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हैप्पी फ्रेंडशिप डे: ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे...

Saturday, August 03, 2019 12:30 PM

कोटा। मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने दोस्ती को लेकर कहा- 'शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ, कीजे मुझे कुबूल मेरी हर कमी के साथ।'

आज के समय में मित्रता की परिभाषा बहुत भिन्न है। पहले दोस्ती होने पर ताउम्र तक निभाई जाती थी। आज की दोस्ती फायदा-नुकसान देखती है। स्वार्थ देखती है। पहले के समय में व्यक्ति सामाजिक ज्यादा था, इसलिए मित्रता को सर्वोपरि रखता था। दोस्ती के कई उदाहरण पौराणिक काल में भी मिलते है। जैसे- कृष्ण-सुदामा की दोस्ती, राम एवं सुग्र्रीव की दोस्ती, पृथ्वीराज चौहान और चन्द्र बरदाई की दोस्ती। ऐसे प्रमाण है जो हमें मित्रता का सही महत्व सिखाते है। किसी भी दौर में चले जाएं दोस्त, मित्र, सखा की जरुरत मनुष्य को हमेशा रहती है। दोस्ती एक अनमोल बंधन है। तभी तो पारिवारिक रिश्तों के अलावा जीवन में दोस्ती का रिश्ता सबसे अलग होता है, जिसके बिना जिंदगी अधूरी सी लगती है। क्योंकि हर व्यक्ति अपने जीवन में रिश्तों के जरिए ही एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। बिना रिश्तों के ये दुनिया अधूरी सी है, लेकिन सबसे अलग दोस्ती का रिश्ता है जो बिना किसी स्वार्थ, लालच के होता है। सबसे खास बात दोस्ती की यह है कि और सभी रिश्ते तो जन्म से हमें मिलते है, यहीं एक ऐसा रिश्ता है, जिसे हम अपनी मर्जी से चुनते हैं। 
 
दोस्ती पर बॉलीवुड में भी कितनी फिल्में बनी है चाहे याराना हो या फिर ‘शोले’। दोस्ती पर उस जमाने में बने गाने भी काफी मशहूर हुए है। जैसे बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा, ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे... आदि पहले के समय में बॉलीवुड फिल्मों में भी दोस्ती की मजबूत बॉन्डिंग दिखाई जाती थी। ऐसी दोस्ती होती थी जो जीवनभर निभाई जाती थी। दोस्त परिवार की तरह होते थे। उनकी दोस्ती इतनी मजबूत होती थी कि दोस्ती का वह रिश्ता अगली पीढ़ी में भी शिद्दत के साथ निभाया जाता था। सु:ख, दु:ख के साथी होते थे। वक्त के साथ आज दोस्ती के रिश्तों में भी बदलाव आया है। दोस्ती का चलन आज भी है, लेकिन इस रिश्ते में पहले के समय में जो गर्मजोशी और भावनाएं होती थी वैसे अब नहीं रही।  भागदौड़ और व्यस्त जीवन शैली में कब पुराने साथी पीछे छूट गए पता ही नहीं चला। तकनीक के इस दौर में दोस्तों की जगह गैजेट्स ने ले ली। जो फीलिंग्स और अपनापन दोस्तों के मिलने पर और  आमने-सामने बैठकर बात करने में आता था वह अपनापन आज की दोस्ती में कहीं खो गया। 
 
दैनिक नवज्योति ने चार अगस्त को फ्रैंडशिप डे के अवसर पर शहरवासियों से यहीं जानने की कोशिश की कि आज के समय की और पुराने समय की दोस्ती में क्या अंतर आया है। पहले दोस्ती में बॉन्डिंग मजबूत होती थी। क्या आज भी वैसी ही मजबूत बॉन्डिंग दोस्ती में है? वक्त के साथ दोस्ती के रिश्ते में कितना बदलाव आया?
 
