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इंडिया गेट

बेअसर दिखती ताकत

Thursday, April 18, 2019 15:45 PM
सुप्रीम कोर्ट

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से एहसास कराए जाने के बाद अपनी ताकत और क्षमता का प्रदर्शन करते हुए आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर सख्ती दिखा दी है। विवादित टिप्पणी करने वाले सपा नेता आजम खान, उप्र के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी, बसपा सुप्रीमो मायावती और भाजपा सांसद व प्रत्याशी मेनका गांधी पर कुछ घंटों तक प्रचार की रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के इस कदम से संतुष्ट भी हो गया है। मुख्य न्यायाधीश रंजग गोगोई ने कहा है कि वह आयोग की कार्रवाई से संतुष्ट हैं। उसने कई नेताओं के चुनाव प्रचार पर कुछ घंटों के लिए रोक लगा दी है। फिलहाल किसी नए आदेश की जरूरत नहीं है।

यानी आयोग की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट के संतुष्ट होने के बाद सबकुछ ठीक हो गया है। पर वाकई जमीन पर ऐसा है क्या? कायदे से आयोग की कार्रवाई का नेताओं की गतिविधियों पर असर होना चाहिए और उनकी जुबान पर ताले लग जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। कोर्ट की रोक के बाद कई नेता प्रचार के दूसरे हथकंडे अपनाते नजर आये। आदित्यनाथ योगी ने प्रचार पर रोक लगने के दौरान ही मंगलवार सुबह लखनऊ के हनुमान सेतू मंदिर में पूजा-पाठ किया।

यूं तो मंदिर जाकर पूजा करना प्रचार नहीं माना जाता लेकिन योगीजी का यह कदम बेहद चतुराई भरा था। उनने अली के मुकाबले बजरंग बली के सहारे का बयान देकर धार्मिक भावनाओं को भड़काया था। और इसलिए उनके बजरंग बली के मंदिर जाने के निहितार्थ समझना कठिन नहीं है।

उनके मंदिर जाने को जो मीडिया कवरेज मिला क्या वह प्रचार नहीं माना जाना चाहिए? इसी तरह मायावती ने सोमवार को चुनाव आयोग के प्रतिबंध के बाद प्रेसवार्ता कर अपनी सफाई दी कि मैंने आचार संहिता का कोई उल्लंघन नहीं किया है। मैंने अलग-अलग धर्मों के लोगों से वोट बांटने की अपील नहीं की थी। मैंने यह कहा था कि एक ही धर्म के मुस्लिम समाज के दो उम्मीदवारों में से एक उम्मीदवार के पक्ष में वोट करें। आखिर आयोग की रोक का सबब क्या रहा? जब उनने शब्दों के हेरफेर के साथ दोबारा वहीं बातें कह डाली।

वे इस मौके पर दलित कार्ड भी खेलती दिखीं। उनने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत किसी को अपनी बात रखने से वंचित नहीं किया जा सकता लेकिन आयोग ने अभूतपूर्व आदेश देकर मुझे बगैर किसी सुनवाई के असंवैधानिक तरीके से क्रूरतापूर्वक वंचित कर दिया। यह दिन काला दिवस के रूप में याद किया जाएगा। यह फैसला किसी दबाव में लिया गया ही प्रतीत होता है। इसी तरह आजम खान के बेटे अब्दुल्ला खान ने मुस्लिम कार्ड खेलते हुए कहा कि आजम खान पर मुस्लिम होने के नाते कड़ाई बरती गई है।

उनका कहना है कि चुनाव आयोग ने आजम खान पर एकतरफा कार्रवाई की है। आयोग के इस कदम का बाकी नेताओं पर भी कोई असर होता नजर नहीं आया। शिवसेना सांसद संजय राउत ने तो खुलेआम ऐलान किया कि वे न कानून को मानते हैं, न उन्हें आचार संहिता का और न ही चुनाव आयोग की कोई परवाह है। अब देखना होगा कि चुनाव आयोग उन्हें अपने अस्तित्व और शक्ति का अहसास किस तरह कराता है। इसी तरह हिमाचल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती ने राहुल गांधी, सोनिया गांधी के खिलाफ अशोभनीय टिप्पणी की। फतेहपुर सीकरी से सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार ने कांग्रेस प्रत्याशी राज बब्बर के लिए अभद्र बातें कहीं।

तो कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने भी बिहार के कटिहार में मुसलमानों को वोट न बंटने देने की नसीहत दे डाली। बेशक, सुप्रीम कोर्ट को किसी नए आदेश जारी करने की दरकार न महसूस हो रही हो, पर फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि चुनाव आयोग ने कार्रवाई तो की है, पर महज खानापूर्ति के तौर पर। किसी ने भी आयोग के कथित सख्त कार्रवाई को गंभीरता से नहीं लिया है। किसी ने कह कर तो किसी ने बिना कहे चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या वाकई चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर गंभीर है? बेशक, सुप्रीम कोर्ट की वाहवाही के बाद चुनाव आयोग को यह सवाल नागवार गुजर सकता है पर चुनाव आयोग के सामने एक सवाल मौजूं है कि क्या कथित तौर पर सख्त कार्रवाई के दायरे में मुल्क के प्रधानमंत्री भी आते हैं या नहीं? क्योंकि चुनाव आयोग के साफ निर्देश के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपनी चुनावी सभाओं में एयर स्ट्राइक, सेना के शौर्य का जिक्र कर खुद की सरकार को उसका श्रेय दे रहे हैं

और जनता से मजबूत सरकार चुनने की बात कह रहे हैं। फिर सवाल नमो टीवी का भी है। यह स्पेशल सर्विस चैनल टाटा स्काई, एयरटेल और डिश टीवी समेत कई डीटीएच प्लेटफॉर्म्स पर एक साथ लॉन्च हुई है और इसमें केवल नरेन्द्र मोदी और भाजपा का गुणगान होता है। आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद टीवी चैनलों पर अपने संदेश का प्रसारण करने के लिए किसी राजनीतिक दल द्वारा खरीदे गए 30 सेकेंड के स्लॉट के लिए भी चुनाव आयोग के प्रमाण-पत्र की जरूरत होती है।

पर नमो टीवी इसका अपवाद नजर आया है। साफ है कि बात किसी संवैधानिक संस्था की ताकत और क्षमता से नहीं बनती। अधिकार और ताकत के साथ-साथ ईमानदार इच्छा शक्ति और नैतिक बल का होना भी लाजमी है, जिसकी फिलहाल चुनाव आयोग को सख्त दरकार है।

- शिवेश गर्ग

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