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इंडिया गेट

टेल ऑफ टू प्रेस कॉन्फ्रेंस

Saturday, May 18, 2019 09:55 AM
प्रेस वार्ता करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व अमित शाह

 शिवेश गर्ग

थी खबर गर्म कि पुर्जे उड़ेंगे गालिब के, तमाशा देखने हम भी गए, पर तमाशा न हुआ। शुक्रवार को इतिहास बनने-बनते रह गया। शुक्रवार को दोपहर मीडिया के हलकों में तकरीबन हंगामा सा मच गया था। खबर थी कि प्रधानमंत्री पांच साल में अपना पहला प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं। जो लोग भाजपा कवर करते हैं वे दिल्ली के पार्टी के आलीशान दफ्तर की तरफ  दौड़ पड़े। जो लोग न पहुंच सके वे टीवी से चिपक कर इंतजार करने लगे कि पांच साल शासन करने के बाद मीडिया उनसे क्या सवाल करती है और वे उसका क्या जवाब देते हैं। प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस को लेकर मीडिया में ऐसी उत्कंठा और शिद्दत का होना लाजमी था क्यों कि सवाल केवल पिछले पांच साल का ही नहीं था।

अलबत्ता नरेन्द्र मोदी जब से सियासत कर रहे हैं उन्हें कोई प्रेस कांफ्रेस करते नहीं देखा गया है। उनने ऐसा 12 सालों में तब भी नहीं किया जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। पिछले पांच साल से तो उन पर पूरे मुल्क की ही नजर नहीं है अलबत्ता पूरी दुनिया की नजर है। वे बेशक फर्राटा शैली में जितने भी भाषण देते हों, पर लोगों ने उन्हें कभी प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के सवालों का जवाब देते नहीं देखा। भारत की सियासत पर नजर रखने वाले दुनिया के अखबार भी अचरज में हैं कि आखिर भारत के प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते। लिजाजा शुक्रवार को जब खबर फैली कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रेस कांफ्रेंस करने वाले हैं, तो चौतरफा लोगों की नजर उनके प्रेस काफ्रेंस पर थी।

प्रेस कांफ्रेंस में उनके साथ अमित शाह भी मौजूद थे। पहले उनने अपनी बात रखी, फिर इंतजार करते कैमरे प्रधानमंत्री की ओर मुखातिब हुए और प्रधानमंत्री ने अपनी बात शुरू की। तकरीबन 15 मिनट के एकालाप में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसे प्रधानमंत्री के पहले प्रेस कांफ्रेंस के लिहाज से कुछ नया माना जाए। वे हमेशा की तरह कांग्रेस पर हमलावर दिखे और तकरीबन उपदेशक की शैली में आ गए। और एकबारगी तो ऐसा लगा कि वे प्रेस कांफ्रेंस नहीं रेडियो पर मन की बात कर रहे हों। जब उनका एकालाप टूटा और बात सवाल जवाब की आई और मीडिया तमाम सवालों से खुद को लैस ही कर रही थी कि प्रधानमंत्री के एक बयान ने सारे उत्साह पर पानी फेर दिया।

उनने खुद को पार्टी का अनुशासित सिपाही बताया और कहा कि वे अध्यक्षजी यानी अमित शाह के आदेशों से बंधे हैं। और बगल में बैठे अध्यक्षजी ने उनने मीडिया के सवाल जवाब देने की इजाजत देनी जरुरी नहीं समझी। अध्यक्षजी ने खुद ही मीडिया के सारे सवालों का जवाब दिया, जिसका कोई मतलब नजर नहीं था, क्योंकि दुनिया तो तमाम सवालों का जवाब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुंह से सुनना चाहती थी।

पर हमेशा की तरह उसे निराशा ही हाथ लगी। दूसरी ओर जब प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस करने की खबर कांग्रेस कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तक पहुंची, तो उनने भी तकरीबन उसी समय प्रेस कांफ्रेंस कर फिर से वहीं तमाम सवाल रख डाले, जो वे चुनाव प्रचार के दौरान उनसे पूछते रहे हैं और जिन सवालों पर वे नरेन्द्र मोदी को बहस कर लेने की खुली चुनौती देते रहे हैं। जब राहुल प्रेस कांफ्रेस कर रहे थे तो उन्हें यह भरोसा था कि प्रधानमंत्री मीडिया के सवालों का जवाब देंगे। सो, उनने चंद मिनटों में अपने सवाल रख कर फारिग हो गए। तब उन्हें नहीं पता था कि प्रधानमंत्री से पूछे गए सवालों का जवाब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह देने वाले हैं।

सो जब प्रधानमंत्री का कथित प्रेस कांफ्रेंस समाप्त हुआ तो बाद में राहुल ने ट्वीट कर कटाक्ष किया, बहुत खूब प्रधानमंत्री जी, मैं उम्मीद करता हूं कि अगली बार अमित शाह आपको कुछ सवालों के जवाब देने की इजाजद दे देंगे। फिलहाल तो लगता है दुनिया को और मुल्क की जनता को शायद अभी उस प्रेस कांफ्रेंस के लिए और इंतजार करना पडेगा, जिसमें मुमकिन है कि नरेन्द्र मोदी मीडिया के सवालों का जवाब देते देखे जाएं और तब शायद उन्हें सवालों का जवाब देने के लिए अमित शाह के इजाजत की दरकार न पड़े। एक सवाल तो रह ही जाता है कि आखिर जब प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के सवालों का जवाब देना ही नहीं था, तो फिर अमित शाह के प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री को बैठने की जरूरत ही क्या थी।

क्या केवल अमित शाह के इस बयान का गवाह बनने के लिए कि 23 मई को भाजपा 300 से अधिक सीटें जितने वाली है। वैसे यह दावा भी तो खुद प्रधानमंत्री अपने चुनावी भाषणों में कई बार कर चुके हैं। तो आखिर अलग से प्रेस कांफ्रेंस का हंगामा खड़ा कर दोबारा यह बताने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या यह आत्मविश्वास के कमी की कोई कहानी कहती है। दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने भविष्य का फैसला जनता पर छोड़ा है।

उनने कहा है कि जनता 23 मई को जो भी फैसला करेगी, उन्हें स्वीकार होगा। यानी उन्हें विश्वास जनता पर है। फिलहाल तो अपन को भी 23 मई का इंतजार है। पर शुक्रवार को हुए दोनों प्रेस कांफ्रेंसों के अपने-अपने संदेश हैं, जिसे समझने की            जरूरत है।

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