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नरेन्द्र मोदी और भरोसे का नया दायरा

Tuesday, May 28, 2019 10:10 AM

- शिवेश गर्ग
चुनाव प्रचार के दौरान सभी पार्टियों की जुबानी स्तरहीनता के बाद जब नरेन्द्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में राजग की बैठक में जो उद्गार व्यक्त किए वह कई मायनों में हैरान तो कर रहे थे पर सियासी माहौल के लिहाज से सुखद थे। बैठक में उनने जो बातें कहीं, वे मुल्क की सियासत के लिहाज से बेहद अहम थीं। उनने अपनी जीत को लोकतंत्र के इतिहास की सबसे बड़ी घटना बताया और कहा कि वो बदनीयत और बदइरादे से कोई काम नहीं करेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र का संस्कार और उसका स्परिट हमें जिम्मेदारी देती है कि सरकार भले ही बहुमत से बनती हो लेकिन मुल्क  सर्वमत से बनता है। सवाल है कि क्या सियासत में संस्कार और स्पिरिट सत्ता मिलने के बाद ही याद रखना चाहिए या फिर यह तब भी कायम रहना चाहिए, या चुनावों में भी इस स्पिरिट का ख्याल रखा जाना चाहिए।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि चुनाव दर चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता पक्ष और विरोधियों के बीच की स्तरहीन जुबानी जंग और कड़वी होती जा रही है। सियासत की कड़वाहट अपशब्दों और दिवंगतों नेताओं को कोसने तक पहुंच गई थी। फिर भी प्रधानमंत्री ने कहा है कि चुनाव में कौन क्या बोला, मेरे लिए वो बात बीत चुकी है। हमें आगे देखना है। सबको साथ लेकर चलना है। अगर अपन चुनाव प्रचार के स्तरहीनता की रौशनी में उनके इस बयान को देखें तो उनके अल्फाज फौरी तौर पर तसगीबख्श तो जरूर हैं। वैसे पिछली बार यानी 2014 को अपन याद करें, तो संसद में प्रवेश करने से पहले नरेन्द्र मोदी ने संसद की सीढ़ियों को झुककर नमन किया था।

यह बात और है कि पिछले पांच साल में ऐसे तमाम मौके आए जब लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों के साथ समझौते होते नजर आए। अबके उनने भारत के संविधान को फूल-माला चढ़ाकर उसे नमन किया है। साथ में उनने एक और अहम बात कही कि संविधान हमारा सुप्रीम है, उसी की छाया में हमें चलना है। नरेन्द्र मोदी चूंकि संकेतों में खेलना जानते हैं, लिहाजा उनने अपनी दूसरी पारी शुरू करने से पहले भी न केवल शब्दों बल्कि भाव-भंगिमाओं के जरिए भी मुल्क को भरोसा दिलाने की कवायद की कि वे सत्ता भाव नहीं बल्कि सेवा भाव से काम करेंगे।

अपनी दूसरी पारी की शुरुआत से पहले उनने अपने चर्चित नारे सबका साथ सबका विकास के दायरे को भी बढ़ाया है। अब उनने सबका साथ, सबका विकास के नारे में सबका विश्वास भी जोड़ा है। लाजमी है कि उनने अपने नारे का विस्तार कर अपने भावी उद्देश्यों को भी चुनौतीपूर्ण बनाया है। देखना दिलचस्प होगा कि आगे वे इस चुनौती को किस तरह पूरा करते हैं। क्योंकि जब प्रधानमंत्री अपने नारे में सबका विश्वास शब्द जोड़ने की बात करते हैं तो जाहिर है उनका इशारा मुल्क के अल्पसंख्यकों से है और वह भी खास तौर से मुल्क में रह रहे मुसलमानों से।

जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है तो उनके लिए पिछले पांच साल का अनुभव कुछ बेहतर नहीं माना जा सकता। पर प्रधानमंत्री की बातों से लगता है उन्हें इस बात का इल्म भी है। लिहाजा, उनने कहा है कि वोट-बैंक की राजनीति में भरोसा रखने वालों ने अल्पसंख्यकों को डर में जीने पर मजबूर किया, हमें इस छल को समाप्त कर सबको साथ लेकर चलना होगा। बेशक, पीछे का अनुभव उनकी इस बयान की पूरी तरह गवाही नहीं देते। उनकी सरकार की पहली पारी में मुल्क साफ तौर पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ। अल्पसंख्यकों के लिए कई तरह के डर पैदा हुए।

कई सूबों में तनाव और भय का माहौल बना। और तब मुल्क ने जब भी प्रधानमंत्री की ओर देखा उनने बतौर प्रधानमंत्री अपने भाषणों में सांप्रदायिकता के खिलाफ बातें कही भी। लेकिन जब-जब चुनाव की बारी आई उनकी भाषा श्मशान-कब्रिस्तान, हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता था, जैसी बातों तक सिमटती नजर आई। पर अब नरेन्द्र मोदी अगर खुलकर अल्पसंख्यकों का भी विश्वास जीतने की जरूरत महसूस कर रहे हैं तो भविष्य लिए इसे अच्छा संकेत माना जाना चाहिए। यह वक्ती हकीकत है कि उन्हें पूर्ण बहुमत मिला, पहले से अधिक वोट फीसद भी।

जनता ने भाजपा या उसके सहयोगी दलों के उम्मीदवारों से अधिक मोदीजी के चेहरे पर अपना वोट दिया है, और यही विश्वास उनके लिए बड़ी चुनौती भी है। बहुत से सांसद दोबारा चुन कर आए हैं, कुछ नौसिखिया हैं और कुछ विवादित भी। और प्रधानमंत्री को अपनी इस चुनौती का बखूबी इल्म भी। लिहाजा, वे जीत कर आए सासंदों को अखबारों में छपने और टीवी में दिखने के लालच से बचने की नसीहत देते हैं। उनने साथ में वीआईपी कल्चर से दूर रहने की नसीहत दी और कहा कि थोड़ा सा भी अहंकार हमें बर्बाद कर देता है।

यानी कुल मिलाकर उनकी दूसरी पारी के पहले भाषण का लब्बोलुआब साफ है कि वे खुद को एक महाशक्तिशाली, सर्वमान्य, दूरदृष्टा लेकिन उदार और विनम्र नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। उनकी यह कवायद मुल्क के लिहाज से एक अच्छा संकेत है। क्योंकि जब कोई राजनेता अपनी सोच का दायरा बड़ा करता है तो समाज पर हमेशा उसका सकारात्मक असर होता है। बहरहाल, अगले पांच सालों में वे अपनी इन चुनौतियों और कसौटियों पर कितना खरा उतरते हैं और किस तरह विश्वास का दायरा बढ़ाते हैं मुल्क को इसका इंतजार होगा।    

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