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गांधी बनाम अम्बेडकर: मतभेदों के बावजूद मनभेद नहीं

Monday, December 06, 2021 17:10 PM
फाइल फोटो

मोहनदास कर्मचंद गांधी (2 अक्टूबर, 1869-30 जनवरी, 1948) और डॉ. भीमराव अम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891-6 दिसम्बर, 1956) दोनों ऐसी युग प्रवर्तक शख्सियत हैं, जिनकी विलक्षण प्रतिभा अतिक्रमण कर विश्व फलक पर आच्छादित हुई। गांंधी जी डॉ. अम्बेडकर से उम्र में 22 साल बड़े थे और उनसे चौदह वर्ष अधिक जीवन उन्होंने पाया। दोनों के बीच खूब वैचारिक टकराहट होने के बावजूद मनभेद नहीं पनपा, मतभेद बराबर बना रहा, जो गहरा था। इन दो विभूतियों के जीवनकाल की ओर दृष्टिपात करें तो दिनरात का अंतर दिखाई पड़ता है। गांधी जी के पिता करमचंद गांधी पोरबंदर रियासत के प्रधानमंत्री और राजकोट राजघराने के दीवान रहे। गांधी जी की मां पुतलीबाई उनकी चौथी पत्नी थीं। बालक गांधी मोटरगाड़ी में बैठकर राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल में पढ़ने जाते। अध्यापकों के बीच राजपरिवार के बालकों जैसा उनका चमत्कारिक वैभव था। बावजूद वे तृतीय श्रेणी उत्तीर्ण रहे और लंदन जाकर पुन: बीए की परीक्षा पास की और वहीं से बेरिस्टर होकर भारत लौटे। डॉ. अम्बेडकर के पिता सकपाल अंग्रेजी सेना में सूबेदार मेजर के पद पर रहे और रिटायर होकर महाराष्टÑ के सतारा नामक कस्बे में आ बसे थे। परिवार के रहने के लिए छोटा सा एक घर था। एक बकरी भी खाट के पाये से वहीं बंधती। सकपाल बालक अम्बेडकर की अंगुली पकड़कर सतारा की गलियों से स्कूल में भरती कराने ले गए थे।
चातुर्वर्ण्यव्यवस्था के साया महार जाति में जन्मा बालक भी अछूत था। दकियानूसी अध्यापकों ने उसे वहां बैठने को जगह दी, जहां दूसरे छात्र अपने जूते निकालते थे। उसे ब्लैकबोर्ड तक छूने नहीं दिया गया। जाति प्रथा को धर्म की मर्यादा मानने वाले दकियानूसी अध्यापक उसकी स्लेट पर सही या गलत का निशान पैर के अंगूठे से लगाते। अपृश्यता के इन घावों ने बालमन को आहत कर छोड़ा था।


बाईस वर्षीय बैरिस्टर गांधी को भेदभाव का पहला झटका तब लगा था। जब वे सन् 1893 में एक केस के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए थे। गोरों के साथ एक ही कंपार्टमेन्ट में यात्रा करते उन्हें बेकदरी से डिब्बे से नीचे उतार दिया गया था। राजसी ठाठ-बाट में पले गांधी के लिए यह एक ऐसा सदमा था, जिसने उनके अन्तर्मन को कचोट कर रख दिया और जीवन उन्हें एक धोखा जैसा महसूस हुआ। उस वक्त उनकी आयु 24 वर्ष थी। भारत में छुआछूत और जातीय भेदभाव की स्थिति कितनी भयावह है, गांधी में इस तथ्य से तब स्वानुभूत हुए, जब वे 48 वर्ष के अधेड़ हो चुके थे। सन् 1917 नील आंदोलन के दौरान उनका बिहार के चम्पारन में जाना हुआ। भूमिहार युवा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उस वक्त राष्टÑीय आंदोलन में सक्रिय थे। गांधी उनके पटना स्थित निवास पर पहुंचे। घर के बाहर बैठा नौकर लकुटी और लंगोटी वाले फटेहाल गांधी को अछूत समझ बैठा और उनको अंदर नहीं जाने दिया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के आने तक वे किसी दीन की तरह बाहर ही बैठे रहे। अस्पृश्यता कितनी घृणित और अमानवीय है, उनके मनोमस्तिष्क में यहीं से अस्पृश्यता निवारण का विचार पनपा था। विपरीत इसके डॉ.अम्बेडकर को जन्म से ही जाति-पांति और छुआछूत का दंश झेलना पड़ा, जो ताजिंदगी चुभता रहा।
गांधी और डॉ.अम्बेडकर की पहली मुलाकात या यूं कहें कि पहली वैचारिक टकराहट 7 सितम्बर, 1931 को लंदन में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रेमजे मैक्नाल्ड की अध्यक्षता में आयोजित दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेन्स के दौरान हुई। उस दौरान गांधी बासठ वर्ष के वृद्ध हो चले थे और डॉ.अम्बेडकर चालीस वर्ष के थे। डॉ.अम्बेडकर ने कॉन्फ्रेन्स में बोलते हुए दो टूक कहा था-प्रधानमंत्री और मित्रों, अछूतों की समस्या मैंने पहली कॉन्फेंस में ही रख दी थी। अब तो कमेटी को मात्र इस बात पर गौर करना है कि प्रत्येक स्थान में अछूतों का कम से कम कितना प्रतिनिधित्व रहेगा। यदि इस प्रकार का कोई समझौता काँग्रेस या कोई अल्पसंख्यक करेगा तो वह किसी अल्पसंख्यक या मुझ पर लागू नहीं होगा।


