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इस फराखदिली का सबब क्या

Wednesday, February 26, 2020 10:10 AM
मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत में जुटे थे।

दिल्ली में हमारे मुल्क के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और तमाम खबरिया चैनल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में जुटे थे। उसी समय दिल्ली के जमुनापार के उत्तर-पूर्व के इलाके दंगे की आग में झुलस रहे थे। लग रहा रहा था गोया यह दोनों ही घटनाएं दो मुल्कों में घट रही थी, जिसका एक-दूसरे से कोई लेना देना न था। एक ओर जहां लाल कालीन बिछे थे, हैप्पीनेस क्लास के दौरे हो रहे थे। दूसरी ओर आग, झड़प, पथराव हो रहा था, लेकिन भाजपा के नेता कपिल मिश्रा दोनों घटनाओं को जोड़ कर देख रहे थे। उनने दिल्ली के मौजपुर इलाके में दिल्ली पुलिस की उपस्थिति में सीएए का विरोध कर रहे लोगों को धमकाया था और उन्हें राष्ट्रपति ट्रंप के मुल्क के चले जाने भर का समय दे रहे थे, लेकिन नफरत को फैलाना आसान होता है, लेकिन उसे काबू कर पाना बेहद कठिन है। उन्होंने जो नफरत फैलाई थी, उसने राष्ट्रपति ट्रंप के जाने तक का इंतजार नहीं किया और देखते ही देखते दिल्ली में माहौल खराब हो गया। इस बीच दिल्ली से खबर मिली कि भारत और अमेरिका के बीच तीन अरब डॉलर का एक रक्षा समझौता हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक व्यापक बातचीत के बाद इसका ऐलान हुआ। समझौते की जानकारी देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा कि वे भारत का यह दौरा कभी नहीं भूलेंगे। इस सौदे में अमेरिका से 24 एमएच 60 रोमियो हेलीकॉप्टर की 2.6 अरब डॉलर की खरीद शामिल है।

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस समझौते से दोनों देशों के रक्षा संबंध और मजबूत होंगे। उनका यह भी कहना था कि अमेरिका और भारत ने एक विस्तृत व्यापार समझौते की दिशा में काफी प्रगति कर ली है। एक व्यापारी की तरह वे यह बताने नहीं भूले कि हम दुनिया के सबसे बेहतरीन हेलीकॉप्टर, रॉकेट, फाइटर प्लेन बनाते हैं और हम 3 अरब डॉलर की कीमत के हेलीकॉप्टर भारत की सेना को देने जा रहे हैं। भारत हमारा बड़ा डिफेंस पार्टनर है। कहने की दरकार नहीं कि इस पार्नटनरशिप का मुनाफा किसे हो रहा है। पिछले 36 घंटे के दौरान अहमदाबाद से लेकर दिल्ली तक जो तामझाम नजर आया। उसमें एक बात साफ दिखी की भारत, अमेरिका की मदद के लिए आमादा है। वह स्वयं का नुकसान कर के भी अमेरिका की मदद कर देना चाहता है। बताया जाता है कि हमारी सरकार ने ट्रंप के स्वागत के लिए तकरीबन 100 करोड़ रुपए खर्च कर दिए। गौर करने की बात है कि इससे पहले भी जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाउडी मोदी के लिए अमेरिका गए थे, तो भी वहां के आयोजन का खर्च भी भारत की ओर से ही किया गया था। सवाल है कि आखिर यह खर्च किस मकसद से किया जा रहा है, जहां एक ओर इन कार्यक्रमों के लिए भारत की ओर से पानी की तरह पैसा बहाया गया। दूसरी ओर अपनी गरीबी छिपाने के लिए अहमदाबाद की गरीब बस्तियों को दीवार से ढक दिया गया, ताकि राष्ट्रपति ट्रंप यहां की गरीबी न देख लें, क्या अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के बारे में इतना कम जानते हैं। ऐसा लगता तो नहीं है, क्योंकि वह यहां कि नदियों के बारे में जानते हैं, सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली के बारे में भी जानते हैं। यहां तक कि वह यह भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी गरीबी के दिनों में कैफटेरिया में भी काम कर चुके हैं और फिर उनकी सुरक्षा तो ड्रोन से की जा रही थी। उनके ड्रोन ने तो दीवार के दूसरी ओर की गरीबी तो देख ही ली होगी, लेकिन इस दौरान गरीबी छिपाते-छिपाते हम उन्हें वह दिखा बैठे जिस पर हम पूरी दुनिया में अब तक गर्व करते रहे हैं। हम दुनिया भर में इस बात का ढोल पीटते रहे हैं कि हमे बड़े उदार लोग है और सारे धर्मों से लोग यहां मिल-जुल कर रहते हैं।

अहमदाबाद के भाषण में राष्ट्रपति ट्रंप ने भी मोटेरा स्टेडियम में जमा भीड़ को इस बात की याद दिलाई थी, लेकिन जलती और झुलसती दिल्ली की भयावह तस्वीरें तो राष्ट्रपति ट्रंप की सुरक्षा में तैनात ड्रोन से तो जरूर ले ली होंगी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप को न तो यहां की गरीबी से कोई लेना-देना है और न तो जलती-झुलसती दिल्ली की उन तस्वीरों से जो उनके ड्रोन ने ली होंगी। उनका असली मकसद अपना हित साधना था। सबसे पहले अमेरिका का व्यापारिक हित और लगे हाथों राष्ट्रपति पद के जारी चुनाव में सियासी हित। सऊदी अरब के बाद अमेरिका से हथियार खरीदने वाला भारत दूसरा मुल्क बन गया है। और उसकी इसी उपलब्धि की वजह  से अमेरिका ने भारत को 2016 में डिफेंस पार्टनर का दर्जा दिया था। इतना ही नहीं, जानकार बताते हैं कि अमेरिका को फायदा देने की कवायद में भारत ने कम्युनिकेशन कंपेटिबिलिटी एंड सिक्युरिटी एग्रीमेंट यानी कॉमकासा पर हस्ताक्षर कर चुका है। तकनीक के जानकार बताते हैं कि यह समझौता भारतीय संप्रभुता के लिहाज से बड़ा खतरा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर हम अंदर बाहर के तमाम खतरे उठाकर अमेरिका के हितों को साधने पर क्यों आमादा हैं।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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