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सबसे चर्चित कन्हैया कुमार

Tuesday, April 30, 2019 09:50 AM
कन्हैया कुमार (फाइल फोटो)

अबके 2019 के आम चुनाव में जिन दो सीटों की चर्चा सबसे अधिक है, उसमें पहली सीट है बिहार की बेगूसराय और दूसरी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वाराणसी। बेगूसराय से कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। यूं तो वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई के उम्मीदवार हैं पर वे मुल्क में आज अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके लिए पार्टी का कोई अर्थ नहीं है। वहां सीपीआई नहीं अलबत्ता कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। वैसे सियासत के अधिकांश जानकार नरेन्द्र मोदी के लिए भी यही बात करते हैं। मोदी-शाह जोड़ी की जो प्रचार की शैली है वह भी इस बात की तस्दीक करती है

कि भाजपा नहीं गोया केवल नरेन्द्र मोदी ही चुनाव लड़ रहे हैं। बहरहाल, फर्फ यह है कि कन्हैया कुमार केवल बेगूसराय की सीट से चुनाव लड़ रहे हैं और नरेन्द्र मोदी उन सभी 437 सीटों से चुनाव लड़ते नजर आ रहे हैं जहां से भाजपा ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं। पर आलम यह है कि बेगूसराय मुल्क की सबसे हॉट सीट बन गई है, क्योंकि उसकी चर्चा वाराणसी से भी अधिक है। नरेन्द्र मोदी तमाम खबरिया चैनलों के पत्रकारों और एंकरों को बनारस ले जाकर साक्षात्कार दे रहे हैं, जबकि खबरिया चैनलों को कन्हैया कुमार के बिना बुलाए भी जाना पड़ रहा है। क्योंकि मुल्कभर से सेलिब्रेटी और लोग उनके समर्थन में बेगूसराय पहुंचे हैं।

वैसे फरवरी 2015 में जब मोदी सरकार ने देशद्रोह के आरोप में कन्हैया कुमार और उनके साथियों को जेल भेजा था, तब मोदी-शाह की जोड़ी को शायद ही यह अंदाजा हो कि जेएनयू के जिस अध्यक्ष कन्हैया कुमार को जेल भेज रहे हैं वह आने वाले दिनों में उनके लिए ऐसी चुनौती बनने वाला है। कायदे से देखा जाए तो आज कन्हैया कुमार सियासत के जिस मकाम पर पहुंचे हैं उसका श्रेय मोदी सरकार को ही जाता है। क्योंकि इससे भाजपा के लोग जिस जेएनयू की देशद्रोहियों का अड्डा मानते हैं, वहां तो हर साल चुनाव होता है और कोई न कोई अध्यक्ष चुना जाता है। पर उनमें से कितनों का नाम हम और आप जानते हैं। कई लोग जो वामपंथी नहीं हैं

पर अपनी-अपनी वजह से कन्हैया के समर्थक हैं उनमें से कइयों को कन्हैया की कहानी भगवान कृष्ण से मिलती नजर आती है। बहरहाल, कमजोर और मजबूत का संघर्ष तो इस मुल्क में शताब्दियों से चलता रहा है। जिसमें अक्सर मजबूत ही जीतता है, पर समय-समय पर तमाम ऐसे चरित्र आते हैं जो इस मिथक को तोड़ते हैं। अक्सर यह तस्वीर लोकतंत्र में भी दिखती है। पर लोकतंत्र में यह ताकत जनता से मिलती है। नरेन्द्र मोदी आज मुल्क के प्रधानमंत्री हैं तो बेशक जनता के समर्थन से ही हैं। पर इस हकीकत को भी नहीं नकारा जा सकता कि नरेन्द्र मोदी की सियासत को अगर कन्हैया कुमार चुनौती देने की ताकत बटोर पाए हैं तो उसके पीछे भी जनता का ही समर्थन है।

और यही वजह है कि मुल्क भर की जानी-मानी हस्तियां उनका समर्थन करने बेगूसराय पहुंची हैं। पर नैतिक और मन का समर्थन अपनी जगह है और जमीन का गुणा गणित अपनी जगह। कन्हैया बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे हैं क्योंकि वहां उनका गांव है। पर इतने भर से उनकी चुनौतियां कम नहीं हो जाती। अगर केवल मुद्दों पर, तार्किक बात करनी हो तो कन्हैया को मात देना कठिन है,  लेकिन भारतीय राजनीति की दिक्कत यही है कि मुद्दों से इतर कई अन्य कारक हार या जीत तय करते हैं। जहां तक बेगूसराय के चुनावी गणित का सवाल है, तो  पिछली बार भाजपा के भोला सिंह को 4,28,227 वोट मिले थे, जबकि राजद के तनवीर हसन ने उन्हें कड़ी टक्कर देते हुए 3,69,892 मत हासिल किए थे।

तनवीर हसन इस बार गठबंधन प्रत्याशी हैं और भाजपा ने नवादा से जबरन गिरिराज सिंह को बेगूसराय भेजा है। बेगूसराय में जीत के लिए कन्हैया को वामपंथी वोटों के अलावा अन्य वोटों की जरूरत भी होगी। जाति के समीकरण उनके पक्ष में हैं, क्योंकि यहां के 19 लाख मतदाताओं में करीब 19 प्रतिशत भूमिहार हैं। बेगूसराय में दस में से 9 बार भूमिहार सांसद रह चुके हैं। लेकिन भाजपा के गिरिराज सिंह भी कन्हैया कुमार की तरह भूमिहार हैं।

वे देशभक्त और देशद्रोही एजेंडे के अहम किरदार भी रहे हैं। वे पिछले पांच साल में कई लोगों को पाकिस्तान भेजने का बंदोबस्त करते नजर आए। वैसे, यह उनकी नाकामी रही कि अब तक एक आदमी को भी वे पाकिस्तान भेज पाने में सफल नहीं हो सके। बहरहाल, दूसरी ओर गठबंधन प्रत्याशी तनवीर हसन हैं। भूमिहार मतदाताओं के बाद यहां 15 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जो या तो तनवीर हसन के साथ जा सकते हैं या कन्हैया कुमार के साथ।

कन्हैया के प्रचार के लिए पहुंचे जावेद अख्तर ने तो मुस्लिम समुदाय से यहां तक कह दिया कि तनवीर हसन को देकर वोट खराब करने से तो बेहतर है, वे गिरिराज सिंह को ही दें, कम से कम बीजेपी वाले एहसान तो मानेंगे। कहने का आशय यह कि कन्हैया कुमार और तनवीर हसन के बीच वोट बंटने का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को होगा। राजद नेता तेजस्वी यादव चाहते तो इस सीट पर वामपंथ का साथ दे देते।

पर मुमकिन है एक उभरते हुए युवा नेता के तौर पर कन्हैया कुमार में उन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी नजर आया हो। क्योंकि अपने समकक्ष किसी और को खड़ा देखने का संकट किसी एक पार्टी की समस्या नहीं है। यह चौतरफा व्याप्त है। फिलहाल तो अपनी दिलचस्पी इस बात में है कि सोमवार को बेगूसराय की जनता ने कन्हैया कुमार के भविष्य का क्या फैसला किया है। 

- शिवेश गर्ग  

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