Dainik Navajyoti Logo
Friday 27th of November 2020
 
इंडिया गेट

इस्तीफा कोई विकल्प नहीं

Wednesday, May 29, 2019 09:00 AM
राहुल गांधी (फाइल फोटो)

- शिवेश गर्ग
आम चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस हताश है। खबर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी नतीजों से इतने निराश हैं कि वे अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने पर आमादा हैं। अगर बेहद मेहनत के बाद भी नतीजे बेअसर रहे तो उनका हताश होना लाजमी भी है। वैसे देखा जाए तो उन पर इस्तीफे का नैतिक दबाव भी है। क्योंकि नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पंजाब, झारखंड और असम जैसे सूबों के अध्यक्षों ने इस्तीफा हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे डाला है। अब इसे इन इस्तीफों से पैदा हुआ नैतिक दबाव माना जाए या फिर राहुल गांधी का खुद का सियासी दायित्वबोध। पर खबर है कि राहुल गांधी इस्तीफे पर अड़े हैं, और कांग्रेस के आला नेता उन्हें समझाने में जुटे हैं।

हालांकि कांग्रेस के लंबे समय तक सहयोगी रहे राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी अपने तरीके से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पद से इस्तीफा नहीं देने के लिए कहा है। उनका कहना है कि राहुल गांधी का ऐसा करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम उठाने जैसा होगा। साथ ही उनके ऐसा करने से उन सामाजिक और राजनीतिक ताकतों को भी झटका लगेगा जो ‘संघ परिवार’ के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं। लालू यादव की ओर से राहुल को इस्तीफा न देने की जो दलीलें दी गई हैं, उन्हें कांग्रेस सिरे से खारिज भी करने की स्थिति में नजर नहीं आती।

लालू यादव की दलील है कि लालू प्रसाद यादव के मुताबिक, ‘अगर राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ देते हैं तो यह भाजपा द्वारा बिछाए जाल में फंसने के समान होगा क्योंकि वो ऐसा ही चाहती है। उनने आगे कहा, ‘अगर गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनता है तो ऐसे में भाजपा के लोग उसे भी गांधी परिवार की ‘कठपुतली’ ही बताएंगे। लालू यादव का मानना है कि इस्तीफा देकर राहुल गांधी अपने आलोचकों को अपने खिलाफ बोलने का अवसर ही देंगे। वैसे इसे कांग्रेस की मजबूरी कहें या विपक्षी सियासत की कड़वी सच्चाई कि उसे फिलहाल नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व चाहिए।

तारीख गवाह रही है कि राजीव गांधी की मौत के बाद कुछ समय के लिए कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व इस परिवार के बाहर के लोगों ने किया और उसका क्या हश्र हुआ यह जनता देख चुकी है। फिर बाद में अगर 2004 और 2009 के आम चुनाव में यूपीए की सरकार सत्ता में आ सकी तो इसी परिवार के नेतृत्व की बड़ी भूमिका थी। लिहाजा, राहुल गांधी अगर हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर अपने पद से इस्तीफा देते भी हैं तो हालात बदलने की गुंजाइश कम ही दिखती है। वैसे राहुल अपने पद से इस्तीफा देते हैं या बने रहते हैं या फिर हार की जिम्मेदारी किसके सिर जाती है यह फिलहाल कांग्रेस का अंदरुनी मामला है। पर अगर अपन नतीजों की समीक्षा करें तो कांग्रेस में संगठन के स्तर पर कोई बदलाव हो या न हो, पर उसके तौर तरीकों में बदलाव की बेहद जरूरत है।

अबके चुनाव में भाजपा का मत फीसद जहां 37 के पार पहुंच गया, जबकि कांग्रेस का मत तकरीबन 20 फीसद के आसपास है। भाजपा 17 सूबों में 50 फीसद से अधिक मत पाने में सफल रही। कांग्रेस केवल पंजाब और केरल में बेहतर प्रदर्शन कर पाई है। यानी कहने की दरकार नहीं कि कांग्रेस का जनाधार अगर कम हुआ है तो वजह साफ है कि एक पार्टी के तौर पर वह जनता से कट चुकी है। उसकी पहुंच केवल कुछ सम्भ्रांत तबकों तक ही सिमट कर रह गई है। कायदे से देखा जाए तो कांग्रेस अबके चुनाव में जो मेनिफेस्टो लेकर आई थी, उसे एक बेहतर दस्तावेज कहा जा सकता है, पर राहुल गांधी या कह लें पार्टी अपनी नीतियों, विचारों और योजनाओं को आम जनता तक पहुंचा पाने में विफल रही।