अकलंक विद्यालय एसोसिएशन के अध्यक्ष ज्ञानचंद जैन का कहना है आज की दोस्ती अर्थप्रधान हो गई है। पहले की दोस्ती अर्थप्रधान नहीं थी। दिखावा नहीं था। ऊंच-नीच का भेद नहीं था। पहले के समय में दोस्ती दिल की गहराई वाली होती थी। अब वह बात नजर नहीं आती।  पहले की दोस्ती को सु:ख-दु:ख का साथी बोला जाता था। अब सु:ख-दु:ख का साथी वाला दोस्त नहीं है। स्वार्थ है तो दोस्ती रखेंगे, नहीं तो नहीं रखेंगे। सब कंपेरिजन अर्थ से हो गया है। दोस्ती में अब भावना और अपनापन नजर कम आने लगा है। सब जगह पैसे की अहमियत है विचारों की नहीं पहले दिखावा दोस्ती में नहीं था। अब तो पैसे वाला दोस्त ढूंढ़ते है।
 
महिमा ट्रेडर्स के डायरेक्टर रविन्द्र सिंह हाड़ा का कहना है दोस्ती कल भी वैसे ही थी और आज भी वैसी ही है। बस नजरिया बदल गया है। महंगाई ज्यादा हो गई। व्यस्तता बढ़ गई है। व्यस्त ज्यादा हो गए है। मगर दोस्ती में परिवर्तन नहीं आया है। दोस्ती ही ऐसा रिश्ता है जिसे इंसान स्वयं चुनता है दोस्ती में मजबूत बॉन्डिंग आज भी है और आगे भी रहेगी।
 
साधवानी वुड प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर जितेन्द्र साधवानी का कहना है अगर दोस्ती नि:स्वार्थ है तो बॉन्डिंग मजबूत होती है। कई लोग दोस्ती में अपना फायदा ढूंढ़ते है तो वह दोस्ती नहीं होती है। क्योंकि उस दोस्ती में डेप्थ नहीं होती तो दोस्ती के रिश्ते में सच्चाई भी नहीं रहती। आजकल दुनिया भौतिकवादी हो गई है। गैजेट्स में लोग उलझे रहते है। पुराने समय के लोगों की आपस में जो दोस्ती थी, उसमें वैल्यूज होती थी। वह पुरानी वैल्यूज आजकल की दोस्ती में गायब हो गई है। नई पीढ़ी में वो बात नहीं जो पुरानी पीढ़ी में थी। आज सब आॅनलाइन हो गया है, पहले दोस्ती आमने-सामने बैठकर होती थी, बात करते थे। आज सब आॅनलाइन हो गया है तो इमोशन डवलप ही नहीं हो पाते है।

चाइल्डलाइन कॉर्डिनेटर अलका अजमेरा का कहना है समय के साथ में रिश्तों की मजबूती में काफी कुछ बदलाव आया है। बदलाव का कारण मौजूदा संस्कृति और संस्कारों में बदलाव रहा है। पूर्व में दोस्ती पर मरने मिटने की कसमें खाते थे। आज समय उलट है। वर्तमान में दोस्ती को स्वार्थ की जंजीरों ने जकड़ लिया है। अब कम ही लोग दोस्ती जैसे पवित्र रिश्ते के अर्थ को समझते है।
 
सीए पूनम जैन ने बताया दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो हम खुद चुनते है। दोस्ती शब्द आते ही  श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता याद  आती है । ये दोस्ती पूर्ण नि:स्वार्थ प्रेम की थी । जिसमे एक दोस्त दूसरे दोस्त के लिए जान दे सकताथा।  आज की दोस्ती फेसबुक, व्हाट्सअप में ही अधिक नजर आने लगी है।  किसी की प्रोफाइल फोटो पसंद आई और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी । ऐसी दोस्ती में दो-चार महीने बातें हुई और फिर सब खत्म। हमारे पूर्वजों ने जो दोस्ती की दो परिवारों की दोस्ती थी। उनके बच्चों में भी वहीं अपनापन होता था। आपस में भाई-भाई समझते थे। आज की दोस्ती को माता-पिता को बताने में भी कतराते है। दोस्ती करो तो ऐसी करो की एक का नाम पुकारे और दूजा दौड़ा आए। ऐ फिजा मुझे जीना सीखा दे,मेरे दोस्त से मुझे मिला दे।। दोस्ती की कसम दोस्त नहीं है,मुस्कान है होठों की, ऐ रब दोस्ती में मरना सीखा दे।
 
