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इंडिया गेट

सतरंगी सियासत

Monday, September 20, 2021 11:15 AM
कॉन्सेप्ट फोटो

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का इस्तीफा हुआ। लेकिन दोनों में अंतर। जहां रुपाणी का इस्तीफा इतना गुपचुप हुआ कि किसी को खबर तक नहीं लगी। यहां तक कि भाजपा नेतृत्व ने पूरी सरकार ही बदल डाली। लेकिन पंजाब के मामले में बीते छह महिने से असंतोष और बगावत के हालात। अब कैप्टन ने इसमें राष्टÑीय सुरक्षा और सारे विकल्प खुले जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर डाला। जबकि रुपाणी ने कहा, पार्टी में जिम्मेदारियां बदलती रहती। इसमें कुछ भी अलग नहीं। अब वह नई भूमिका में होंगे। जो पार्टी नेतृत्व देगा। सो, माना जाए? कांग्रेस में जो चल रहा वह महज संयोग? इसे नेतृत्व की पकड़ ढीली होने का संकेत माना जाए या समय का फेर। जबकि भाजपा के लिए समय साथ होने का संयोग माना जाए? कुछ भी हो। कोरोना महामारी के बाद राजनीतिक हलचलें शुरु हो गईं। सो, कुछ न कुछ होता रहेगा। आखिर जनता भी कोरोना महामारी के डर से उभ चुकी।


तीन इस्तीफे...  
बीता सप्ताह दिग्गजों के इस्तीफों के नाम रहा। विजय रुपाणी, क्रिकेटर विराट कोहली और अमरिन्दर सिंह। फिर अगला नंबर किसका? चर्चा अभी से शुरु हो गई। राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में हलचल बढ़ने वाली। लेकिन इन राज्यों में तुरंत चुनाव नहीं। फिर अमरिन्दर सिंह की आयु 80 के आसपास। लेकिन कांग्रेस शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ के सीएम के साथ ऐसी कोई बात नहीं। तीसरा कारण- दोनों की सत्ता एवं संगठन पर पकड़। और इनके द्वारा गांधी परिवार को चुनौती देने जैसे हालात नहीं। जबकि कैप्टन यह काम बहुत पहले कर चुके। लगभग सभी का अनुमान। इस कदम से कांग्रेस को लाभ से ज्यादा राजनीतिक नुकसान। उसके बावजूद नई लीडरशिप तैयार करने के बहाने सीएम से इस्तीफा लेना कोई लाभ का सौदा नहीं बताया जा रहा। बल्कि इससे पंजाब में पार्टी के लिए हालत और कठिन ही होंगे। क्योंकि जिनके हाथ में संगठन और सत्ता आएगी। वह इतने क्षमतावान नहीं। जबकि कैप्टन मंजे-मंजाए, घुटे-घुटाए, पके-पकाए और अनुभवी नेता। उसके बावजूद बदलाव जमीन पर उतर गया।


बदलाव यूं हुए...

भाजपा ने थोड़े समय में ही कर्नाटक, उत्तराखंड और गुजरात के सीएम बदल दिए। इसके पहले असम के सिटींग सीएम चुनाव के बाद बदले गए। जबकि कांग्रेस में पंजाब, राजस्थान छत्तीसगढ़ में राड़ा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। सो, क्या जाए? एक देश की सबसे पुरानी पार्टी। तो दूसरी आज भी कांग्रेस की तरह भारत में सर्वस्पर्शी एवं सर्वव्यापी होने को लालायित। गुजरात में बदलाव इतना गुपचुप हुआ कि मीडिया को खबर तक नहीं लगी। सबकुछ हो गया। उसके बाद ही जानकारी सार्वजनिक हुई। इस बारे में पीएम मोदी कह चुके। वह संविधान की शपथ का अक्षरश: पालन कर रहे। मतलब गोपनीयता की शपथ। राजनीतिक जानकार समझ ही नहीं पा रहे। वहीं, कांग्रेस दौर में कैबिनेट मीनिट््स तक की मीडिया को जानकारी हो जाती थी। भाजपा में न नराजगी सामने आ रही। न ही असंतोष। जबकि कांग्रेस में सभी सत्तारूढ़ राज्यों में तलवारें खिंची हुईं। शायद यही अंतर दोनों को काम करने के तौर तरीकों से अलग करता है।


पवार उवाच!
महाराष्ट्र में कांग्रेस की सहयोगी एनसीपी और शिवसेना ने एक बार फिर से उसे असहज किया। मराठा दिग्गज और क्षत्रप शरद पवार ने कांग्रेस की वर्तमान हालत पर तंज कस डाला। कहा, कांग्रेस की हालत वैसी ही जैसे आजकल के जमींदारों की। मतलब, बिना जमीन के जमींदार। पवार का तंज दूर तक का संकेत। पवार जो बोलते। उसके कई-कई राजनीतिक मायने। वह कभी नहीं चाहते कि कांग्रेस, एनसीपी के मुकाबले राज्य में मजबूत हो। जबकि शिवसेना प्रमुख एवं सीएम उद्धव ठाकरे ने अनायास या कहें बातों ही बातों में भाजपा को भविष्य का संभावित सहयोगी बता डाला। असल में, अगले ही साल मुंबई महा नगरपालिका चुनाव। जहां कांग्रेस ने अकेले लड़ने का ऐलान किया हुआ। ऐसे में महाविकास अघाड़ी सरकार में खटपट स्वाभाविक। लेकिन पवार का इसी समय बोलना विपक्षी एकता के राग को धक्का। जबकि टीएमसी पहले ही कांग्रेस को 2024 के आम चुनाव में अगुवाई के लिए खारिज कर चुकी। ऐसे में कांग्रेस के लिए संदेश क्या? अनुमान लगाने वाले लगा रहे!


भारत की क्षमता...
भारत ने कोरोना टीकाकरण के मामले में कीर्तिमान गढ़ दिए। पहले दो बार एक करोड़ से ज्यादा का टीकाकरण। फिर पीएम मोदी के जन्मदिवस पर इसे ढाई करोड़ के पार पहुंचा दिया। इससे भारत की क्षमता और समस्याओं से जूझने, लड़ने एवं निपटने की ताकत का अंदाजा दुनियां को हो रहा। भारत ने यह कर दिखाया कि कैसे इतने बड़े देश में काम किया जाता है। इसके कई मायने एवं अर्थ। भारत एक लोकतांत्रिक देश और सही मायने में दुनियां के फलक पर उन सब मर्यादाओं का पालन करता रहा। जिनको विश्व मंचों पर मानक के रुप में तय किया गया। हाल ही में खुलासा हुआ। कैसे दुनिया में बड़े देश कहे जाने वाले देश कारस्तानी करते हैं। चीन ने विश्व बैंक के अधिकारियों पर दबाव डाला कि कारोबारी सुगमता के मामले में उसकी रैंकिंग उंची रख जाए। जबकि भारत के मामले में यह बात बकायदा खारिज की गई। मतलब भारत की साख और धाक दुनियां के फलक पर लगातार बढ़ रही।    

-दिल्ली डेस्क

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