्थी के दिन उन्हें सिंदूर लगाना शुभ माना जाता है। बप्पा के माथे पर हर दिन लाल सिंदूर से तिलक लगाएं। कहते हैं कि ऐसा करने से बिगड़े काम बनते हैं और तरक्की प्राप्त होती है।
दूर्वा अर्पित करें:  भगवान गणेश को यूं तो हर दिन पूजा के दौरान दूर्वा अर्पित करना चाहिए। हालांकि गणेश चतुर्थी के दिन दूर्वा अर्पित करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ऐसा करने से गणपति प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं।
लाल पुष्प करें अर्पित: श्रीगणेश को लाल पुष्प अर्पित करना शुभ होता है। अगर लाल फूल संभव नहीं है तो कोई भी पुष्प अर्पित कर सकते हैं। पूजन के दौरान ध्यान रखें कि भगवान गणेश को भूलकर भी तुलसी अर्पित न करें।
भोग लगाएं: भगवान गणेश को लड्डू और मोदक प्रिय है। ऐसे में गणेश चतुर्थी के दिन गणपति को मोदक और लड्डू का भोग लगाएं।
आरती: भगवान गणेश की पूजा के बाद आरती जरूर करनी चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से पूजा का फल शीघ्र मिलता है।

सर्वप्रथम पूज्य होते हैं गौरी नंदन गणेशजी
जब भी हम कोई पूजा या अनुष्ठान करते हैं तो सर्वप्रथम गौरी नंदन गणेशजी की उपासना करते हैं। सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माने जाने वाले गणेश जी का अवतरण दिवस गणेश चतुर्थी का पावन पर्व देश ही नहीं अपितु विश्वभर के सनातन धर्मावलम्बियों द्वारा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

सदैव सचेत रहने का संकेत
समस्त देवी-देवताओं में गणेशजी को बहुत अधिक बुद्धिमान माना गया है। गजानन जी की लम्बी सूंड महाबुद्धित्व का प्रतीक है। लम्बी सूंड तीव्र घ्राण शक्ति की महत्वता को प्रतिपादित करती है जिसका अर्थ है कि जो समझदार व्यक्ति है वह अपने आस-पास के माहौल को पहले से ही सूंघ सकता है। गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती-डुलती रहती है जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को हमेशा सचेत रहना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार सुख, समृद्धि व ऐश्वर्या की प्राप्ति के लिए उनकी बायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए और यदि किसी शत्रु पर विजय प्राप्त करनी हो तो दायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए।

लम्बोदर होने का अर्थ
अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक होता है। गणेश जी का बड़ा उदर सुखपूर्वक जिंदगी जीने के लिए अच्छी और बुरी सभी बातों को पचाने का संकेत देता है। इससे ये भी सन्देश मिलता है कि मनुष्य को हर बात अपने अंदर रखकर किसी भी बात का निर्णय बड़ी सूझ-बूझ के साथ लेना चाहिए व लम्बोदर स्वरुप से हमें ग्रहण करना चाहिए कि बुद्धि के द्वारा हम समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं और सबसे बड़ी समृद्धि प्रसन्नता है।

ब्रह्मशक्ति का प्रतीक
गणेशजी को मोदक अतिप्रिय है उनके हाथ में मोदक होता है पर कहीं-कहीं उनकी सूंड के अग्र भाग पर लड्डू दिखाई देता है। मोदक को महाबुद्धि का प्रतीक बताया गया है। मोदक का निर्माण अमृत से हुआ है, यह ब्रह्मशक्ति का भी प्रतीक माना गया है। मोदक बन जाने के बाद वह अंदर से दिखाई नहीं देता है कि उसमें क्या-क्या समाहित है, इसी तरह पूर्ण ब्रह्म भी माया से आच्छादित होने के कारण वह हमें दिखाई नहीं देता।

चंचल मन पर अंकुश
गणेश जी के हाथ में पाश और अंकुश है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अंकुश और पाश की आवश्यकता पड़ती है। कार्य में सफ लता और जीवन में उन्नति के लिए अपने चंचल मन पर अंकुश लगाने की अत्यंत आवश्यकता है। अपने भीतर की बुराईयों को पाश में फं साकर आप उन पर अंकुश लगा सकते हैं।

एकदन्तधारी गणेश
गणेश जी का एक ही दांत है दूसरा दन्त खंडित है। बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। तभी से ही गणेशजी एकदंत कहलाने लगे, एक दन्त होते हुए भी वे पूर्ण हैं। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि हमारे पास जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उसी में हमें दक्षता के साथ कार्य संपन्न करना चाहिए।

वर मुद्रा में गणेश
गणपति अक्सर वर मुद्रा में दिखाई देते हैं। वरमुद्रा सत्वगुण की प्रतीक है। इसी से वे भक्तोंकी मनोकामना पूरी कर अपने अभय हस्त से संपूर्ण भयों से भक्तों की रक्षा करते हैं। इस प्रकार गणेश जी का उपासक रजोगुण एतमोगुण, सत्वगुण इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर एक विशेष आनंद का अनुभव करने लगता है।

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