कांग्रेस जनता में वह भरोसा पैदा न कर सकी, जिससे जनता उसे अपना पार्टी मान सके। आज कांग्रेस की मुश्किल यह है उसके पास ठेठ जमीनी नेताओं की कमी है। अगर राजस्थान में अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में भूपेश बधेल को छोड़ दें, तो कांग्रेस में शायद ही किसी नेता को जमीनी माना जा सकता है। फिलहाल तो कांग्रेस में ऐसे तमाम नेताओं की भरमार है जो खुद को सम्भ्रांत दिखना और कहलाना पसंद करते हैं, जिन्हें अंग्रेजी जीवन शैली जीना कहीं अधिक पसंद है। जो बेशक बोलते हिंदी हो, पर सोचते अंग्रेजी में हैं। और जब कभी हिंदी बोलते हैं तो अर्थ का अनर्थ कर डालते हैं।

और उनके किए का राहुल गांधी को माफी मांगनी पड़ रही है। बेशक, कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के बगैर नहीं चल सकती, पर यह भी हकीकत है कि आज कांग्रेस केवल राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के भरोसे भी नहीं चल सकती। अगर देखा जाए तो इस बार चुनाव में राहुल और प्रियंका ने मेहनत कम नहीं की, पर अगर जमीन से ही कांग्रेस का रिश्ता कमजोर पड़ चुका हो, तो यह मेहनत क्यों और कहां काम आती। अगर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यह दावा करते हैं कि भाजपा अगले 50 साल तक सत्ता में रहेगी, तो बेशक लोकतंत्र के लिहाज से मुफीद न लगे, पर कांग्रेस को यह भी सोचने की दरकार है कि आखिर वे यह दावा किस आधार पर कर पा रहे हैं। लिहाजा, संकट की इस घड़ी में इस्तीफा कोई विकल्प नहीं हो सकता।
 

यह भी पढ़ें:

बेअसर दिखती ताकत

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से एहसास कराए जाने के बाद अपनी ताकत और क्षमता का प्रदर्शन करते हुए आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर सख्ती दिखा दी है।

18/04/2019

हकीकत को नकारता एक अभिभाषण

यह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला सत्र है लिहाजा राष्ट्रपति का अभिभाषण बेहद अहम होना था। और राष्टÑपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए इसे अहम बनाने की कोशिश की भी।

21/06/2019

पवन वर्मा के पत्र का सबब

जदयू के राज्यसभा सांसद पवन वर्मा ने पार्टी अध्यक्ष नीतीश कुमार को पत्र लिखकर दिल्ली में भाजपा के साथ पार्टी के गठबंधन पर नाराजगी जताई है।

23/01/2020

शपथग्रहण का संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुरुवार को शपथ ले रहे थे, तो 2014 की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरे और मजबूत दिख रहे थे। मुमकिन है

31/05/2019

इस फराखदिली का सबब क्या

दिल्ली में हमारे मुल्क के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और तमाम खबरिया चैनल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में जुटे थे।

26/02/2020

इसी जमीं में पुरखों को बो दिया हमने, मगर...

सांसद बनने के पंद्रह साल बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नागरिकता पर सवाल उठे हैं। सवाल मोदी सरकार की ओर से उठाया गया है

01/05/2019

नरेन्द्र मोदी और भरोसे का नया दायरा

चुनाव प्रचार के दौरान सभी पार्टियों की जुबानी स्तरहीनता के बाद जब नरेन्द्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में राजग की बैठक में जो उद्गार व्यक्त किए वह कई मायनों में हैरान तो कर रहे थे पर सियासी माहौल के लिहाज से सुखद थे।

28/05/2019