Dainik Navajyoti Logo
Sunday 16th of May 2021
 
इंडिया गेट

पवन वर्मा के पत्र का सबब

Thursday, January 23, 2020 10:25 AM
पवन वर्मा (फाइल फोटो)

जदयू के राज्यसभा सांसद पवन वर्मा ने पार्टी अध्यक्ष नीतीश कुमार को पत्र लिखकर दिल्ली में भाजपा के साथ पार्टी के गठबंधन पर नाराजगी जताई है। पवन वर्मा ने अपने पत्र में नीतीश कुमार को भाजपा को लेकर उनकी निजी आशंकाओं की भी याद दिलाई। वह लिखते हैं कि अकेले में आपकी (नीतीश कुमार) स्वीकारोक्ति को याद कर रहा हूं कि भाजपा में वर्तमान नेतृत्व ने किस तरह से आपका अपमान किया। आपने कई बार कहा कि भाजपा देश को खतरनाक स्थिति में ले जा रही है।’ सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस पत्र में पवन वर्मा ने कहा कि आपने जैसा मुझे बताया, ये आपके निजी विचार थे कि  भाजपा संस्थानों को नष्ट कर रही है और देश के अंदर लोकतांत्रिक एवं सामाजिक ताकतों को पुनर्गठित करने की जरूरत है। इस कार्य के लिए आपने पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी को नियुक्त किया। वर्मा ने बिहार के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि एक से अधिक अवसरों पर आपने भाजपा-आरएसएस गठबंधन को लेकर आशंकाएं हैं। पवन वर्मा ने पत्र में आगे कहा कि अगर ये आपके वास्तविक विचार हैं तो मैं समझ नहीं पाया कि जदयू कैसे बिहार के बाहर भाजपा से गठबंधन कर रहा है, जबकि अकाली दल जैसे भाजपा के पुराने सहयोगियों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। खासकर ऐसे समय में जब भाजपा ने सीएए-एनपीआर-एनआरसी के माध्यम से बड़े पैमाने पर सामाजिक विभाजनकारी एजेंडा चला रखा है। पवन वर्मा ने कहा कि जदयू को अपने गठबंधन का दायरा विस्तारित करने और दिल्ली चुनावों के लिए भाजपा से हाथ मिलाने से वह काफी बेचैन है।

वह चाहते हैं कि नीतीश कुमार विचारधारा को स्पष्ट करें। जदयू ने पवन वर्मा के दावों पर प्रतिक्रिया नहीं दी। सवाल है कि पवन वर्मा की नीतीश कुमार के नाम इस खत-ओ-किताबत के क्या मायने हैं। पत्र की भाषा से तो साफ है कि जदयू के इस पूर्व सांसद का इस पार्टी से मन भर गया है। या फिर नीतीश कुमार की सदारत में अब उनकी वह आस्था नहीं रही, जो बतौर सांसद अबतक कायम थी या फिर पवन कुमार वर्मा वही लिख रहे हैं जो नीतीश कुमार उन्हें लिखने के लिए कह रहे हैं। पवन वर्मा से पहले सीएए के सवाल पर जदयू नेता प्रशांत किशोर भी विरोध कर चुके हैं। इतना ही नहीं प्रशांत किशोर जदयू के उपाध्यक्ष हैं और दिल्ली के चुनाव में वे आम आदमी पार्टी की रणनीति तय कर रहे हैं। उसी दिल्ली में जहां उनकी पार्टी जदयू ने भाजपा के साथ गठबंधन किया है। दिल्ली में भाजपा ने नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को दो सीट और रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को एक सीट देने का फैसला किया है। अब सवाल है कि प्रशांत किशोर कौन सी सियासत कर रहे हैं। दिल्ली में उनकी पार्टी का विपक्षी भाजपा के साथ गठबंधन है और वे खुद सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। अब कोई नादान ही कह सकता है कि उनके इस गोरखधंधे में नीतीश की सहमति नहीं है। बहरहाल, फिलहाल मुद्दा तो यह है कि क्या पवन कुमार वर्मा भी कुछ ऐसी ही सियासत को अंजाम देने में जुटे हैं। यह बात और है कि उनकी स्थिति प्रशांत किशोर से अलहदा है। वे पूराने कूटनीतिज्ञ रहे हैं। साहित्य में भी उनकी विशेष दिलचस्पी है। वे आए दिन देश-दुनिया में भाषणों के लिए बुलाए जाते रहे हैं। सो, मुमकिन है कि नीतीश के नाम ताजा खत-ओ-किताबत के जरिए वे अपनी उदार और सेकुलर पहचान बनाए रखने की कवायद कर रहे हों, जिससे कि देश-दुनिया में उनकी पूछ बनी रहे, जहां तक अपन नीतीश कुमार की सियासत को जान पाए हैं और पवन वर्मा ने जिस कदर उन्हें भाजपा के मौजूदा नेतृत्व के हाथों मिले अपमान की याद दिलाई है, मामला केवल एक साहित्य अनुरागी कूटनीतिज्ञ की छवि सुधार भर की नहीं है। कहने का अर्थ है कि पवन वर्मा, नीतिश के नाम लिखे अपने खत में वही लिख रहे हैं जो उनसे लिखने के लिए कहा गया है। सवाल है कि इसका मकसद क्या है? तो मकसद खालिस सियासी है। असल में, तमाम सूबों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली हार ने उसे बैकफुट पर ला खड़ा किया है। लोकसभा के नतीजों के बाद जहां बिहार में भाजपा के नेता नीतीश कुमार को अब और बर्दाश्त कर पाने की हालत में नहीं थे।

