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इंडिया गेट

सवाल लोकतंत्र में भरोसे का है

Wednesday, May 08, 2019 09:25 AM

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में एक कार्टून छपा है। कार्टून का कैप्शन है, ‘नाइट वॉचमैन’। तस्वीर क्रिकेट पिच की है। जिस पर अम्पायर की वेशभूषा में एक व्यक्ति बैटिंग करने की मुद्रा में खड़ा है। कार्टून का मजमून एकबारगी समझ में नहीं आता। लेकिन ध्यान से देखने पर अम्पायर की वेशभूषा में बैटिंग कर रहे शख्स की शक्ल मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से मिलती है। तस्वीर साफ है कि जब अम्पायर ही ‘नाइट वॉचमैन’ के तौर पर बैटिंग करने को आमादा हो जाए तो खेल का अंजाम क्या होगा? बेशक, संसदीय लोकतंत्र में मुल्क के संविधान चुनाव आयोग की भूमिका रेफरी या अम्पायर के तौर पर तय की है। पर हकीकत में लोकतंत्र केवल क्रिकेट सरीखा का कोई खेलभर नहीं है।

लोकतंत्र में जीत और हार से एक समूचे मुल्क का भविष्य बावस्ता है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने के लिए संविधान की ओर से एक प्रक्रिया बनाई गई है। चुनाव इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। चुनाव महज एक प्रक्रिया भर नहीं है। यह संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक मुकम्मल भरोसा भी है। और इस भरोसे के लिहाज से चुनाव आयोग की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। मुल्क का संविधान और मुल्क की जनता चुनाव आयोग से निष्पक्षता और बेहद ईमानदार रवैये की उम्मीद रखती है। पर जब चुनाव आयोग के रवैये पर ही सवाल उठने लगें तो असल में यह सवाल संविधान और लोकतंत्र के भरोसे पर भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 50 फीसद वीवीपैट की गिनती से जुड़ी विपक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक विधानसभा क्षेत्र के पांच फीसद वीवीपैट की गिनती का निर्देश दिया था। जिस पर मुल्क के 21 सियासी दलों ने सुप्रीम कोर्ट एक पुनर्समीक्षा याचिका दायर कर 50 फीसद वीवीपैट की गिनती की मांग की थी। पर सुप्रीम कोर्ट ने विपक्षी दलों की इस याचिका को सुनना मुनासिब नहीं समझा। किसी याचिका पर सुनवाई करना या न करना सुप्रीम कोर्ट का अख्तियार है। यह अख्तियार उसे मुल्क का संविधान देता है। संविधान, जो मुल्क में कानून का शासन स्थापित करने के लिए बनाया गया है।

संविधान की प्रस्तावना में साफ लिखा है कि हम भारत के लोग इसे खुद ही अंगीकृत करते हैं। यानी संविधान यदि सर्वोपरि है तो यह ताकत उसे मुल्क की जनता ने ही बक्शी है। ऐसे में यदि मुल्क की संवैधानिक संस्थाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़े किसी सवाल को किसी भी वजह से नकारती हैं या खारिज करती हैं तो यह लोकतंत्र के लिए संकेत अच्छे नहीं हैं। यह हकीकत है कि मुल्क में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए संसद की ओर से कानून पारित कर ईवीएम की व्यवस्था की गई।

पर यह भी हकीकत है कि चुनाव में ईवीएम व्यवस्था लागू करने के कुछ वर्षों के बाद ही यह संदेह से परे नहीं रही। चाहे विपक्ष में कोई भी हो, वह ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत को लेकर चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाता रहा है। सत्ताधारी पार्टी जब विपक्ष में रही तो दर्जनों ऐसे मौके आए जब पार्टी के नेताओं ने ईवीएम पर संदेह जाहिर किया। आज भाजपा सत्ता में है तो कांग्रेस और तमाम विपक्षी पार्टियां ईवीएम को लेकर पहले चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा चुकी हैं और बाद में सुप्रीम कोर्ट का। यानी आलम यह है कि विपक्ष में जो भी रहे वह मानता है कि ईवीएम में गड़बड़ी मुमकीन है। असल में, ईवीएम को लेकर संदेह का यह आलम इस मुल्क में ही नहीं है।

अलबत्ता, दुनियाभर के तमाम मुल्क चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से ईवीएम को भरोसेमंद नहीं मानते। यही वजह है कि दुनिया के अधिकतर विकसित देशों में तमाम तकनीकी विकास के बाद भी चुनाव बैलेट के जरिए ही कराए जाते हैं। क्योंकि ईवीएम को लेकर बुनियादी समझ यह है कि सिस्टम चाहे कितना भी फुलप्रुफ क्यों न हो, संदेह से परे नहीं है। भारत में ईवीएम से जुड़े यंत्रों का आयात जापान से होता है। पर कमाल देखिये कि उसी जापान में चुनाव बैलेट से कराए जाते हैं। साफ है कि सवाल भरोसे का है। जहां तक वीवीपैट की गिनती का सवाल है

तो चुनाव आयोग की ओर से गिनती की लंबी प्रक्रिया और दिनों की दुहाई दी जाती रही है। पिछले दिनों चुनाव आयोग के हवाले से खबर थी कि यदि विपक्षी दलों की मांग के मुताबिक 50 फीसदी वीवीपैट की गिनती की गई तो छह दिन लगेंगे। मुमकीन है यह दलील सही भी हो। पर सोचने की दरकार है कि क्या मतों की गिनती की प्रक्रिया को लेकर तीन दिन, पांच दिन, छह दिन या दस दिन अहम हैं या लोकतंत्र में आम आदमी का भरोसा? इस भरोसे को कायम रखने की जिम्मेदारी संविधान ने चुनाव आयोग को सौंपी है।

पर जब चुनाव आयोग ही अम्पायरी छोड़कर खेल का हिस्सा बनने लगे तो लोकतंत्र में आम आदमी के भरोसे का डिगना लाजमी है। आप किसी चाय या पान की दुकान पर आज खड़े हो जाएं। ईवीएम में गड़बड़ी को लेकर बहस करते लोग मिल जाएंगे। यह तमाम बहसें अपने आप में ईवीएम से जुड़े संदेह का खुला इश्तेहार है। मुल्क की संवैधानिक संस्थाएं इस इश्तेहार को जितनी जल्दी पढ़ लें। लोकतंत्र के लिए उतना ही बेहतर होगा।

- शिवेश गर्ग

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