लॉरेट पब्लिक स्कूल की डायरेक्टर आभा जैन  ने बताया आज लोग ओवर प्रैक्टिकल हो गए है। दोस्ती को बिजनेस के हिसाब से देखने लगे है कि कहां फायदा होगा। फ्रैंडशिप में स्वार्थ मोटिव हो गया है। एथिक्स वाली बात नहीं रही। दोस्ती में गर्मजोशी पहले थी अब नहीं है। खैर, समय का भी अभाव हो गया है। लोगों के व्यूज भी दोस्ती में बदल गए है।
 
सुधा हॉस्पिटल के कार्डिक एंड वैस्क्युलर सर्जन डॉ. पलकेश अग्र्रवाल का कहना है लाइफ पहले से बिजी और फास्ट हो गई है। पहले दोस्ती में समय रहता था। उतना समय अब नहीं रहता। सोशल मीडिया में इनवॉल्वमेंट ज्यादा हो गया है। फॉर्मल फ्रैंडशिप में टाइम वेस्ट करते है। एक्चुअल फ्रेंड्स के लिए टाइम कम हो गया है। पहले की तुलना में समय कम दोस्तों को देते हैं। जो फ्रैंडशिप पुराने समय में होती थी उतनी स्ट्रांग अब नहीं है।
 
आरटीयू कोटा के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ मनीष चतुर्वेदी  का कहना है पहले और अब की दोस्ती में सबसे बड़ा फर्क यह है की पहले कि यादें किसी कैमरे या मोबाइल में कैद नहीं हैं, किन्तु हृदय पटल पर अंकित हैं। आज भी जब पुराने दोस्त मिलते हैं तो उन्हें एक-एक बात याद रहती है। कोई कुछ नहीं भूला। पहले संसाधन कम होते थे तो बचपन से ही मिल बांट कर रहने की आदत थी, एक साइकिल होती थी और चलाने वाले बारह और किसी को कोई तकलीफ नहीं। चीजों की अहमियत हर कोई जानता था, साथ खेलने के लिए ज्यादा साजो-सामान की जरुरत नहीं होती थी। ऊंच नीच का कोई फर्क नहीं, अमीर-गरीब के बच्चे एक साथ खेलते थे और पक्के दोस्त भी होते थे। 
 
राजकीय नर्सिंग महाविद्यालय की स्टूडेंट  दिव्या शर्मा ने बताया आज के स्वार्थवादी जगत में सच्चा तथा ईमानदार मित्र मिलना अपने आप में बहुत ही सौभाग्य की बात है। आज कृष्ण और सुदामा की दोस्ती तो नामुमकिन है। फिर भी सच्चा मित्र वह होता है जो आपके कठिन समय व विपरीत परिस्थिति में हमेशा साथ दे। पहले के जमानें में नि:स्वार्थ मित्रता  हुआ करती थी। वर्तमान में दोस्ती के मायने बहुत बदल गए है। ये बात सच है कि दोस्ती बहुत अमूल्य रिश्ता है । हमारे परिवार के बाद जिसे हम स्वयं चुनते है। बदलते समय के साथ दोस्ती भी बदल गयी है। पहले के समय दोस्त हमेशा साथ में रह कर समय व्यतीत करते थे, लेकिन आज कल के समय में दोस्ती सिर्फ  मोबाइल चैट तक ही सीमित हो गई है। वर्तमान समय में दोस्ती में बाहरी दिखावा ज्यादा है और आपसी विश्वास की कमी है।
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