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अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर

Tuesday, December 03, 2019 12:05 PM
निर्मला सीतारमण (फाइल फोटो)

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का मानना है कि मुल्क की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में नहीं है, यह जरूर है कि इसकी रफ्तार धीमी हुई है, लेकिन राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) की ओर ओर से जो आर्थिक विकास के आंकड़े आए हैं वह उन्हें गलत साबित करते हैं। एनएसओ ने वित्तीय वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही अर्थात जुलाई-सितंबर के लिए 4.5 फीसद विकास दर का ऐलान किया है। यानी नवंबर 2016 में नोटबंदी के फैसले के बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से कही बात सही साबित हुई। उनने तब कहा था सरकार के नोटबंदी के फैसले से अर्थव्यवस्था में 2 से 3 फीसद की गिरावट आ सकती है। और अब यह हुआ भी। जब नोटबंदी लागू हुई तब अर्थव्यवस्था की रफ्तार तकरीबन साढ़े सात फीसद थी। तीन साल के बाद जिसमें साफ तौर पर तीन फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। पर यह मुल्क की अर्थव्यवस्था की हकीकत की सही तस्वीर नहीं है। एनएसओ की ओर से विकास का यह जो आंकड़ा आया है वह संगठित क्षेत्र का है। जबकि असली तबाही तो मुल्क के असंगठित क्षेत्र में है, जो नोटबंदी और जीएसटी जेसे फैसलों की वजह से तकरीबन तबाह हो चुका है। अगर अर्थव्यवस्था के ताजा आए आंकड़ों की ही चर्चा करें तो भी विकास की यह दर भरोसे के काबिल नजर नहीं आ रही। क्योंकि यह आंकड़ा साल के पहले छह महीने का है और सरकार का वित्तीय घाटा पूरे साल के लक्ष्य से भी 2 फीसद अधिक हो चुका है, जबकि बाकी के महीने अभी बाकी हैं। आंकड़ों के मुताबिक कर वसूली निर्धारित लक्ष्य से तकरीबन 2 लाख करोड़ रुपए कम है।

बिजली, कोयला, सीमेंट, इस्पात, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, तेल शोधन जैसे 8 मूलभूत उद्योगों के उत्पादन में सितंबर में 5.1 फीसद कमी के बाद अक्टूबर में भी 5.8 फीसद की गिरावट है। अर्थव्यवस्था की तबाही की असली गवाही तो ऊर्जा क्षेत्र दे रहा है। बिजली की खपत में भारी गिरावट है। खबर है कि बिजली की मांग में आई गिरावट की वजह से कई ताप विद्युत संयत्रों में उत्पादन बंद करना पड़ा है। यह सूरते हाल पूरी अर्थव्यवस्था की गति मंद पड़ने का लक्षण है। इसके अलावा रेल व वायु दोनों के जरिए माल ढुलाई घटी है, यहां तक कि यात्रियों की संख्या भी नहीं बढ़ रही है। निर्माण क्षेत्र में भारी गिरावट है, क्योंकि 8 लाख से अधिक निर्मित घर बिना बिके खाली पड़े हैं। कारों सहित सभी वाहनों एवं ट्रैक्टरों की बिक्री पिछले एक वर्ष से लगातार गिर रही है। खुद सरकारी सर्वेक्षण बता रहे हैं कि कम होती आय के कारण आम लोग भोजन- दाल, नमक, चीनी, चाय, जैसी जरूरी चीजों के उपभोग में भी कटौती करने पर मजबूर हो रहे हैं। वित्तीय क्षेत्र में बैंकों के बाद अब गैर बैंक वित्तीय कंपनियों का संकट भी गहराता जा रहा है। कई बड़ी कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं और कई होने की कगार पर हैं। और इस गिरावट का सीधा असर बेरोजगारी के आंकड़ों पर दिख रहा है। आज बेरोजगारी की दर 8.5 फीसद के ऐतिहासिक ऊंचे स्तर पर है। युवाओं यानी कि 15-29 साल के आयु वर्ग में तो यह लगभग 30 फीसद पहुंच चुकी है। किन्तु यह आंकड़ा भी आंशिक सच को ही जाहिर करता है क्योंकि बेरोजगारी दर की गणना सिर्फ उनमें से की जाती है जो श्रम बल का अंग हैं अर्थात या तो कहीं रोजगार में हैं या फिर रोजगार की तलाश में हैं। उनकी तो कोई गिनती ही नहीं है जिसमें खासतौर से महिलाएं और पढ़े लिखे युवा शामिल हैं। ये सभी श्रम बल के दायरे से ही आज बाहर हैं। असल में श्रम बल रोजगार करने वालों का एक दायरा है जिसमें काम करने लायक 15-60 वर्ष तक में लोग शामिल हैं।

आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 तक काम करने लायक आयु वर्ग में से तकरीबन 48 फीसद लोग शामिल थे। किन्तु ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह करीब 41 फीसद है। यानी साफ है कि काम करने लायक करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें काम नहीं मिल पा रहा है और बेरोजगारी के इस आलम में कई करोड़ की तादाद में काम करने लायक लोग श्रम बल से ही बाहर हो गए हैं। दुनिया भर के विकासशील मुल्कों में यह आंकड़ा 50 फीसद से उपर है। यानी भारत की अर्थव्यवस्था आज विकासशील मुल्कों से भी पिछड़ रही है। बताया जाता है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्कों में रोजगार की हालत भारत से बेहतर हैं। चीन में तो तकरीबन 75 फीसद है। ऐसे में अर्थव्यवस्था के इस खस्ता हालत के मद्देनजर यह भरोसा कर पाना मुश्किल हो रहा है कि आने वाले दिनों में यह साढ़े चार फीसद का विकास भी हासिल कर पाएगी। मुल्क में करीब 93 फीसद लोग असंगठित क्षेत्र में रोजगार पाते हैं। केवल सात फीसद लोग की संगठित क्षेत्र में रोजगार मिलता है और जब संगठित क्षेत्र की हालत ही दयनीय है तो उस असंगठित क्षेत्र की बात भला कौन करें, जो अर्थव्यवस्था के मानकों के दायरे से ही बाहर है। अगर आज असंगठित क्षेत्र मची तबाही को इस विकास दर में जोड़ लिया जाए, तो यकीनन मुल्क की विकास दर नकारात्मक है। पर इस हकीकत को हमारी सरकार नहीं स्वीकार करना चाहती।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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