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एक राजनेता का गैर-राजनीतिक साक्षात्कार

Friday, April 26, 2019 10:05 AM

जब बीच चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बने बॉयोपिक पर रोक लगा दी गई, तो उनने प्रचार का एक नया तरीका इजाद कर लिया। नरेन्द्र मोदी ने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को एक लंबा साक्षात्कार दिया, जिसे न्यूज एजेंसी एएनआई के जरिए तमाम खबरिया चैनलों पर जारी किया गया। फिल्मी कैमरे से सूट हुए तकरीबन एक घंटे से भी अधिक के इस साक्षात्कार को मुल्क के अधिकांश चैनलों पर बुधवार के सबेरे प्रसारित किया गया। बीच चुनाव में मुल्क भर में प्रसारित इस चुनाव पर तमाम सवाल उठ रहे हैं, जो लाजमी भी हैं।

भाजपा और भक्तजनों की ओर से दलील दी जा रही है कि साक्षात्कार गैर राजनीतिक है। सोचने वाली बात है कि जब मुल्क का माहौल खालिस सियासी हो, ऐसे में मुल्क के प्रधानमंत्री का साक्षात्कार आखिर गैर-राजनीतिक कैसे हो सकता है? बेशक, यह साक्षात्कार किसी फिल्मी अभिनेता ने लिया हो। क्या अक्षय कुमार मुल्क के किसी आम आदमी का साक्षात्कार ले रहे थे। वे जिस शख्स का साक्षात्कार ले रहे थे

, क्या उस आदमी का नाम नरेन्द्र दामोदार दास मोदी नहीं है, जो इस मुल्क के प्रधानमंत्री हैं? अक्षय कुमार प्रधानमंत्री से ऐसे सवाल पूछ रहे थे, जैसा टीवी पर दिखने वाले कॉमेडी शो में पूछे और सुने जाते हैं। मसलन, अक्षय कुमार को प्रधानमंत्री माफ करें। नरेन्द्र मोदी ने बताया कि वे बचपन में फौजियों को देखकर उन्हें सेल्यूट करते थे। बड़े लोगों की जीवनी पढ़ते थे, कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाती तो मां पूरे गांव को गुड़ खिला देती।

कभी प्रधानमंत्री बनने के बारे में सोचा नहीं था। यानी वे भी इत्ताफकन यानी एक्सीडेंटली ही मुल्क के प्राइम मिनिस्टर बन गए। तब भला मनमोहन सिंह ने किसी का क्या बिगाड़ा था? जो उन्हें एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर की फिल्म बना कर बदनाम किया गया। बहरहाल, नरेन्द्र मोदी के इस जवाब में अपनी दिलचस्पी इतनी है कि वे किन महान लोगों की जीवनियां पढ़ा करते थे। क्या उनमें गांधी और नेहरू जैसे महान लोग शामिल थे या नहीं? बेहतर होता अक्षय कुमार यह सवाल पूछने की जहमत उठा पाते। साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने अपने मित्र बराक का भी जिक्र किया कि उनके कम सोने से बराक को चिंता होती है। अब किसी दोस्त की ओर से इतनी चिंता तो लाजमी है।

पर जब कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद के साथ वे अपनी दोस्ती की कहानी अक्षय कुमार को बता रहे थे, तो मुल्क के सामने एक बड़ा विरोधाभास खड़ा था। जब नरेन्द्र मोदी 2014 में लोकसभा चुनाव में संसदीय दल के नेता चुने गए और प्रधानमंत्री बनकर पहली बार संसद भवन पहुंचे तो उनने संसद भवन के गेट पर माथा टेका था। तब उनने भावुकता भरे गीली आंखों से साथ दुनिया को बताया था कि लोकतंत्र के इस मंदिर में उनका पहला कदम है। पर अक्षय कुमार को तो वे एक दूसरी ही कहानी बयां कर रहे थे। विपक्षी पार्टी के किसी नेता से उनकी दोस्ती के सवाल पर नरेन्द्र मोदी यह बताते सुने गए, बहुत पहले की बात है तब मैं मुख्यमंत्री भी नहीं था...शायद किसी काम से मैं पार्लियामेंट गया था।

गुमाम नबी आजाद और मैं बड़े दोस्ताना अंदाज में गप्पे मार रहे थे और हम बाहर निकल रहे थे तो मीडिया वालों ने पूछा कि भाई तुम तो आरएसएस के हो, फिर गुमाल नबी से तुम्हारी दोस्ती कैसे है? फिर गुलाम नबी ने अ छा जवाब दिया, बहुत अ छा जवाब दिया। हम दोनों खड़े थे। उनने कहा कि बाहर जो आप लोग सोचते हो ऐसा नहीं.... शायद एक फैमिली के रुप में हम जुड़े हुए हैं...सभी दलों के लोग, शायद आप बाहर कल्पना नहीं कर सकते। अब सवाल है कि नरेन्द्र मोदी की किस बात को सही माना जाए? उसे, जो वे संसद में सिर नवाते हुए पांच साल पहले बोल रहे थे

या फिर इस बात को जो उनने एक गैर-राजनीतिक साक्षात्कार में अक्षय कुमार को बतायी है। आज मुनासिब था कि मुल्क के प्रधानमंत्री इन हल्की फुल्की विरोधाभासी बातों से भरे एक गैर-राजनीतिक साक्षात्कार के बजाए ठेठ राजनीतिक साक्षात्कार देते और मुल्क को बताते कि संकट में फंसी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए उनके पास कौन सी नीति है। बेरोजगारी, महंगाई सब अभी तक के उ चतम स्तर पर है। प्रेस की स्वतंत्रता और उसकी प्रतिष्ठा दोनों में भारी गिरावट आई है। महिलाओं के लिए देश में माहौल दिन-ब-दिन खराब होता जा रहा है।

अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी इन सबके सामने सम्मानपूर्वक जीवन जीने का संकट है। सीबीआई, चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक जैसी संस्थाओं की साख धूमिल हुई है। न्यायपालिका पर अभूतपूर्व संकट छाया है। मुल्क के मुख्य न्यायाधीश पर एक महिला ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। खुद मुख्य न्यायाधीश किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहे हैं। आखिर यह कैसी चौकीदारी है? खुद को मुल्क का प्रधानसेवक होने का ऐलान करने वाले के लिए क्या यह सूरते हाल उसकी पेशानी पर तमाम सिलवटों का सबब पैदा नहीं करता? पर अफसोस की एक कथित गैर-राजनीतिक साक्षात्कार में यह चिंता कहीं नजर नहीं आई।
- शिवेश गर्ग

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