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इंडिया गेट

यह सभ्य समाज की भाषा नहीं

Thursday, January 30, 2020 10:40 AM
अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा (फाइल फोटो)

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा के खिलाफ चुनाव आयोग को कार्रवाई करनी पड़ी है। आयोग ने भाजपा से कहा है कि वह इन दोनों नेताओं को दिल्ली चुनाव के लिए अपने स्टार प्रचारकों की सूची से हटा दे। अनुराग ठाकुर ने एक चुनावी रैली में देश के गद्दारों को गोली मारने का नारा लगवाया था। प्रवेश वर्मा ने दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के खिलाफ धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों के बारे में कहा था कि कल ये लोगों के घरों में घुसकर उनकी बहन-बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे। उनका कहना था, ‘दिल्ली वालों को सोच समझकर फैसला लेना पड़ेगा। ये लोग आपके घरों में घुसेंगे, आपकी बहन-बेटियों को उठाएंगे, उनके साथ दुर्व्यवहार करेंगे, उनको मारेंगे। इसलिए आज समय है। कल मोदी जी नहीं आएंगे बचाने। कल अमित शाह नहीं आएंगे बचाने।’ प्रवेश वर्मा का यह भी कहना था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते ही देश सुरक्षित है। साथ ही उनने दावा किया कि अगर दिल्ली में भाजपा की सरकार बनी तो शाहीन बाग को एक घंटे में खाली करा लिया जाएगा।’ अनुराग ठाकुर केन्द्रीय मंत्री हैं और मुल्क के वित्त राज्यमंत्री भी हैं। मुनासिब होता कि वे शाहीन बाग में प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ जहर उगलने के बजाए अपने काम पर ध्यान देते तो मुल्क का कुछ भला होता। क्योंकि दो दिन बाद ही संसद में सरकार का आम बजट पेश होने वाला है और अर्थव्यवस्था की जो हालत है, वह भी किसी से छिपी नहीं है, लेकिन उनकी दिलचस्पी अपने काम में नहीं अलबत्ता गद्दारी का सर्टिफिकेट बांटने में है। अनुराग ठाकुर जिन्हें गद्दार बता रहे हैं और गोली मारने के लिए भाजपा के समर्थकों को उकसा रहे हैं वे लोग दिल्ली के शाहीन बाग में विवादित सीएए कानून का विरोध कर रहे हैं। सीएए का विरोध केवल दिल्ली में ही नहीं अलबत्ता पूरे मुल्क में हो रहा है। अगर मंत्रीजी की भाषा के नजरिये से देखा जाए तो यह मुल्क ही गद्दारों का बन चुका है, क्योंकि थोड़ी देर के लिए यह मान लिया जाए कि भाजपा को लोकसभा में वोट करने वाले सभी लोग इस कानून के पक्षधर हैं तो भी यह पक्षधरता रखने वाले लोग केवल करीब 32 फीसद ही है। यानी उनकी भाषा के मुताबिक मुल्क का बड़ा तबका गद्दार है।

इस मुल्क के संसदीय इतिहास में यह पहली बार हो रहा है, जब सत्ता में बैठे लोग इस कदर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करते नजर आ रहे हैं। आज आलम यह है कि जिन लोगों पर मुल्क में शांति व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी है वे ही हिंसा को बढ़ावा देने में जुटे हैं। पिछले दिनों जेएनयू कैंपस में घुसकर गुंडों ने छात्रों के साथ मार-पीट की और मुल्क की कानून व्यवस्था मूक-दर्शक बनी बैठी रही। उल्टे हिंसा के शिकार छात्रों के खिलाफ ही मामला दर्ज कर दिया गया। और ताजा आलम यह है कि मुल्क का आम बजट आने वाला है और वित्त राज्यमंत्री बजट की तैयारियां करने की बजाए अपने समर्थकों को हिंसा के लिए भड़का रहे हैं और गद्दारी का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं। वे दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान रिठाला से पार्टी उम्मीदवार मनीष चौधरी के समर्थन में आयोजित चुनावी सभा में नारे लगाते हैं। देश के गद्दारों को, तो जवाब में जनता नारा लगाती है गोली मारों। जनता जब उनकी उम्मीद के मुताबिक जोर से नारे नहीं लगती तो, वह जोर से जनता को जवाब देने को कहते हैं। और जनता जोर से दोबारा नारा लगाती है और जब वह ऐसा कर रहे थे, तो मंच पर एक दूसरे केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी मौजूद थे। यह वही हैं, जो अक्सर भाजपा के विरोधियों को पाकिस्तान जाने की नसीहत देते रहे हैं।

भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन करे लोगों से इतन डर गए हैं कि वे अपने समर्थकों को आगाह कर रहे हैं कि वे कल को लोगों के घरों में घुसकर उनकी बहन-बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे। दिल्ली की जनता को सोच-समझकर फैसला लेना चाहिए। वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का भी लोगों को हवाला देते हैं कि वे कल आपको बचाने नहीं आएंगे। कोई प्रवेश वर्मा से पूछे कि उनने कभी आसाराम बापू, स्वामी चिन्मयानंद, विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और राम रहीम का नाम सुना है, जिनने मोदी-शाह की जोड़ी के रहते ही न जाने कितनी ही बहन बेटियों के साथ बलात्कार किया। और वे बहन-बेटियां किसी दूसरे समुदाय की नहीं थीं। मुमकिन है कि जिन बहन बेटियों की इन अपराधियों ने अस्मत लूटी वे भी उसी पार्टी की समर्थक हों, जिसकी सियासत अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, गिरिराज सिंह या योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं। क्योंकि ये सभी नेता जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह किसी सभ्य समाज की भाषा नहीं हो सकती। यह भाषा किसी पतनशील समाज और जेहन से ही निकल सकती है। आज वे इस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो साफ है उन्हें सत्ता की शह मिली है। मुल्क के लिए यह वाकई गंभीर चिंतन का विषय है।

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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