Dainik Navajyoti Logo
Friday 29th of May 2020
 
इंडिया गेट

खतरनाक है आंकड़ों से यह खिलवाड़

Friday, May 10, 2019 10:10 AM

- शिवेश गर्ग
ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन इजरायली ने कहा था, ‘झूठ तीन तरह के होते हैं, झूठ, सफेद झूठ और आंकड़ें।’ आज जब मुल्क में आम चुनाव अपने अंतिम चरण में है तो मोदी सरकार की ओर से दिए जीडीपी के आंकड़ों के बरक्स बेंजमिन इजरायली का यह चर्चित कथन खुद को सही साबित करता नजर आ रहा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण(एनएसएसओ) ने जून 2016 और जून 2017 के बीच एमसीए 21 का परीक्षण किया और पाया कि करीब 36 फीसदी कंपनियां, जिन्हें सक्रिय माना जा रहा था, वे या तो मौजूद नहीं थीं या गलत ढंग से वर्गीकृत थीं। एनएसएसओ की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है

कि नई शृंखला में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना करने के लिए कंपनी मामलों के मंत्रालय के 21 पोर्टल में जिन कंपनियों को शामिल किया गया है, उनमें से एक तिहाई का कोई अता-पता ही नहीं है। ‘भारत में सेवा क्षेत्र उपक्रम पर तकनीकी रिपोर्ट’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने कहा है कि पोर्टल में शामिल 21 फीसदी कंपनियां दायरे से बाहर थीं और 12 फीसदी का कोई अता-पता नहीं था। तकनीकी तौर पर सक्रिय कंपनियां उन्हें माना जाता है जो तीन साल में कम से कम एक बार रिटर्न दाखिल करती हैं।

यह पहला मौका नहीं है जब मोदी सरकार की ओर दिए गए आंकड़ों पर सवाल उठे हों। रोजगार और उत्पादन संबंधी आधिकारिक आंकड़ों को लेकर न केवल मुल्क में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकारी आंकड़ों को लेकर विवाद का सिलसिला तब शुरू हुआ जब 2015 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों की ‘नई शृंखला’ पेश की गई और जीडीपी के आंकड़ों में अचानक सुधार दर्ज हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली यह दावा करते दर्जनों बार सुने गए कि भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।

जबकि दूसरी ओर अर्थव्यवस्था से जुड़े जो और दूसरे मानक होते हैं वे विरोधाभासी संकेत दे रहे थे। अब जीडीपी से जुड़े एनएसएसओ की ताजा रिपोर्ट ने इन विरोधाभासों का सच सामने ला दिया है। जीडीपी आंकड़ों की नई शृंखला और पुरानी शृंखला के बीच अहम अंतर यह था कि मोदी सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों में कॉरपोरेट मुनाफे के आंकड़ों को भी शामिल किया गया। सैद्घांतिक तौर पर उत्पादन सर्वेक्षण के इस्तेमाल की तुलना में यह एक अलग तरीके का कदम था। इस कदम को लेकर सांख्यिकीविदों में मतभेद रहा है। कुछ इसे शामिल करने के पक्षधर रहे हैं और कुछ जानकारों का मानना है कि ऐसा करने से उत्पादन वृद्घि के अतिरंजित होने का खतरा होता है।

दलील में दम दिखता है कि 2015 के बाद से जीडीपी आंकड़ों पर भी यही आरोप लग रहा है। मुल्क में वृहद आंकड़ों की विश्वसनीयता और उनके सटीक होने पर इससे पहले कभी सवाल नहीं उठे। पर ताजा रिपोर्ट के बाद तो यह साफ हो गया है कि मुद्दा केवल जीडीपी के अतिरंजित या बढ़ा चढ़ा कर पेश किए जाने भर का नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई लाख कागजी और फर्जी कंपनियों को बंद करने का दावा करते रहे हैं और जनता को यह समझाने की कोशिश करते रहे हैं कि कांग्रेस की पिछली सरकारों में इन्हीं कंपनियों के माध्यम से भ्रष्टाचार फैलाया जाता रहा है। पर एनएसएसओ की रिपोर्ट ने खुद उनकी सरकार की पोल खोल दी है कि किस कदर मोदी सरकार फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल जीडीपी के आंकड़े बढ़ाने में कर रही है।

