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तो ऐतिहासिक रहा अबके गणतंत्र दिवस-2

Friday, January 29, 2021 10:10 AM
फाइल फोटो।

दिल्ली सहित मुल्क भर में किसानों और आम लोगों ने अबके गणतंत्र दिवस पर भारत में जन आंदोलनों के इतिहास का एक नया अध्याय जोड़ दिया है। आज आलम यह है कि यूपी, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, महराष्ट्र, बिहार, यूपी, आंध्र, तेलंगाना, गुजरात और ओडिशा सहित मुल्क के अधिकतर सूबों में किसान आंदोलन की गूंज सुनाई पड़ने लगी है। लोग अपनी जान की परवाह किए बगैर सड़कों पर उतरकर 3 विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। मंगलवार को उत्तर प्रदेश पुलिस ने बागपत में किसान यूनियन के सदस्यों पर लाठीचार्ज किया, यह किसान गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर परेड में शामिल होने के लिए दिल्ली जा रहे थे। किसान नेताओं का इल्जाम है कि पुलिस ने कुछ ट्रैक्टर रोकने की कोशिश की है लेकिन नाकामयाब रही क्योंकि किसानों की संख्या बहुत ज्यादा थी।

बड़ौत क्षेत्र में कई बैरिकेड तोड़ कर किसान हजारों ट्रैक्टर लेकर आगे बढ़ रहे थे। ऐसी ही खबरें गौतम बुद्ध नगर से आईं, जहां किसानों के एक और जत्थे ने बैरिकेड तोड़ा और आगे बढ़े। गुजरात के भावनगर में सैकड़ों किसानों ने कृषि कानून वापस लेने की मांग करते हुए दिल्ली के प्रदर्शनकारी किसानों का समर्थन किया। बाद में पुलिस ने 7 किसान नेताओं को गिरफ्तार किया। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के किसानों ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले बैलगाड़ियों पर 16 किलोमीटर लंबी रैली निकाली, जो जिले की कृषि उपज मंडी से अंजड़ तक गई। तीनों कृषि कानूनों को खारिज करने और दिल्ली की ट्रैक्टर परेड को समर्थन देने की मांग करते हुए सैंकड़ों किसानों ने रैली में भाग लिया है।

मध्य प्रदेश के रीवा और सतना जिले में किसानों ने विशाल ट्रैक्टर रैली का आयोजन किया। रीवा में किसान करीब 11 बजे ट्रैक्टर ले कर सड़कों पर आए और कृषि मंडी से एसएफ चौक तक तिरंगा फहराते हुए रैली की। बिहार में दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसानों के समर्थन में और तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग के साथ किसानों ने ट्रैक्टर परेड निकाली और धरने दिए। बड़ी संख्या में दुपहिया और चौपहिया वाहनों, ऑटो वालों ने भी किसानों का समर्थन किया। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी तमाम शहरों में हजारों की संख्या में किसान जमा हुए और कृषि कानून वापस लेने की मांग करते हुए दिल्ली के प्रदर्शनकारी किसानों का समर्थन किया। मोदी सरकार की ओर से पारित तीन विवादित कृषि कानूनों के बरक्स मुल्क भर से उठती ये आवाजें मुल्क के गणतंत्र को लेकर पैदा हुए बड़े सवाल हैं और जाहिर है यह सवाल हमारे संविधान और गणतंत्र की बुनियादी मूल्यों से जुड़ा है।

सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि किसानों को अपना सारा काम धाम छोड़कर सड़कों पर उतरना पड़ा? असल में, हमारा संविधान जिसे हम भारत के लोगों ने खुद ही अंगिकृत किया है और उसने कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद को सौंपी है और जब-जब संसद जनता के हक में कानून बनाने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ती है या बेइमानी करती है, तब-तब इस मुल्क की जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जहां तक 3 कृषि कानूनों का सवाल है तो सरकार ने कानून बनाने की अपनी जिम्मेदारी के बरक्स साफ तौर पर बेइमानी की है। सितंबर के महीने में जिस धोखे के साथ राज्यसभा में यह कानून पारित किया गया, वह भारत के संसदीय इतिहास का काला अध्याय है। मोदी सरकार यह जानती थी कि उच्च सदन में बहुमत न होने की वजह से वह इन तीनों कानूनों को पारित नहीं करवा सकती। सो, तमाम संसदीय कायदे को ताक पर रखकर जोर जबरदस्ती के दम पर कानून को पारित करवाया गया।

जबकि लोकतंत्र और संसद की मर्यादा का तकाजा यही था कि जब राज्य सभा में सरकार के पास कानून को पारित करा पाने का बहुमत नहीं था, तो तमाम सहयोगी और विपक्षी दलों को विश्वास में लेने के लिए बातचीत करनी चाहिए थी या फिर उसे व्यापक विचार विमर्श के लिए संसदीय समिति को सौंपा जाना चाहिए था। संसदीय समितियों को ‘मिनी-पार्लियामेंट’ का दर्जा हासिल है। पर मौजूदा सत्ताधारियों ने संसदीय समितियों को बेमतलब बना दिया। यह पहला मौका नहीं है जब अहम या विवादास्पद विधेयकों को भी संसदीय समितियों के विचारार्थ भेजने की परिपाटी खत्म कर दी गई। कभी अपने बहमुत का दुरुपयोग करते हुए और कभी जोर जबर्दस्ती से ऐसे-ऐसे विधेयकों को पारित कराया गया, जो हमारे संविधान की बुनियादी संरचना और भावना के खिलाफ थे।

लोकतंत्र में अक्सर ऐसा होता है, जब सरकारें उसी जनता से द्रोह कर बैठती हैं जो उन्हें चुनकर वहां भेजती है। और तब जनता को अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरना पड़ता है। लोकतंत्र के इस सूरतेहाल को परिभाषित करता हुआ एक बेहद काबिलेगौर नारा किसान आंदोलन में चल रहा है। संसद तुम्हारी है, सड़क हमारी है। लाजिम है कि संसद ने जब संविधान के खिलाफ द्रोह किया है तब आज मुल्क की जनता अपनी जान की परवाह किए बगैर सड़कों पर है। और जनता के इस जज्बे ने अबके गणतंत्र दिवस को ऐतिहासिक बना दिया है।
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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