स्वानुभूत डॉ.अम्बेडकर के इस बेबाक वक्तव्य से गांधी बेहद बेचैन हो उठे। उनका बेचैन हो उठना अछूतोद्धार में सन्नद्ध सहानुभूत था। उनके साथ लंदन गए मदन मोहन मालवीय और सरोजनी नायडू का हतप्रभ होना गांधी की भावना से जुड़ा आयाम था। कॉन्फेंस एक दिसम्बर तक चली, लेकिन बिना किसी निर्णय के इसकी समाप्ति की विधिवत घोषणा कर दी गई। ध्येय के धनी डॉ.अम्बेडकर अछूतों के लिए प्रतिनिधित्व का निर्धारण कराने के लिए 26 मई, 1932 को पुन: लंदन गए और वहां पर ब्रिटिश केबिनेट के सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों से मिले और भारत के अछूतों की नारकीय स्थिति से उन्हें अवगत कराया। परिणाम स्वरूप ब्रिटिश सरकार ने 20 अगस्त, 1932 को सांप्रदायिक निर्णय अर्थात कम्यूनल अवार्ड की घोषणा कर दी। उन दिनों गांधी पुणे की यरवदा जेल में राजनीतिक बंदी थे। जब उनको कम्यूनल अवार्ड की खबर लगी, तो वे इतने क्षुब्ध हो उठे कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री के नाम अविलंब विरोध-पत्र लिख भेजा-अछूतों को पृथक प्रतिनिधित्व दिए जाने के विरोध में मैं 20 सितम्बर से आमरण अनशन कर रहा हूँ।आमरण अनशन के चलते जब गांधी का स्वास्थ्य निरंतर गिरता गया और उनके प्राणों पर बन आई तो डॉ.अम्बेडकर आखिरकार समझौते के लिए तैयार हुए। 24 सितम्बर, 1932 को हुआ वह समझौता भारतीय इतिहास में पूना पैक्ट के नाम से दर्ज है। पैक्ट के तहत विभिन्न प्रांतों में अछूतों के लिए सीटों का आरक्षण तो हो गया और उनके लिए 148 सीटें आरक्षित कर दी गई। लेकिन डॉ.अम्बेडकर की डबल वोट की शर्त अस्वीकार रहीं।

संभवत: यह व्यावहारिक नहीं थी, अन्यथा संविधान के किसी अनुच्छेद में उल्लेखित हुई होती। डॉ.अम्बेडकर स्वयं संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष और सर्वेसर्वा थे। इतने बड़े मतभेदों के बावजूद गांधी निरपेक्ष और अकुंठ थे तथा डॉ.अम्बेडकर की विलक्षण विद्ववता का प्रभाव उनके मन-मस्तिष्क में सदैव बना रहा।

नानकचंद रत्तू डॉ.अम्बेडकर के 17 वर्ष तक निजी सचिव रहे। वे अपनी पुस्तक डॉ.अम्बेडकर के जीवन के अंतिम कुछ वर्ष में उद्धृत करते हैं-स्वतंत्र राष्ट्र के प्रथम विधि मंत्री के रूप में उनका मंत्रिमण्डल में प्रवेश और इसके बाद प्रारूप समिति का सभापति चुना जाना भारत के इतिहास में, दलित वर्ग और बौद्धों के इतिहास में एक मील का पत्थर है। मजे की बात यह है कि जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल चाहते थे कि इस काम के लिए सर आइवोर जेनिंग्स को आमंत्रित किया जाए, जो अंतरराष्टÑीय ख्याति प्राप्त संविधान विशेषज्ञ थे और जिन्होंने कई एशियाई देशों के संविधानों का प्रारूप तैयार किया था, पर महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि वे किसी विदेशी के बारे में न सोचें, जबकि भारत में ही डॉ.अम्बेडकर के रूप में एक असाधारण कानून व संविधान विशेषज्ञ मौजूद हैं। इस तरह स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी डॉ.अम्बेडकर पर आ पड़ी। जब-जब डॉ. अम्बेडकर का स्मरण होता है, गांधी स्वत: ही स्मृति पटल पर आ जाते हैं।

   -रत्नकुमार सांभरिया
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


गांधी और डॉ.अम्बेडकर की पहली मुलाकात या यूं कहें कि पहली वैचारिक टकराहट 7 सितम्बर, 1931 को लंदन में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रेमजे मैक्नाल्ड की अध्यक्षता में आयोजित दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेन्स के दौरान हुई। उस दौरान गांधी बासठ वर्ष के वृद्ध हो चले थे और डॉ.अम्बेडकर चालीस वर्ष के थे। डॉ.अम्बेडकर ने कॉन्फ्रेन्स में बोलते हुए दो टूक कहा था-प्रधानमंत्री और मित्रों, अछूतों की समस्या मैंने पहली कॉन्फेंस में ही रख दी थी।

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