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इंडिया गेट

तो ऐतिहासिक रहा अबके गणतंत्र दिवस

Thursday, January 28, 2021 10:50 AM
प्रदर्शनकारियों ने लालकिले पर फहराया धार्मिक झंडा।

तो दिल्ली की सरहदों पर पिछले 2 महीने से चल रहे किसान आंदोलन के लिए 72वां गणतंत्र दिवस ऐतिहासिक साबित हुआ है। किसानों ने पूरी दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकाली, पुलिस बैरिकेड तोड़े, लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर किसानी का झंडा फहराया। हुआ यों कि पुलिस के रूट से हट कर दिल्ली की तरफ बढ़े किसान लाल किले तक पहुंच गए। लाल किले के अंदर घुसे हजारों किसानों को देखना एक ऐतिहासिक मंजर था। इसी बीच एक युवा किसान लाल किले की प्राचीर पर चढ़ गया और निशान साहिब (गुरुद्वारे पर लगाने वाला झंडा) के साथ किसानी का झंडा उस जगह पर फहराया जहां से मुल्क के प्रधानमंत्री भाषण देते हैं। हालांकि दिल्ली पुलिस और सरकार की तमाम एजेंसियां किसानों पर यह हिंसा का आरोप मढ़ रही हैं। जब कुछ किसान पुलिस की ओर से तय रूट पर न जाकर दिल्ली के अंदर घुस आए, तब पुलिस ने उन पर बेरहमी से आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। इसी सिलसिले में आईटीओ पर एक किसान की मौत भी हो गई।

पुलिस का कहना है कि उसकी मौत तेज चल रही गाड़ी से गिरने से हुई है। जबकि दूसरी ओर किसानों का कहना है कि किसान की मौत पुलिस की पिटाई से हुई है। अपन मौके पर तो मौजूद नहीं थे। मगर पुलिस जिस बेहरमी से किसानों को लाठियां बरसा रही थी और आंसू गैस के गोले दाग रही थी, आईटीओ पर इसके अपन भी चश्मदीद रहे। पुलिस की लाठी से एक बुजुर्ग किसान को सिर फटते भी देखा। पुलिस की गतिविधियां तकरीबन ऐसी थी कि वह किसानों को हिंसा के लिए उकसाना चाह रही हो। जानकार यह भी बताते हैं कि अक्षरधाम और आईटीओ पर तोड़-फोड़ की घटना किसानों के टैक्टर का कारवां गुजर जाने के बाद हुई। सरकार के नुमाइंदे और गोदी मीडिया यह साबित करने में जुटी है कि किसानों ने लाल किले पर चढ़कर उपद्रव मचाया। सवाल है कि 26 तारीख को लाल किले की सुरक्षा चाक चौबंद रहती है। ऐसे में किसान आखिर लाल किले की प्राचीर पर कैसे चढ़ गए? जब किसान लाल किले की प्राचीर पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तो सुरक्षा में तैनात पुलिस के जवान क्या कर रहे थे?

हकीकत यह थी कि जब किसानों का जत्था लाल किले पर पहुंचा तो वहां पुलिस कोई जवान था ही नहीं और जो जवान वहां थे वह सड़क किनारे हाथ बांधे खड़े थे। यानी आंदोलनकारियों को पहले सोची समझी रणनीति के तहत लाल किले की प्राचीर पर पहले चढ़ जाने दिया गया। जाहिर है जिसमें उपद्रवी तत्व भी शामिल थे, जिनने प्राचीर पर चढ़कर जमकर उत्पात मचाया। जिसे गोदी मीडिया ने किसान आंदोलन को बदनाम करने का जरिया बना डाला। क्या पुलिस का यह तरीका किसान आंदोलन को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा नहीं लगता? अभी चंद रोज पहले भी सिंघु बार्डर पर असलहे के साथ किसानों ने एक युवक को पकड़ा था, जिसने किसानों के सामने कबूल किया कि उसे पुलिस ने वहां भेजा है। बाद में जब किसानों ने उसे पुलिस के हवाले किया तो वह मुकर गया। जाहिर है हिंसा के नाम पर किसान आंदोलन को बदनाम करने की कवायद सरकार की ओर से पहले भी होती रही है।

किसान संगठनों को भी ऐसी साजिश की आशंका है, लिहाजा किसान संघों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने ट्रैक्टर परेड के दौरान हिंसा में शामिल लोगों से मंगलवार को खुद को अलग कर लिया और आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्वों ने घुसपैठ कर ली है, अन्यथा आंदोलन शांतिपूर्ण था। संघ ने अवांछित और अस्वीकार्य घटनाओं की निंदा की है और खेद जताया है। संयुक्त किसान मोर्चा में किसानों के 41 संगठन हैं। वह दिल्ली की कई सीमाओं पर केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन की अगुवाई कर रहा है। किसान संगठन ने एक बयान में कहा कि आज के किसान गणतंत्र दिवस परेड में अभूतपूर्व भागीदारी के लिए हम किसानों को धन्यवाद देते हैं। हम अवांछनीय और अस्वीकार्य घटनाओं की निंदा करते हैं और खेद भी जताते हैं। जो घटनाएं आज हुई हैं और ऐसे कृत्यों में शामिल लोगों से खुद को अलग करते हैं। जाहिर है किसानों को अगर हिंसक रास्ता अख्तियार करना होता तो दिल्ली की सरदहों पर वे यों महीनों से न बैठे होते।

पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरता जैसे सूबों के किसान 28 नवंबर से दिल्ली की अलग अलग सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांग है कि तीन कृषि कानूनों को रद्द किया जाए और एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए। मगर मोदी सरकार अपनी जिद पर अड़ी है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में टैक्टर पैरेड के जरिए चेतावनी दे डाली है कि किसान अपनी मांग मनवाए बिना वापस जाने वाले नहीं हैं। वैसे भी मुल्क भर के किसान अपनी मांगों के बरक्स लंबे संघर्ष का मन बना चुके हैं। अगले कदम के तौर पर किसानों ने बजट के दिन संसद तक पैदल मार्च करने का फैसला किया है।
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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