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यह जूता एक इबारत है

Friday, April 19, 2019 09:55 AM

आमतौर पर हर कहावत का अपना एक माजी होता है। समय और समाज की प्रयोगशाला से पगी और निकली ये कहावतें अक्सर सत्य की तरह बेहद कड़वी और क्रूर होती हैं। ऐसी ही एक पुरानी देसी कहावत है- ‘मियां की जूती, मियां के सिर’। अपन नहीं जानते इस कहावत का माजी क्या है। और कहावत कैसी बनी। पर इस कहावत का जो अपन मतलब समझ पायें हैं वह यह कि किन्हीं मियां जी की जूती उन्हीं के सिर पर गिरी पड़ी या फिर मियां जी से खफा किसी शख्स ने उन्हीं की जूती उठाकर उनके सिर दे मारी।

अब यह महज संयोग की ही बात है कि पिछले कुछ दिनों से यह कहावत भाजपा पर सटीक बैठती नजर आ रही है। आमतौर पर भाजपा के लोग खुद को कोई सियासी पार्टी नहीं अलबत्ता एक ही परिवार के लोग मानते हैं। यानी सभी भजापाई एक ही परिवार के हैं और वह परिवार भाजपा है। और परिवार के भीतर फिलहाल आलम यह है कि बतर्ज मियां की जूती मियां के सिर, भाजपा परिवार के लोग अपने ही परिवार के दूसरे लोगों पर जूता चलाने से कतई परहेज नहीं कर रहे। पिछले दिनों संत कबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी ने अपनी ही पार्टी के एक विधायक राकेश सिंह बघेल के सिर पर भरी सभा में जूता बरसाने लगे। मुल्क भर के लोग यह गणित लगाते पाये गए कि बधेल के सिर पर कितने सेकेंड में कितने जूते बरसे।

बहरहाल, भाजपा में परिवार की कितनी अहमियत है वह संत कबीर नगर के चर्चित जूतमपैजार में भी नजर आया। भाजपा आलाकमान ने शरद त्रिपाठी का तो टिकट काट दिया। पर उनके पिता रमापति राम त्रिपाठी को संत कबीरनगर के बजाए देवरिया से टिकट दे दिया। चूंकि परिवार का भाईचारा कायम करे इसलिए पुत्र को दंडित कर पिता को पुरस्कृत कर दिया गया। बहरहाल, एक बार फिर से भाजपा कुनबे में जूतमपैजार की खबर है। भाजपा की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक व्यक्ति द्वारा जूता फेंके जाने का मामला सामने आया है।

खबरों के मुताबिक यह घटना दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में हुई है। उस वक्त पार्टी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव मध्य प्रदेश की भोपाल संसदीय सीट से भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को लेकर पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। अचानक फ्रेम में एक जूता नमूदार होता नजर आया। फेंके गए जूते से जीवीएल नरसिम्हा राव बाल-बाल बच गए। इस घटना के फौरन बाद भाजपा कार्यकर्ता और सुरक्षा गार्ड जूता फेंकने वाले व्यक्ति को दबोचते नजर आए। बाद में वहां से दिल्ली पुलिस ने पूछताछ के लिए उस शख्स को हिरासत में ले लिया।

इस दौरान मामले के आरोपित की पहचान उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले डॉक्टर शक्ति भार्गव के तौर पर हुई है। बताया जाता है कि वह साध्वी प्रज्ञा को टिकट दिए जाने से नाराज था। उसका यह भी मानना है कि सरकार ने भ्रष्टाचार को लेकर कोई आवाज नहीं उठाई है। इस संबंध में उसने बीते दिनों फेसबुक पर कुछ पोस्ट भी लिखी थीं। बताया यह भी जा रहा है कि आरोपित का अपनी पत्नी और मां के साथ विवाद चल रहा है जिसकी वजह से वह बीते काफी समय से मानसिक तौर पर परेशान है। यह जूते से जुड़ी एक ऐसी हकीकत है, जो सौ फीसद सही है

जूतमपैजार और मानसिक परेशानी का चोली दामन का साथ है। नहीं तो भला कोई भरी सभा में क्यों जूता उठाने लगे। शरद त्रिपाठी इस बात से परेशान बताए जा रहे थे कि विधायक बधेल इलाके में हुए हर विकास कार्य का श्रेय खुद ही लिए जा रहे थे। इलाके के सारे ठेके बघेल के ही हिस्से जा रहे थे। सो, परेशान होकर उनने भरी सभा में जूता चला दिया। शरद त्रिपाठी की परेशानी तो निजी थी। पर डा. शक्ति भार्गव का मामला निजी नहीं अलबत्ता सार्वजनिक हित का लगता है। बेशक, जीबीएल नरसिम्हा राव कह रहे हों कि जूता फेंकने वाले ने कांग्रेस की ‘मानसिकता’ दिखलाई है।

पर शुरुआती शोध में पता चला है कि कानपुर के रहने वाले डा. भार्गव और उनका पूरा परिवार भाजपा का समर्थक रहा है। उनके फेसबुक अकाउंट से यह हकीकत साफ जाहिर होता है। उनके फेसबुक पेज पर लालकृष्ण आडवाणी, नरेन्द्र मोदी, रामनाथ कोविंद और नीतिन गडकरी जैसे तमाम वरिष्ठ भाजपा नेताओं के फोटो चस्पा हैं। हालांकि 16 अप्रैल यानी बुधवार को लिखे गए उनके पोस्ट से वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भ्रष्टाचार पर रुख से नाराज नजर आते हैं। अपने पोस्ट में वे लिखते हैं- नमो इन 2014, न खाऊंगा और न खाने दूंगा।

नमो इन 2019-नो वायस एगेंस्ट करप्शन विदिन द गवर्नमेंट यानी 2019 में भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आवाज नहीं। कहने की दरकार नहीं कि डा. भार्गव का गुस्सा जीवीएस नरसिम्हा राव के खिलाफ नहीं अलबत्ता भाजपा आलाकमान के खिलाफ हैं। वे भ्रष्टाचार के सवाल पर नरेन्द्र मोदी के मौजूदा रुख से नाराज हैं। वे प्रज्ञा ठाकुर को भी भोपाल से उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज हैं। यानी डा. भार्गव का यह जूता दीवार पर लिखी एक ऐसी इबारत है जिसका मजमून साफ है कि भाजपा परिवार के लोग ही नेतृत्व से नाराज हैं।

अब यह भाजपा नेतृत्व का अख्तियार है कि चाहे तो इसे पढें, चाहे तो इसे कांग्रेस की मानसिकता कह खारिज कर दें। डा. भार्गव जैसों की परेशानी है कि जिंदगी के इस मुक्कदस वक्त की कुछ खूबियां हैं, आदमी की आदमी से दूरियां हैं। जिन्दगी की दौड़ में शामिल हुए हम, और हासिल हुआ क्या, मायूसियां हैं।

- शिवेश गर्ग

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