मुल्क की अर्थव्यवस्था के लिहाज से चिंताजनक पहलू यह है कि सरकारी आंकड़ों को लेकर यह विवाद तब खड़ा हुआ है जब वह संकट के दौर में है। बेरोजगारी चरम पर है। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग बता चुका है कि 45 साल में बेरोजगारी का दर सबसे अधिक है। आयोग की ओर से जब यह रिपोर्ट आई थी, तब भी इसे दबाने की कोशिश की गई, जिसके विरोध में आयोग के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था। आलम यह है कि कई महीनों के बाद भी नए सदस्यों की बहाली नहीं की गई है। बताया जाता है कि बेरोजगारी के आंकड़ों के लिए भारत सरकार का श्रम मंत्रालय को सालाना सर्वे कराता रहा है

उसे भी बंद कर दिया गया है। भारत ही नहीं मुल्क भर में ये आंकड़ें विश्वसनीय माने जाते थे। मुल्क की अर्थव्यवस्था और खासतौर से निवेशकों के लिए यह सूरतेहाल परेशान करने वाला है। अविश्वसनीय और अतिरंजित आंकड़ों से निवेशकों की आशंकाओं में इजाफा होता है। असल में, आंकड़ों के जरिए अर्थव्यवस्था की बुनियादी हकीकत को नकारना खतरनाक साबित होगा। यह न केवल किसी सरकार की साख के खिलाफ है अलबत्ता इस प्रवृति से दुनिया भर में भारतीय अर्थव्यवस्था की साख भी धूमिल होती है। सियासी लिहाज से यह समय नाजुक है क्योंकि आने वाली सरकार को लेकर संशय बरकरार है।

बरहरहाल, 23 मई के बाद जिसकी भी सरकार बने नई सरकार को सियासत से परे हटकर ईमानदारी से जांच करनी होगी और यह पता लगाना होगा कि आखिर जीडीपी और रोजगार के आंकड़ों में क्या गड़बड़ी है। वरना आंकड़ों से खिलवाड़ आने वाले दिनों में मुल्क और अर्थव्यस्था की साख को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
 

यह भी पढ़ें:

शर्मसार करता चुनाव प्रचार

अपन भी रविवार को वोट डाल आए। पर चुनाव प्रचार का ऐसा स्तरहीन सिलसिला शायद ही कभी मुल्क में दिखा हो। यों तो महापुरुषों पर बेवजह की अभद्र टिप्पणियां, विरोधी दलों के नेताओं पर

14/05/2019

कमजोर हुई है लोकतंत्र की बुनियाद

महात्मा गांधी ने कतार में खड़े अंतिम आदमी की चिंता की है। उनने कहा है कि कोई भी फैसला लेने से पहले इस बात पर गौर करना बेहद जरूरी है कि उसकी कतार में खड़े अंतिम आदमी पर क्या असर पड़ेगा।

25/01/2020

सकार की है जीत

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तीसरी बार सत्ता संभालेंगे। यों तो आम आदमी पार्टी को पिछली बार की तुलना में 5 सीटें कम मिली हैं, लेकिन सियासत की नजर से देखा जाए, तो इस बार की जीत पिछली बार की तुलना में बड़ी है।

13/02/2020

सबसे चर्चित कन्हैया कुमार

अबके 2019 के आम चुनाव में जिन दो सीटों की चर्चा सबसे अधिक है, उसमें पहली सीट है बिहार की बेगूसराय और दूसरी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वाराणसी।

30/04/2019

एक राजनेता का गैर-राजनीतिक साक्षात्कार

जब बीच चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बने बॉयोपिक पर रोक लगा दी गई, तो उनने प्रचार का एक नया तरीका इजाद कर लिया।

26/04/2019

दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बजट और आम जनता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा संसदीय दल की बैठक में अपने सांसदों को बताया है कि दुनिया की आर्थिक हालत के मद्देनजर इस साल का बजट सर्वश्रेष्ठ बजट है।

05/02/2020

राफेल पर मोदी सरकार को झटका

2019 के आम चुनाव के पहले चरण से ऐन पहले सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गहरा झटका लगा है।

11/04/2019