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आंखों की रोशनी जाने के बाद संघर्ष से रोशन की जिंदगी, दुनियाभर में कमाया नाम

Thursday, November 07, 2019 14:20 PM
विज्ञान फेस्टिवल में महिला साइंटिस्ट कॉन्क्लेव में अपनी उपलब्धियों के बारे में बताते हुए कंचन गाबा

कोलकाता। जब मैं केवल आठ साल की थीं, तब मेरी दुनिया में अंधेरा हो गया था। फिर भी जीवन में कभी हार नहीं मानी और हर मोर्चे पर डटकर सामना कर मुकाम पाया है।

यह कहना है कंचन गाबा का। पेसे से एडवोकेट गाबा अब ब्लाइंड बच्चों को नई दिशा देने के साथ ही समाज के उत्थान के कार्य कर रही है। कोलकाता के विज्ञान फेस्टिवल में महिला साइंटिस्ट कॉन्क्लेव में गाबा ने अपनी उपलब्धियों के बारे में बताया। सेशन के बाद दैनिक नवज्योति से गाबा ने बातचीत में कहा कि जब मैं आठ साल की थी तब सेकंड क्लास में पढ़ती थी, एक सुबह उठी तो उसे कुछ भी नहीं दिखा।

डॉक्टरों ने कहा कि उसे रेटिना टुकड़ी के साथ मोतियाबिंद था, लेकिन मेरे माता-पिता यह मानने को तैयार नहीं थे कि उनकी बेटी अंधी हो गई। एक साल तक मुझे हर जगह इलाज के लिए ले गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। आखिरकार मुझे कलकत्ता ब्लाइंड स्कूल में भर्ती कराया गया। मैंने ब्रेल सीखना शुरू कर दिया। मेरी मातृभाषा पंजाबी थी और शिक्षा का माध्यम बांग्ला था, इसलिए भले ही मैंने सभी विषयों में 94% या 96% स्कोर किया, लेकिन मुझे  बांग्ला में केवल 36% ही मिला। दसवीं कक्षा में पश्चिम बंगाल में विकलांग वर्ग में मैंने टॉप किया। इसके बाद  राज्य की सर्वश्रेष्ठ गर्ल गाइड पदक जीता। 1994 में श्री शंकर दयाल शर्मा द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रपति पुरस्कार जीतने के लिए देशभर से लगभग 600 गैर-विकलांग प्रतियोगियों को जीता।

मैंने अंतर्राष्ट्रीय गर्ल गाइड मीट में दो बार भारत का प्रतिनिधित्व किया है। मेरे पिताजी कहा करते थे कि जब जिंदगी में राह बना सकते हैं तो पहाड़ों में क्यों नही। इसी सोच के साथ मैंने मुश्किल हैरिसन रॉक्स पर चढ़कर 150 फीट ऊंचे टॉवर से छलांग लगाई और रिवर राफ्टिंग किया। इसके बाद देश-विदेश में मुझे कई पुरस्कार मिले।

गाबा फिलहाल कोलकाता में एक वकील हैं। वे स्क्रीन रीडिंग सॉफ्टवेयर के जरिए कंप्यूटर पर अपना काम करती हैं। इन्होंने बंगाल में महिला कैदियों की दुर्दशा पर एक साल के शोध प्रोजेक्ट पर काम किया है। उनके काम को फाउंडेशन फॉर यूनिवर्सल रिस्पॉन्सिबिलिटी ऑफ द पीस ऑफ स्कॉलर ने दलाई लामा की अगुवाई में एक गैर सरकारी संगठन ने  समर्थन दिया था। कंचन ने कहा कि समाजशास्त्र और कानून दोनों में मेरी पृष्ठभूमि है और महिलाओं के मुद्दों में हमेशा मेरी रुचि रहती है। मेरा मानना है कि विकलांग लोग केवल विकलांगता के लिए काम करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, हमें भी एक मौका मिला है कि समाज की सेवा करें, इसी सोच के साथ में कार्य कर रही हूं।

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