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पीएम का भाषण और संसद की मर्यादा-1

Friday, February 12, 2021 10:40 AM
पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

ऐसा लगता है जैसे लोकसभा और राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब देने से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नाजी जर्मनी का इतिहास और खासतौर से रुडोल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘मीन काम्फ’ पढ़कर आए थे। उनने अपने दोनों भाषणों में जो ‘आंदोलनजीवी’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों का जुमला छोड़ा है, मुमकिन है उसकी प्रेरणा उन्हें वहीं से मिली हो। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद ये दोनों शब्द बेहद चर्चा में है। सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन शब्दों का इस्तेमाल जुमला फेंकने की अपनी जानी पहचानी शैली की वजह से किया है या किसी सोची समझी रणनीति की वजह से? नाजी जर्मनी के इतिहास में ‘परजीवी’ बेहद खतरनाक शब्द बना था। तकरीबन सौ साल पहले हिटलर ने ‘परजीवी’ शब्द को हर जुबान पर चढ़ने वाला जुमला बना दिया था। जर्मन भाषा में ‘परजीवी’ का अर्थ होता है, नौक्सियस बैसिलस।

हिटलर ने पहली बार 13 अगस्त, 1920 को अपने समर्थकों के बीच भाषण देते समय यहूदियों को ‘परजीवी’ कहा था। उसकी आत्मकथा ‘मीन काम्फ’ में परजीवी शब्द का उल्लेख विस्तार से किया गया है। नेशनल सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रम वाले अध्याय में तो इसको जड़ से मिटाने के लिए तमाम काम बताए गए हैं। वह कहता है कि ऐसा परजीवी, व्यक्ति और समाज को खत्म कर देगा। नाजियों के अखबार डेर स्टरमर में 1927 में लिखा है कि यहूदी दुनिया के सबसे बड़े ‘परजीवी’ हैं। ये जीने योग्य नहीं हैं। हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबेल्स ने 6 अप्रैल, 1933 को अपने भाषण में ऐसी ही बातें कहीं, ‘यहूदियों का चरित्र पूरी तरह परजीवियों की तरह होता है। लगातार ‘परजीवियों’ को खतरा बताने के कारण जर्मनी में इनके खिलाफ नफरत का माहौल बन गया। फिर जो तबाही का मंजर सामने आया, उसे भुलाना नामुमकिन है। नाजी जर्मनी में यहूदियों पर जिस तरह के अत्याचार हुए, वह पूरी दुनिया के मानवता के लिए एक कलंक है। जो कलंक जर्मनी के माथे पर आज भी एक बदनुमा दाग की तरह चस्पा है।

बहरहाल, मुल्क के प्रधानमंत्री ने किसान आंदोलन में शामिल लोगों के लिए ऐसे ही शब्द का इस्तेमाल संसद में किया गया है। राज्यसभा में ‘आंदोलनजीवी’ और ‘परजीवी’ शब्द कहकर उन्होंने किसान आंदोलन में शामिल लोगों की खिल्ली उड़ाई थी। जबकि लोकसभा में ये वह बता रहे थे कि लोकतंत्र हमारी सांसों, हमारी रगों में बसा हुआ है। अगर हकीकत में ऐसा है तो फिर मोदी सरकार में सवाल पूछने वालों पर कार्रवाईयां क्यों हो रही हैं? क्यों आवाज उठाने वालों पर कानून का बेजा इस्तेमाल हो रहा है? क्यों दुनिया भर के लोकतांत्रिक मुल्कों में हमारी साख गिरती जा रही है? ताजा मामला ऑनलाइन समाचार पोर्टल न्यूजक्लिक का है। प्रवर्तन निदेशालय ने पोर्टल के कार्यालय और उसके मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के घर पर 30 घंटे से अधिक समय तक छापेमारी जारी रही। इस पोर्टल का गुनाह यही है कि यह गरीबों और कमजोर तबकों के विरोध और आंदोलन को आवाज देने के लिए काम करता रहा है। यह पोर्टल किसान आंदोलन को गहराई से कवर करता रहा है। विभिन्न सरकारी नीतियों और कुछ शक्तिशाली कॉरपोरेट घरानों की अपनी रिपोर्टों में आलोचना करता है।

इतना ही नहीं पिछले एक साल में, पत्रकारों पर साम्प्रदायिक विद्वेष और राजद्रोह के झूठे आरोप में उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज की गई है। कहने की दरकार नहीं कि मोदी सरकार विरोध का सुर सुनना नहीं चाहती और जनता अगर अपनी मांग को लेकर आंदोलन करने लगे, तो या तो उनकी सरकार उसे अपराधी साबित करने में जुट जाती है या फिर उन्हें बदनाम करने में। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सदन में आंदोलकारियों को ‘आंदोलनजीवी’ नाम दे रहे हैं, उन्हें ‘परजीवी’ बता रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार घुसपैठियों के लिए दीमक शब्द का इस्तेमाल किया था। अब प्रधानमंत्री विरोधियों को ‘परजीवी’ कह रहे हैं। क्या इसे किसी सरकार का लोकतांत्रिक रवैया कहा जा सकता है? प्रधानमंत्री संसद में खड़े होकर जो कह रहे हैं और दूसरी ओर उनकी सरकार जो कर रही है, उसमें जमीन आसमान का फर्क है।

बंगाल में चुनाव होने वाला है। लिहाजा, उन्होंने विवेकानंद का नाम लेना जरूरी समझा। उनने विवेकानंद के हवाले से कहा कि हर राष्ट्र के पास एक संदेश होता है, जो उसे पहुंचाना होता है, हर राष्ट्र का एक मिशन होता है, जो उसे हासिल करना होता है, हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे वह प्राप्त करता है। पता नहीं मोदीजी भारत से कौन सा संदेश दुनिया को देना चाहते हैं या भारत को किस नियति तक पहुंचाना चाहते हैं। क्योंकि वे जो कह रहे हैं और जो कर रहे हैं। उसमें जमीन-आसमान का अंतर दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री बेशक, यह कह रहे हों कि लोकतंत्र उनकी रगों में बसा है। मगर कृषि कानूनों के खिलाफ सत्याग्रह कर रहे किसानों और उनके समर्थकों को प्रधानमंत्री ने जिस तरह ‘आन्दोलनजीवी’ और ‘परजीवी’ बताया है। यह कहीं से भी लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। असहमति और संवाद लोकतंत्र की जरुरी शर्त है। मगर विरोधियों की खिल्ली उड़ाकर इस शर्त को हासिल नहीं किया जा सकता। जो पहले राज्यसभा और बाद में लोकसभा के भाषणों में वे लगातार करते रहे। ....जारी।
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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