विधानसभाओं के चुनावी नतीजों ने नीतीश कुमार को वे तमाम सुविधाएं दे डाली हैं, जिसकी वे ताक में थे। बिहार में खासतौर से विधानसभा के चुनावों में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार हमेशा बड़े साझीदार रहे हैं। पर अब भाजपा का दावा बराबरी का है। और नीतीश कुमार भाजपा को यह दर्जा कतई नहीं देना चाहते। लिहाजा, कभी वे प्रशांत किशोर के जरिए, तो कभी पवन वर्मा के जरिए सीएए पर सवाल उठा कर भाजपा को बैकफुट पर रहने को मजबूर कर रहे हैं। और वे अपनी इस मकसद में काफी हद तक सफल भी हैं क्योंकि अभी चंद रोज पहले ही गृहमंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि बिहार में भाजपा नीतीश कुमार की अगुवाई में ही अगला विधानसभा चुनाव लड़ेगी। पर नीतीश कुमार के लिए इतना ही काफी नहीं है। उन्हें चाहत इससे अधिक की है।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

यह भी पढ़ें:

विरोध का संवैधानिक दायरा

सीएए के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों के बीच केरल विधानसभा ने इसे वापस लेने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। एक दिन के विशेष सत्र में सत्तारूढ़ माकपा नीत एलडीएफ और विपक्षी कांग्रेस नीत यूडीएफ ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि भाजपा के एकमात्र विधायक ओ. राजगोपाल ने असहमति जताई।

03/01/2020

बजट की हड़प्पन भाषा

टाइम्स आॅफ इंडिया में ताजा बजट को लेकर एक कार्टून छपा है कि जिसका मजमून है कि इस बार के बजट का प्रीफेस हड़प्पन लिपी में लिखा है, यह समझ से परे हैं।

04/02/2020

प्रचंड होती दिव्यता

यों तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दिव्य बौद्धिकी से मुल्क अक्सर रुबरु होता रहा है। जब मुल्क में कोई चुनाव चल रहा हो तब भी और जब चुनाव नहीं हो तब भी।

15/05/2019

एक कूटनीतिक उपलब्धि

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने बुधवार को आखिरकार मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कर ही दिया। वह अब तक चीन की आपत्ति की वजह से बचा हुआ था।

04/05/2019

तो ऐतिहासिक रहा अबके गणतंत्र दिवस

तो दिल्ली की सरहदों पर पिछले 2 महीने से चल रहे किसान आंदोलन के लिए 72वां गणतंत्र दिवस ऐतिहासिक साबित हुआ है। किसानों ने पूरी दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकाली, पुलिस बैरिकेड तोड़े, लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर किसानी का झंडा फहराया।

28/01/2021

आर्थिक मंदी और मनमोहन की नसीहत

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मुल्क की बिगड़ती अर्थव्यवस्था पर चिंता जताना तो बनता है। आखिर उनसे बेहतर अर्थव्यवस्था और उससे जुड़े तंत्र को कौन समझ सकता है।

04/09/2019

हकीकत को नकारता एक अभिभाषण

यह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला सत्र है लिहाजा राष्ट्रपति का अभिभाषण बेहद अहम होना था। और राष्टÑपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए इसे अहम बनाने की कोशिश की भी।

21/06/2019